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रेल्वे की थ्रिलर स्टोरी

आज भारतीय रेलवे अपनी गती के नए नए कीर्तिमान बनाए जा रही है। सुपरफास्ट, राजधानी, शताब्दी, गतिमान और आज की वन्दे भारत एक्सप्रेस। अब कुछ ही महीनोंकी बात है, ट्रेन 20, जो की 200 km प्रतिघंटा दौड़ने वाली गाड़ी है, आनेवाली है।

क्या आप जानते है, इन सब कीर्तिमान के पीछे कितनी मेहनत, कितनी सजगता है? अफसर, इंजीनियर, टेक्नीशियन बहोत सारे कर्मचारी अपनी दिन रात एक करते है, लेकिन इन सभी की ड्यूटी के साथ साथ एक कर्मचारी और भी है। वो है, भारतीय रेल के इन नए नए कीर्तमान के शिखरोंकी नींव का पत्थर, रेलवे में काम करनेवाला चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, गैंगमैन,चाबी वाला।

आज की कहानी, इन्ही चाबी वालोंकी है। जिस तरह हर कोई ईमारत देखता है, उसकी मजबूती, बुलंदी देखता है, लेकिन नींव छुपी रह जाती है। उसी तरह यह चाबी वाला शायद ही कभी उजागर होता है।

हमारी कथा का नायक, मुश्ताक़, जिसकी उम्र कोई 37 साल की होगी। रेलवे में गैंगमैन में लग के 12 वर्ष हो गए थे। उसकी गैंग में 70 लोग थे। पटरी की देखभाल करना यह उनके गैंग की ड्यूटी थी। मुश्ताक़ का मुकर्दम बिरजू पांडे था, जो उससे 15 साल सीनियर था और PWI साहब थे लौटू पटेल। दरअसल एक गैंग का मेंबर ही सीनियर बनके मुकर्दम, और आगे जा के लोअर क्लास थ्री में PWI याने परमानैंट वे इंस्पेक्टर बनता है। काम सब का वही, रेलवे ट्रैक का मेंटेनेंस और रिपेयर करना।

मुश्ताक़ हमेशा रात की ट्रैक चेकिंग की ड्यूटी पसंद करता था। रात 10 बजेसे सुबह 6 बजे तक, कंधे पर 20 किलो का थैला, जिसमे पटरी का छोटा टुकड़ा, चाबियाँ, नट, बोल्ट, पाने और लंबे डंडे वाली हतौडी, एक टोर्च, दो सिग्नल वाली बत्तियाँ, दोनों हरी और लाल झंडियाँ, साथमे मोबाईल रेडियो याने वॉकीटोकी। इतना सारा झमेला सम्भालते रात के अँधेरोंमें, कड़कड़ाती ठंड हो या उफनती बरसात, बत्ती के या टोर्च के उजाले में, अकेले ट्रैक को जांचते 5 km जाना और उतना ही वापस आना, अपने मुकर्दम को ट्रैक का रिपोर्ट करना और फिर घर जाना, ऐसी थी ड्यूटी।

यह ऐसीही एक रात की बात है। दिसंबर की ठंड की अंधियारी वाली रात थी। मुश्ताक़ की ड्यूटी श्री क्षेत्र नागझिरी स्टेशन से शुरू होनी थी जो नदी का पुल पार करके पारस स्टेशन तक जाना था। PWI ऑफिस से अपना झोला उठाकर, बिरजू दादा को रामरमाई करके मुश्ताक़ निकला।

स्टेशन खत्म हुवा और आगे पुल शुरू होता है। हमेशा नागझिरी से पारस जाते वक्त, अप लाईन पर चेकिंग की जाती थी और आते वक्त डाउन लाइनपर याने गाड़ी सामने से आए ऐसी दिशा में पैदल चलना। मुश्ताक़ अप लाइन से पुल पार करते जा रहा था, डाउन ट्रैक से एक मालगाड़ी धड़धड़ाते पास हुई। मुश्ताक़ को पुल का थरथराने का आवाज़ थोड़ा अलग ही लगा, उसने सोचा, मालगाड़ी का रेक ज्यादा लम्बा या ओवरलोड होगा। बड़े अफसर पता नही देखते है या नही, वह बुदबुदाया।

थैला उठाकर पारस स्टेशन पहुंचा तो रात के 1 बज चुके थे। दोनोंही तरफ की गाड़ियाँ बराबर चल रही थी। उसने पारस के मास्टर से अपने डायरी में साइन करवाई और वापसी ड्यूटी के लिए निकल पड़ा। स्टेशन मास्टर ने उसे आवाज दी, “अरे मुश्ताक़, चाय तो पिता जा।” “ओ नही साबजी, जर्दा दबा लिया है।वैसे भी आज कुछ ठीक नही लग रहा। पता नही ये चौदस, अमावस मुझे भारी क्यो लगती है?” मुश्ताक़ ने बाहर मुँह निकाल, एक पीक मारी और पटरी पर बढ़ गया।

जाती आती गाड़ियोंको बत्ती दिखाए आगे बढ़ रहा था, बस नदी आ गई है, पुल पार किया की ड्यूटी पूरी। अब वह डाउन पटरी से आ रहा था। पिछेसे पारस से छूटी सेवाग्राम एक्सप्रेस साँय साँय करते उसे पास कर गई। उसके मंझे हुए कानोंमें एक खट खट की डरावनी आवाज़ आई। गाड़ी तो निकल चुकी थी। नागझिरी से पारस जाते हुए उसने अप साइड की पटरी चेक करी थी। उसका दिल बड़े जोर जोर से धड़कने लगा।

अपना डाउन ट्रैक छोड़कर वह फिरसे आवाज की तलाश में अप ट्रैक पर आया। देखता तो क्या? सन्न रह गया। धुजनी छूट गई, इतनी गहरी ठंठ में वह पसीने पसीने हो गया। पुल जहाँ ख़त्म हो रहा था, वहाँ की दोनों ही पटरी बिल्कुल छूट गई थी। ये तो सीधे सीधे पुल का गर्डर खिसकने की निशानी थी। वह सीधे पलटा, और पुल के दूसरे छोर की तरफ याने पारस स्टेशन की ओर दौड़ने लगा। जैसे ही पुल खत्म हुआ, उसके 50 मीटर आगे जाके उसने झोले से बत्ती निकली और उसमें लाल कांच चढाकर अपने हटौडे के डंडे पे टांग दी। दूसरा काम, फौरन वॉकीटोकी निकाल अपने मुकर्दम से बात शुरू की।

वॉकीटोकी याने मोबाईल रेडियो की व्यवस्था ऐसी रहती है की, 5 km के दायरे में सभी एक्टिव मोबाइल रेडियो एक दूसरे से सम्पर्क कर सकते है। मुश्ताक़ ने वॉकीटोकी को शुरू करते ही, उसकी रेंज में जितने भी मोबाईल रेडियो है, जो सब उसकी आवाज सुन रहे थे, और वो बदहवास सा चिल्ला रहा था। “ओ बिरजू दादा, पारस के मास्टर साब, नागझिरी के मास्टर साब, नदी के पुल पर, अप लाईन की दोनों पटरी चटख गई है, शायद पुल का गर्डर खिसक गया है। गाड़ियाँ रोक दीजिए। मैं ऑन ड्यूटी चाबी वाला मुश्ताक़ बोल रहा हूँ।

” अबे, क्या बक रहा है? ” वॉकीटोकी पर बिरजू चीखा, उधर पारस और नागझिरी के मास्टर की भी हालत खराब हो गई, अफ़रातफ़री मच गई। ईधर बिरजू पांडे जानता था, की मुश्ताक़ घबराहट में तो है, लेकिन ऊलजुलूल नहीं बकेगा, उसने फौरन अपने PWI लौटू पटेल को फोन लगाया, और मुश्ताक़ की बात बता दी।

बात की अहमियत जानते, लौटू पटेल, जो भुसावल में था, फौरन ही कंट्रोल ऑफिस पहुंचा। कंट्रोल ऑफिस ने तुरन्त इमरजेंसी सायरन बजवा दिए।

इधर मुकर्दम बिरजू ने भी अपना थैला उठाया और वह भी नदी की तरफ दौड़ पड़ा। नागझिरी और पारस स्टेशनोंपर इमरजेंसी लग चुकी थी। दोनोंही स्टेशन का PWI गैंग नदी की तरफ रवाना हुवा। भुसावल कंट्रोल पूरे हरकत में गया। सायरन सुनकर अफसरों के फोन शुरू हो गए। ब्रेक वैन को 15 मिनिट का वक्त दिया गया। इमरजेंसी गैंग अपने औजारों के साथ स्टेशनपर जमा होने लगी। नागपुर भुसावल ट्रैक का पूरा ट्रैफिक फौरन रोक दिया गया। जो जहाँ है उसे वहीं रोका जा रहा था।

बिरजू के साथ की गैंग, उधर पारस की गैंग पुल पर मुश्ताक़ के पास पहुंची। मुश्ताक़ अभी तक थरथरा रहा था। जब सब लोग पुल के छोर पर पहुंचे तो पटरी की हालत देखकर सन्न रह गए। दोनों पटरी टूटकर कमसे कम 4 इंच नीचे सरक गई थी। जब गर्डर की तरफ नज़र गई तो गर्डर एक छोर से लटक गया था। हालात देख सबकी रूह काँप गयी की अभी अभी सेवाग्राम एक्सप्रेस उसी पटरी से 100 की स्पीड से गई थी।

लगभग 70 मिनट में, भुसावल से ब्रेक डाउन गाड़ी नागझिरी पुल के जगह पहुंची और सभी जिम्मेदार अफसरों और टेक्नीशियन्स ने मोर्चा संभाला।

आगे उस पुल की मरम्मत का काम 2 महीने चला, लगभग 1 हफ्ते तक, उस सेक्शन की ट्रैफिक पूर्णतया बन्द थी, जिसे 1 हफ्ते बाद स्पीड रिसट्रिक्शन याने धीमे गति की पाबंदी के साथ शुरू की गई।

हमारे अननोन, अज्ञात, बिना प्रसिद्धि मिलने वाले हीरो को, मुश्ताक़ को मुम्बई के जनरल मैनेजर से अवॉर्ड घोषित किया गया।

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