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लीजिए, यह है तर्कसंगत किरायोंका आधार।

“हैं भाई? जे तुम लिख दोगे, इस प्रकार किराए लगाओ तो क्या वे तर्कसंगत हो गए? बात करते हो, हर क्लास का भाड़ा 120 दिन से 30 दिन के रिजर्वेशन के लिए डबल कर दो, हैं भाई, यह क्या बात हुई?” लाला जी उबल पड़े।

शायद लाला जी ने, रेलदुनिया का,

कैसे हो रेल किराए तर्कसंगत https://wp.me/pajx4R-A2

आर्टीकल पढ़ लिया था। वैसे भी लालाजी को महंगाई पर लेक्चर देना बेहद पसंद था। चाहे कोई चीज के दाम बढ़ जाए, लालाजी अपने कैलक्यूलेटर से सीधे कितने परसेंट महंगाई बढ़ गई इसका हिसाब फौरन निकाल देते। हाँ, यह आवाज तब तक तेज रहती जब तक उनके केंद्र सरकार की पेंशन में महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी की घोषणा न हो जाए।

हम भी हर तरह के विवाद को सामनेसे झेलने तैयार थे। “चलिए, बैठकर बात करते है। एक एक प्वॉइंट आरामसे समझते है। लालाजी, जब कोई यात्री 120 दिन पहले याने बुकिंग ओपन होते ही अपनी सीट बुक कराने पोहोंच जाता है मतलब उसका यात्रा करना पूर्णतया निश्चित है, उसे हर तरह से कन्फर्म जगह चाहिए ही है, और वह अपनी यात्रा रद्द भी नही करने वाला, उसकी यात्रा भी बहोत करके लंबे अंतर की रहेगी और तत्काल वाली बर्थस का कोटा छोड़कर बाकी सारी बर्थस का बुकिंग उसके लिए उपलब्ध है, तो यह प्रिमियम सर्विस हुई के नही? और मुम्बई से वाराणसी याने 1500 किलोमीटर का टिकट वह निकालता है तो 20 की जगह 40 रुपए देने में ओवरऑल कितने परसेंट बढ़ जाएंगे? यह नॉन रिफंडेबल भी होना चाहिए चूँकि आप एडवान्स रिजर्वेशन करा रहे हो तो आपकी रेल यात्रा करना निश्चित है तो रद्दीकरण के वक्त रिफण्ड के केल्क्युलेशन में आरक्षण शुल्क के अलावा बाकी रकम पर कैंसलेशन चार्जेस काटकर बाकी रकम की वापसी होगी।

दूसरा प्वाइंट यह है, 120 दिन पहले टिकट आरक्षित करने के बाद, यात्री चेंज ऑफ नेम ( अपनी जगह अपने रिश्तेदार को यात्रा कराना ), चेंज ऑफ बोर्डिंग ( अपनी सुविधानुसार यात्रा जारी करने का स्टेशन बदलना ) या पोस्टपोनमेन्ट ऑफ जर्नी ( अपनी यात्रा की तारीख बदलना ) आदि कई तरीके अपनाकर अपनी यात्रा में बदलाव कर सकता है, इतनी सब सुविधा के चलते उसे थोड़ा ज्यादा प्रिमियम देने में परेशानी कैसी?

तीसरा मुद्दा यह है, जब ज्यादा प्रिमियम देने की बात आएगी, याने ज्यादा किराया लगने का सवाल आएगा तो गैरकानूनी तत्व अपनेआप इन टिकटोसे दूर रहेंगे। और यात्रा बदलाव के कुछ अलग रूल्स भी इन 120 दिन के एडवान्स रिजर्वेशन टिकटोंपर लगाए जा सकते है। इससे वास्तविक आरक्षण चाहनेवाले यात्रिओंके लिए सिटोंकी उपलब्धता बढ़ेगी। रेलवे का राजस्व बढ़ेगा, टिकट से होने वाली आय बढ़ेगी।”

लालाजी : ” भाया, थारी ये दलील तो ठीक है, पर किरायोंमे तो ऐसे ही बढ़ोतरी होण वाली है, इन छोटी बड़ी, मतलब 20 के 40 बढाके क्या हो जाएगा?”
” तो लालाजी, इसे ही तो तर्कसंगत कहते है। हम आपको यही तो समझा रहे है, की किराए सीधे परसेंटेज में न बढाते हुए, एक एक प्वॉइंट से सिलसिलेवार बढाए जाए, ताकी यात्री को समझ आए, वह किस सेवा के लिए क्या मूल्य चुका रहा है?”

आगे प्लेटफार्म टिकट भी प्रिमियम वाले होने जा रहे है। जब आप एयरपोर्ट जैसी सेवा चाहते है तो क्या उसका मूल्य नही देना पड़ेगा? बताइए, क्या आपके जमाने मे रेलवे प्लेटफॉर्मोंपर इतनी सफाई थी, फ्री इंटरनेट सेवा थी, पाँच तारा विश्रामालय थे? यह सब छोड़िए, बुनियादी बातें ही बता दीजिए, रैम्प, एस्कलेटर, लिफ्ट, भरपूर और आरामदायक आसन व्यवस्था, ढेरों लाइटें, पंखे, चिकनी फ्लोरिंग, वेदर शेड, साफ पेय जल, चिकित्सा सुविधा और क्या क्या।”

लालाजी : भाई, थारा सब सही है। सचमें आजकल स्टेशन जाऊँ तो ऐसा लागे है, की कोई परदेस में आ गया हूँ। चाल आगे देखां, बजट में क्या होता है।

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