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राजधानी एक्सप्रेस में एक दिन पार्ट-1

15.00 मुम्बई छ शि म ट

माज़िद खान, एकदम समय के पाबंद, अपने कड़क यूनिफार्म में, अपनी ड्यूटी पर हाज़िर हो चुके थे। उनकी ड्यूटी, गाड़ी छूटने के समयसे 1 घंटा पहले शुरू हो जाती थी। गाड़ी के सभी रनिंग एमिनिटीज स्टाफ़ याने TTE, कन्डक्टर, AC का स्टाफ, पेन्ट्री का स्टाफ, सफाईवाला, इलेक्टिशियन सबकी हाज़िरी उन्हीकों तो भरनी थी। अभी पिछले महिनेही उनकी पोस्टिंग TS ट्रेन सुपरिटेंडेंट के पोस्ट पर मुंबई नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस में हुई थी। वैसे यह सेंट्रल रेलवे की पहली राजधानी भी 4 महीने पहले ही शुरू की गई थी। बहोत बढ़िया रिस्पॉन्स मिल रहा था, ट्रेन दोनों साइडसे फूल चल रही थी।

जिस तरह चार महिनेमेही, सेंट्रल रेलवे की राजधानी के समयपालन, गुणवत्तापूर्ण सेवा और रनिंग स्टाफ की मेजबानी के चर्चे न सारी रेलवे बोर्ड में थे बल्कि मुम्बई दिल्ली के बीच चलने वाली पश्चिम रेलवे की दूसरी राजधानी गाड़ियों के यात्रिओंमें भी यह गाड़ी मशहूर हो गई थी। इसका पूरा श्रेय जाता था ट्रेन के एमिनिटीज के स्टाफ़ को। पूरी औपचारिकता, और समर्पण के साथ मध्य रेल के कर्मचारी अपनी राजधानी की लोकप्रियता में चार चाँद लगाए, उसका दिमाख सजाए रखे थे।

ट्रेन सुपरिटेंडेंट माज़िद खान भी उन्ही स्टाफ़ में से एक थे। एकदम डिसिप्लिन वाले और सख्त मिजाज के बड़े साहब। किसी भी स्टाफ की ड्यूटी में कोताही इनको बिल्कुल बरदाश्त नही होती। इनकी ड्यूटी में हर बन्दा एकदमसे अलर्ट रहता था, चाहे वह TTE हो या पेन्ट्री कार का बेयरा, सफाईवाला हो या C&W का इलेक्ट्रिक वायरमन पूरे तरह से होशियार और पूरे गाड़ी के स्टाफ़ को खान साहब अपने परिवार की तरह रखते थे। हर कोई उन्हें बड़े मियाँ के नाम से जानता था।

गजानन जोशी, पेंट्रीकार का मैनेजर, “मर गए, आज बड़े मियाँ है क्या TS? चलो कमर टूटने वाली है, नाच नाच कर” अपने स्टाफ़ का लाइन अप करके खान साहब के पास पहुंचा। AC मेकेनिक अब्बास, उसके दो असिस्टेंट और बाईस AC अटेन्डेंट पहले ही अपनी हाजिरी लगाकर, अपनी ड्यूटी का चार्ज लेने डिब्बोंके तरफ बढ़ रहे थे। चेकिंग स्टाफ अभी आने को था।

15.40 मुंबई छ शि म ट

” चलो, फटाफट गजानन, अपने बेयरोंको यूनिफॉर्म डालने को बोल दो। यात्री आना शुरू गए है। मेरे को किसी का शिकायत नही मंगता, सबका पानी बोतल और वेलकम स्नैक्स के पैकेट रेडी रखो। अब्बास ओवैसी चलो मियाँ, पोजिशन सम्भालो, गाड़ी का टेम्परेचर चेक करो और हिसाबसे मेंटेन रखो। पवार तुम अपने चेकिंग स्टाफ को अपने अपने कोच का चार्ट दो और कोच पर भेजो जल्दी। ये 2 वॉकीटोकी, 1 तुम्हारे पास और 1 इंजिन के पास कौनसा डिब्बा है, B1 न, उसके TTE, कौन विठ्ठल देख रहा है क्या? तो उसके पास दे दो। गजा अपना वॉकी लिया क्या? बेटे ध्यान देते जाओ, चलो भागो।”
खान साहब की भागा दौड़ी शुरू हो गई। जब तक गाड़ी छूटती नही तब तक ये चलना था।

16.55 कल्याण

” वेलकम सर, मध्य रेल की राजधानी एक्सप्रेस में आपका स्वागत है। C कूपे में बर्थ नम्बर 9 और 10 आपके लिए रिजर्व है।” बद्रीप्रसाद, H1 एसी फर्स्ट का अटेन्डेंट अपने डिब्बे के यात्रिओंको स्वागत कर रहा था।
“सर, आपका वेलकम किट ऊपरी बर्थ पर रखा है और मेरे चार्ट में आपका नॉनवेज स्नैक्स लिखा है, तो अभी ले आए सर?”
“नही। मेरे कूपे के डोअर पर डु नॉट डिस्टर्ब का टैग लगादो। मै सिर्फ डिनर करूंगा जो रात 9 बजे, वेज विथ सूप ले आना।” C वाले यात्री ने सूचना दी और अपनी कूपे बन्द कर ली।

बस एक D वाला नासिक में आया की आवभगत का काम खत्म। बद्रीप्रसाद बुदबुदाया। H1 एसी फर्स्ट के लगभग सभी कम्पार्टमेंट फुल थे और H2 जलगांव तक फुल हो जाना था। बद्रीप्रसाद एसी फर्स्ट का अटेन्डेंट था और उसकी ड्यूटी H1,H2 दोनों कोच सम्भालने की थी। कन्डक्टर पवार साहब, H2 के A कम्पार्टमेंट में TS के साथ थे। वैसे तो TS के लिए A1 एसी टू टीयर का 5 नम्बर बर्थ रिजर्व था, लेकिन H2 का A कैबिन के यात्री भोपाल से आने वाले थे इसीलिए चेकिंग स्टाफ वही से ऑपरेट कर रहे थे। “बद्री, वो गजा से 4-6 कप कड़क मिठ्ठी चाय बना ला, आज जगना है, भोपाल से कोई VIP चढ़ेगा। तब मेरेको हाजिर रहना होगा, A कैबिन उसका ही बुक्ड है।” खान साहब बोले।

18.00 पासिंग इगतपुरी

के. विठ्ठल TTE, B1, B2 थर्ड एसी पर चार्ट चेक कर रहा था। नया नया ही लाइन ड्यूटी पर आया था, उसको बहोत सारी चीजें समझनी थी। पवार सहाब ने बताया था, सबसे पहले विनम्रतापूर्वक काम करो, आगे सब मैनेज हो जाएगा। उसके दोनों कोच मुंबई से दिल्ली तक फुल थे। एक बार चार्ट फाइनल किया की काम खत्म, ज्यादा से ज्यादा नासिक तक उसका चेकिंग हो कर वो पवार साहब के पास चला जाने वाला था। लेकिन उसके डिब्बे में उसे एक बंगाली बाबू बड़ा परेशान कर रहा था। उसका अप्पर बर्थ था, जिसे चेंज करके उसे लोअर बर्थ चाहिए था।
” ए बाबू, तूम हमको क्या समझता हाय, हम तुम्हारा कम्प्लेंट कोर देगा, कॉपोरेट नही करता तुम। जब हमारा लोअर बर्थ का चोइस था, फिर कैसा अप्पर बर्थ दिया”
“दादा, ये सब हमारे हाथ मे नही होता है, मै चार्ट जांचके आपको एडजस्ट करेगा, थोड़ा ठहरो।”
“साला, नाश्ता भी हमको वेज दिया, जल भी ठंडा नही था, हम पक्का कॉम्प्लेंट करेगा।” बंगाली बाबा मान ही नही रहा था।

इधर B3 और B6 में नासिक से कुल 70 बर्थ बुक थे आगरा के लिए। अग्रवाल मैरेज पार्टी 48 बर्थ B3 में और 22 बर्थ B6 मे। माइकल डिकोस्टा एक सीनियर TTE था B3 से B6 चारों कोच वह देख रहा था। माइकल काफी एक्सपर्ट था अपनी ड्यूटी करने में। नासिक तक उसके डिब्बे में बहोत सी जगह खाली थी।

A1 से A3 यह तीन कोच CTI तिवारी जी के पास थे और A4 H1, H2 कन्डक्टर पवार साहब मैनेज करने वाले थे। A1 में एक बडी मुसीबत थी, पहली केबिन में पुराने जमाने की बॉलीवुड हीरोइन माला और उसकी सेक्रेटरी का रिजर्वेशन था, माला आजभी अपने आपको सुपरहीट ही समझती थी। उसे एसी फर्स्ट में बुकिंग मिली नही और मजबूरी में एसी 2 में आना पड़ा ऐसा वो सबको बार बार कहे जा रही थी। उसने तिवारी जी से भी कह दिया था की उस कम्पार्टमेंट में वह और उसकी सेक्रेटरी की अलावा किसी को बर्थ न दे। किसी का रिजर्वेशन हो तो भी उसे दूसरी जगह एडजस्ट कर दे, और तिवारीजी के लिए मिस माला और बाकी यात्रिओंको एडजस्ट करना बहोत दिक़्क़तोंवाला काम था।

18.40 नासिक

“ए चढ़ाओ फ़टाफ़ट, गाड़ी बहोत कम रुके है” कोई ग्रुप का अग्रवाल चिल्ला रहा था।

यही बात गजानन जोशी, अपने वेडरोंसे कह रहा था। पेन्ट्री में खाना चढ़ रहा था। लोकल कॉन्ट्रेक्टर दादासाहेब भूसे की टीम वेज और नॉनवेज खाना कन्टेनर में लेकर आई थी।
“क्यों, आज दादा नही आया क्या? सब नए लोग ही दिख रहे है।” गजा ने टीम में एक पुराना हमेशा दिखने वाले बन्देसे पूछा। वो क्या आहे ना, दादा के घर लगिन है। फिर दादा ने आजके दिन दूसरे को आर्डर फिरा दिया और मेरेकू स्टेशन पर मैनेज करनेकु बोल्या। पक्या आज के दिन गजा को बोल देना, एडजस्ट कर लेना। और एसी फर्स्ट वालोंका कन्टेनर अलग दिएला है, वो देख लेना।”

“काकड़े साहेबांचा विजय असो” भीड़, नारेबाजी करते हुए अपने नेताजी को दिल्ली के लिए छोड़ने गाड़ी पर, A1 की तरफ जा रही थी। यह नेताजी का रिजर्वेशन हीरोइन माला के सामनेवाली बर्थ का था।

विक्की, जो एक नम्बर का शातिर चोर था B3 के आसपास मंडरा रहा था। उसके पास खाली नासिक स्टेशन का प्लेटफार्म टिकट था। मैरेज पार्टी देखकर उसकी धड़कने तेज हो गई थी और आँखे फड़कने लग गई थी। जब भी कोई लम्बा गेम हाथ लगने वाला होता था तब तब उसकी हालात कुछ इसी तरह हो जाती थी। ” चालो सरको, लाइए भाईजी, म्हे थानों सामान चढ़ाने में मदत कर देऊ। म्हारो भी रिजर्वेशन B3 में ही है। लाओ फ़टाफ़ट” विक्की अपनी चालोमे लग चुका था।

खान साहब H2 के बाहर, दरवाजे के पास खड़े खड़े गाड़ी की भीड़, चढ़ने वालोंकी जल्दी को बड़े आराम से देख रहे थे, उन्हें क्या पता, यह आराम सब जल्दी ही काफूर होने वाला है।

….. पार्ट 2 बाकी…..
( यह कहानी, इसके सभी पात्र और घटना पूर्णतया काल्पनिक है और इसका किसीभी जीवित अथवा मृत व्यक्तिओंसे सम्बंध नही है। )

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