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भारतीय रेलवे की सवारी गाड़ियाँ

भारत मे देश के किसी कोने से किसी भी कोने तक पहुंचने का मूल्य 50 पैसे। चौंक गए न? यह भारतीय डाक के पोस्टकार्ड का मूल्य है। पोस्टकार्ड हमारे भारत देश की ग्रामीण व्यवस्था का मूलभूत संपर्क का साधन है। चाहे कितनाही बिकट पता हो, भारतीय डाक विभाग अपने इस पोस्टकार्ड को लिखित पते पर बराबर पोहोंचाही देता है। पोस्टकार्ड हमारे देश में आम जनता की सबसे सुलभ, सस्ती और सुयोग्य सेवा के दायरे में आता है। चूँकि पोस्टकार्ड ‘ओपन मेसेज’ स्वरूप में होता है, तो लिखित मेसेज की जानकारी भी सेवा की महत्वता और जरूरी तीव्रता बढ़ाती थी।

आज रेलवे के लेख में पोस्टकार्ड का उदाहरण देने का कारण है, भारतीय रेल की सवारी गाड़ियाँ। यह ठीक डाक विभाग के पोस्टकार्ड की सेवा से मिलती जुलती है। यह सभी गाड़ियाँ देश के ग्रामीण जनता को शहरोंसे सम्पर्क करने की बेहद अहम कड़ी है। जिस तरह मामुली शुल्क लेकर भारत सरकार पोस्टकार्ड की सेवा देती है उसी तरह भारतीय रेल भी निम्नमात्र किराया 17 पैसे से 25 पैसे प्रति किलोमीटर से ग्रामीण यात्रिओंको शहर से जोड़े रखने का शुल्क लेती है। ऐसी कोई मेन लाइन, ब्रांच लाइन नही की जिसमे यह सवारी गाड़ी न चलती हो। ब्रिटिश काल मे यही सवारी गाड़ियोंसे मार्ग के छोटे छोटे स्टेशनोके जमा हुवा रेवेन्यू अपने मुख्यालय तक पोहोंचाने का जरिया थी। पूरे भारतीय रेलवे का नेटवर्क देखा जाये तो सवारी गाडीसे पूरे देशभर में घुमा जा सकता है, बस उतना आपमे धैर्य, पेशंस होना जरूरी है।

देश की सबसे लंबी दूरी की सवारी गाड़ी है काचेगुड़ा से गुंटूर के बीच चलनेवाली 57305 गुंटूर पैसेंजर जो की 623km का लंबा रन करीबन 18 घंटे में पूरा करती है और किराया लेती है 105 रुपए प्रति व्यक्ति। याने महज 17 पैसे प्रति किलोमीटर या यह कहिए यात्रा में लगने वाले समय के हिसाबसे 6 रुपए से कम प्रति घंटा।

इन सवारी गाड़ियोंकी किफायती रेट की बात करें तो, आज शहरोंमें किसी को 2-5 km ऑटो, टेक्सीसे कहीं जाना पड़ जाए तो 40-50 रुपए किराएके लगना सीधी बात है। शहर की सिटी बस, पब्लिक सर्विस भी कमसे कम 2 से 3 रुपए प्रति किलोमीटर तो चार्ज करती ही है।

यह तो है, की पैसेंजर गाड़ियोंकी सेवा कितनी जरूरी है, लेकिन क्या रेलवे प्रशासन इसे पोस्टकार्ड वाली ट्रीटमेंट देते है क्या? तो इसका उत्तर बेशक नही ऐसा आएगा। आम यात्रिओंके लिए यह सवारी गाड़ियोंके सफर कितने मुश्क़िलोंभरे रहते है। आपने देखा की 623km के लिए 18 घंटे याने एवरेज 34km प्रति घंटा गती तय होती है। यह भी गाड़ियाँ उसी ट्रेक पर चलती है जिसपर राजधानी और बाकी मेल / एक्सप्रेस गाड़ियाँ चलती है। डिब्बे, लोको, लोको पायलट, ओपरेटिंग स्टाफ़ सारे के सारे वहीं लेकिन गाड़ी को समयपर चलाने की बात जब देखते है हमेशा फिसड्डी। हमेशा यह सवारी गाड़ियाँ बेटाइम चलते रहती है। प्रायॉरिटी की तो मांग ही नही लेकिन शेड्यूल टाईम में तो चलना चाहिए, क्या यात्रिओंकी यह मांग वाजिब नही? छोटे छोटे गाँव की यह गाड़ियाँ दिनभर में ज्यादा से ज्यादा 2 या 3 होती है जो गाँव के लोगोंका शहर जाने के लिए एकमात्र साधन होती है। गाँव से कई छात्र पढ़ने के लिए शहर जाते है, बीमार लोग इलाज के लिए, तो बहोत से लोग अपने रोजगार के लिए शहर जाने के लिए इन्ही गाड़ियोंके सहारे रहते है।

सवारी गाड़ियोंके यात्रिओंकी अपेक्षा किराया कम देने की बिल्कुल नही अपितु गाड़ी समयसे चले यह है। गाड़ी 1 – 1 घंटे किसी बडे स्टेशन से 2 – 4 किलोमीटर दूर आउटर इलाके में सिग्नल का इंतजार करते खड़ी कर दी जाती है तो अंदर बैठे मरीज यात्री, छात्रों, बड़े स्टेशन जाकर दूसरी गाड़ी पकड़ने वाले यात्री, रोजी पर जानेवाले कर्मियोंपर क्या बीतती होगी, क्या प्रशासन इसके बारे में कभी सोचता है?

माना की बड़े स्टेशनोंसे आसपास के गावोंके लिए EMU, DEMU जैसी लोकल्स चलाई जा रही है, लेकिन लम्बी दूरी की पैसेंजर गाड़ियोंका अस्तित्व प्रशासन नकार नही सकता, इन गाड़ियोंका जरूरी है की समयपर चलाया जाना चाहिए। जब गन्तव्य स्टेशनके आगमन समय मे ढेर सारा मार्जिन समय लेने के बावजूद रेल अधिकारीयों की लापरवाही के चलते इसे प्लेटफार्म नसीब नही होता और यात्री हमेशा की तरह इन गाड़ियोंको कोसते अपने कामोंकी ओर रुख करते है।

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