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हमारी रेल स्वच्छ, सुंदर और सुरक्षित।

आजकल मुख्यालय के आदेश का पालन किया जा रहा है, विभाग के आला अधिकारी द्वितीय श्रेणी के डिब्बों में, यात्रिओंके साथ, उनके यात्रा के अनुभवोंसे अपने विभाग को दुरुस्त करने की कवायद करेंगे।

साउंड्स गुड़, है न। सुनने में काफ़ी अच्छा लगता है। रेलवे के सबसे नीचेकी श्रेणी के डिब्बे में रेलवे का उच्च श्रेणी का अधिकारी यात्रा कर रहा है, डिब्बे के लाइट्स, पानी, टॉयलेट की सफाई, यात्रिओंकी तकलिफोंके बारे में पूछताछ की जा रही है। कोई अव्यवस्था दिखाई दी तो उसे तुरंत सम्बन्धित कर्मचारियों से व्यवस्थित किया जा रहा है।

जमीनी हक़ीक़त यह है, द्वितीय श्रेणी की बात तो छोड़ दीजिए, उसमे यात्रा क्या आप प्रवेश भी कर नही पाओगे, लेकिन शयनयान स्लिपर की हालत भी बदतर है। आप यकीन नहीं कर सकते 72 आसनोकी क्षमता वाले स्लिपर में 150 लोग बैठे होते है और सौ-सव्वा सौ खड़े खड़े यात्रा करते है। जब एक डिब्बे में क्षमता से 3 गुना लोग यात्रा कर रहे हैं तो कितने लोग अधिकृत यात्री है और कितने अनाधिकृत? इस का ज़वाब कोई साधारण व्यक्ति भी दे देगा।

इतनी बेतहाशा भीड़ में अनाधिकृत विक्रेता, भिखारी, तृतीयपंथी, पैसे लेकर झाड़ू लगानेवाले रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था सम्भालने वालोंके सामने अपना रोज़गार पूरी शिद्दत के साथ करते रहते है।

आप सोचते होंगे, भीख मांगना, झाड़ू लगाकर पैसे मांगना क्या यह व्यवसाय है? जी, जब गाड़ियाँ तय की जाती है, कहाँ से कहाँ तक जाना है यह तय किया जाता है, एरिया बँटता है यानी सब कुछ सिस्टेमेटिक तरीकेसे फ़ाइनल किया जाता है तो व्यवसाय ही तो है।
एक एक अनाधिकृत व्यवसायी, हर दिन सैकड़ों, हजारों इकठ्ठा करता है और फिरसे दूसरे दिन की लाईन लगाने में लग जाता है।

अब आपको क्या बताए? जो पानी की बोतल 20 रुपये में बिकती है, वह विक्रेता को केवल 6-7 रुपए में मिलती है और गर्मी के सीज़न में एक बन्दा कमसे कम 100 बोतले एक गाड़ी में बेचता है। खाने के मुल्योंमे भी यही होता है, IRCTC का रेट 50 रुपए है तो गाड़ी में बिकता है 100, 120, 150 रुपयोंमें। बताइए कहाँ तक जा रहा है आपका गणित?

आते है फिरसे अधिकारियों की सेकण्ड क्लास डब्बोंकी सरप्राइज यात्रा पर, यह यात्रा कितनी सरप्राइज़ होती है इसका आंखों देखा हाल हमे एक कर्मचारी ने बताया। गाड़ी, उसका डिब्बा तय कीया जाता है। सुरक्षा कर्मी पहलेसेही डिब्बे का एक कम्पार्टमेंट वहाँ के यात्रिओंको खदेड़ कर खाली करा देते है। अनाधिकृत विक्रेताओं को और अवांछित लोगोंको पूर्वसूचना अनुसार नियंत्रित कर लिया जाता है। यात्रा नियमानुसार पूर्ण की जाती है और दूसरे दिन क्यो अगले स्टेशन, अगली गाडीसे ही फिर अपने अपने राग अलापने शुरू हो जाते है।

हम कहते है, सरप्राइज विज़िट ठीक है, रेलवे की ट्विटर शिक़ायत निवारण व्यवस्था बढियाँ है। अधिकारीगण अपनी व्यवस्थाएं दुरुस्त करते रहते है। मजबूती सुरक्षा में भी है। फिर कमी कहाँ है?

जरूरत यात्रिओंकी सजगता और रेल्वेके हर स्थानीय कर्मचारियों के तालमेल में है। यात्री यदि केवल अधिकृत विक्रेताओं से ही सामग्री खरीदें, अतिरिक्त मूल्य न दें, भिखारी, मांगनेवालोंको खड़ा न होने दे, चलता करे और इन सभी गतिविधियों में रेलवे के कर्मचारी, सुरक्षा बल यात्रिओंके साथ सदैव ततपरतासे, मुस्तैदी से खड़े दिखे तो यह परेशानीयां काफ़ी नियंत्रित हो जाएगी।

रेलवे के कर्मचारियों में चाहे वह चतुर्थ श्रेणी का ही क्यों न हो, सुरक्षा बलोंके जवानोंमें और यात्रिओंमें अपने देश की रेलवे, अपने नैशनल करिअर के प्रति सन्मान, अपनत्व और प्रेम की भावना जागना जरूरी है। देश का नागरिक जब सज़ग होता है तो देश साफसुथरा, सुरक्षित और सुंदर बनता है।

आइए अपना देश, अपनी रेल स्वच्छ, सुंदर और सुरक्षित बनाए।

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