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कुछ तो गलत हो रहा है।

चौंक गए न, हाँ हम तो भौचक रह गए जब एक इंजीनियरिंग के बच्चे ने हमसे कुछ पूछा। आज जब हम यात्रा कर रहे थे तो एक इंजीनियरिंग कॉलेज का छात्र जो रोजाना अपनी पढ़ाई के लिए, कॉलेज जाने हेतु गाड़ीमे यात्रा करता है, साथ मे बैठा था। हम हमारे सह यात्री से गाड़ी की भीड़, वेडरोंकी बेदारकारी ऐसीही कुछ बातें कर रहे थे। बच्चा सुन रहा था, यकायक बोल पड़ा।

अंकल, हम तो छोटे, आपकी तुलना में नासमझ है और यह बात बहोत बड़ी है। आप हमें बताए, रेलवे की 150 ml चाय की रेट मेन्यू में ₹5/- मात्र है। जब दूध 50 रुपए लीटर, पानी 15 रुपए लीटर, शक्कर 50 रुपए किलो, चाय पत्ती 300 रुपए किलो यह सब सामग्री ही इतनी कीमत की है तो सही क्वालिटी की चाय क्या 5 रुपए में मिल सकती है? 150 ml चाय में आप क्या सोचते हो की 75ml दूध मिलेगा? जिसकी कीमत करीबन 4 रुपए हो गयी, 10 ग्राम पत्ती 3 रुपए की। जब बेसिक कॉस्ट इतनी ज्यादा है तो अपेक्षाही कैसे अच्छे चीज की करेंगे, की 5 रुपए में आप को अच्छी चाय मिल जाएगी और तो और खाली कप की कीमत ही 1 रुपए है।

यही बात खाने की लीजिए आज कौन आपको 50 रुपए में नॉनवेज और 40 रुपए में वेज खाना देगा, जबकी कैसेरोल की कीमत ही 15 रुपए है?
यही तो भ्रष्टाचार की गंगोत्री है। उदाहरण लीजिए, सरकारी विभाग रोड के टेंडर निकालती है, रोड़ की बेसिक कॉस्ट 10 करोड़ है, जबकी टेंडर भरे जाते है बिलो कॉस्ट में और काम जब दीया जाता है तो पता चलता है की 8 करोड़ वाले को रोड का ठेका मिला। जब बेसिक कॉस्ट के 20% नीचे किसीने काम लिया है तो वह काम किस दर्ज़े का रहेगा यह काम शुरू होने के पहले ही पता चल जाता है। बिलो कॉस्ट के बिड सम्बंधित विभाग रद्द क्यों नही करती? कोई बिना कमाई करें अपने जेब से खर्चा भला क्यों करने लगा?
तकलीफ़ यह है, सब आँखे मूंदे पड़े है। काम देने वाले इंजीनियर, काम करनेवाले इंजीनियर, काम परखने वाले इंजीनियर और काम की सुपुर्दगी लेने वाले भी इंजीनियर। फिर काम खराब क्यों होता है? हम बताते है, जब काम चलता है, तो देश के आम नागरिक में कोई इंजीनियर, या एक्सपर्ट नही जिसे यह समझता हो कि कुछ तो गलत हो रहा है? लेकिन कोई बोलता ही नही और न हो कोई शिकायत करता है। बस चलते रहता है।

आप बताए, सामान्य श्रेणीके 90 लोगोंकी क्षमता के डिब्बे में 150 लोग, स्लिपर में 72 लोगोंकी क्षमता में 150 लोग किस तरह यात्रा कर सकते है? लेकिन रोजाना करते ही है न? किसी को कुछ फर्क ही नही पड़ता।

जब वेटिंग लिस्ट टिकट कन्फर्म नही होता तो रद्द हो जाता है फिर भी लोग यात्रा कैसे कर पाते है यह मेरे लिए पहेली है। यहाँ स्लिपर डिब्बे में सामान्य श्रेणी के यात्री घुसे पड़े है, TTE ने सबकी पेनाल्टी की रसीद बना दी, लेकिन उतारा किसी को भी नही। यह यात्री भो इसी डिब्बे में घुसकर यात्रा कर ही रहे है न? यह जो सामान विक्रेता है, पान गुटखा सिगरेट, समोसा कचोरी, स्टेशनरी बेच रहे है। यकीन मानिए आप, इनके पास अथॉरिटी तो छोड़िए टिकट भी नही होगा। यह भीख मांगने वाले क्या रेलवे की ओरसे अधिकृत कागजात लेकर गाड़ी में भीख मांगने निकले है। छोड़िए अंकल सभी खाली बातें करते है, सब के सब आँखे मूंदे सोने का नाटक करते है। हमने कुछ नही देखा, हमे कुछ दिखाई नही दिया।

भाई साहब, बस बेहोश नही हुए हम। कितना कुछ बोल गया वह बच्चा। क्या कर रहे है हम? कौनसी दुनिया हम अपने आनेवाली पीढ़ी को देने जा रहे है?

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