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आखिर कब तक?

क्या कर सकती है रेल प्रशासन, जब कोई ट्रेन में दम घूँटके मर जाये?

90 आसनोंकी क्षमताके द्वितीय श्रेणी डिब्बेमे 200 लोग घुस जाते है, 72 लोगोंकी क्षमता के स्लिपर डिब्बेमे 8 RAC तो अधिकृत रूपसे ज्यादा यात्रा कर रहे होते है तो क्या फर्क पड़ जाएगा सौ, सवासौ लोग और वेटिंग लिस्ट वाले भी स्लिपर क्लास में चढ़ जाए?

रेलवे जिसे आरक्षित डिब्बे कहती है, वह स्लिपर क्लास, वातानुकूलित शयनयान डब्बोंमे सुबह तड़के 4 बजेसे “चाय चाय” करते बेचने वाले घुस जाते है, दिनभर भेल, समोसे वाले इत्मिनानसे अपना धंदा करते है, भगवान के नाम पर मांगने वाले, हक जताकर दस दस रुपए लेकर दुवाएं बेचनेवाले तृतीयपंथी जब बिना किसी रोकटोक के अपना गुजरबसर करने रेल को अपनी बापौती समझ सकते है तो दो चार आठ दस बिना टिकट लोग यात्रा कर ले तो कौनसी बडी बात हो जाएगी? यह तो चलती गाड़ी की बात है, प्लेटफॉर्मोपे भी यात्री ज्यादा मूल्य देकर खाद्यसामग्री खरीदता है। और यह सब रेल्वे प्लेटफार्म पर पचास पचास सीसीटीवी कैमरे लगे होने के बावजूद चलते रहता है। तो आप रेल प्रशासन से उम्मीद क्या क्या कर लोगे?

आखिर क्या कर सकता है रेल प्रशासन, जब बेचनेवाला बेच रहा है और खरीदने वाला खरीद रहा है। अपने अपने पैसे है, जैसे मर्जी चाहे खर्च करें। है ना?

लेकिन एक बात है, चाहे जितनी अनदेखी हो, कायदेकानुन के पालन की कोताही हो, पर रेल के डिब्बे में यात्रीका घुट कर मर जाना ये तो हद ही हो गयी। क्या कोई मरने के लिए भी रेल में आता है भला? सच मे, बताइए, क्या कर लेगा प्रशासन?

वह कौनसा दिन होगा, जब प्रशासन अपनी आंखें खोलेगा? कब बन्द होंगे गैरकानूनी बिक्रेता, कब बन्द होंगे गैरकानूनी रूपसे रेलोंमें झाड़ू लगानेवाले अनाधिकृत सफाईवाले, खुद बिना टिकट चलनवाले और पैसे लेकर टिकटधारी यात्रिओंको दुवाएं देनेवाले? कब दिखेगा यह सब रेल प्रशासन की आँखोंको? जो लगे हुए है सीसीटीवी, उनसे तो नही हो पा रहा यह काम। तो बताइए कौनसा कैमेरा लगवाए, जिनसे यह आम दिखाई देते दृश्य रेल प्रशासन को भी दिख जाए।

दम घुटने वाली ख़बर, पटना से दिल्ली की ओर जा रही ट्रेन की थी। एक युवती भीड़ के चलते दम घूँटकर मर गयी और कल और ख़बर आ गयी की केरल एक्सप्रेस में गर्मी के चलते 4 बुजुर्गों की जान चली गयी। वे लोग आगरा से कोयम्बटूर जा रहे थे और ट्रेन के स्लिपर डिब्बे में दोपहर तीन बजे आगरा से चढ़े थे।

किसका दोष था, क्या गलती हुई? हम तो इन घटनाओं से बहोत आहत है। अब इसके लिए जाँच होगी, समीक्षा होगी, रिपोर्टें आएगी और फिर कोई निष्कर्ष निकलेगा। लेकिन रेल प्रशासन, अपने आप को कब चाकचौबंद करेगा? आखिर कब?

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