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स्पेशल ट्रेनोंकी असल हक़ीकत

‘4200 श्रमिक स्पेशल गाड़ियोंमे करीबन 1 करोड़ श्रमिकोंने यात्रा कर अपने गाँव लौटे।’ ‘रेलवे कर्मचारी भी कोरोना योद्धा’ तो कोई वृत्तपत्र, “श्रमिक ट्रेन राह से भटकी”, “श्रमिकोंको रेल गाड़ी में खाना, पीने का पानी नही मिल रहा है” स्पेशल गाड़ियोंके यात्री बेहाल’ इस तरह के लेख बड़े बड़े न्यूजपेपर की हेडलाइन्स बने थे। सोशल मीडिया पर भी लोग फ़ोटो जोड़ जोड़ कर अपने मन मुताबिक गुण दोष मढ़े जा रहे थे। जिसको जैसे समझ आ रहा था वह किसी एक बाजू को पकड़ सही गलत का फैसला करते जा रहा था।

इन बातों, ख़बरोंको बहोत ज्यादा वक्त नही बिता है। हाल ही में एक लेख पढ़ने में आया और हमे लगा की रेल प्रशासन की भी टेक्निकल स्थिति लोगोंके नजर में आना जरूरी है। ऐसी परिस्थितियों में हम किसी घटना का समर्थन या किसी संस्था या व्यक्तिविशेष पर दोषारोपण नही कर सकते, केवल परिस्थिति का अवलोकन कर सकते है।

हमारे विचार से किसी भी वाकयात या घटना पर उसके समर्थन में या विरोध में बोलना बहोत आसान होता है। जब घटना सामने घटित होते रहती है या होने की स्थिति आन पड़ी है तब उससे छुटकारा / निज़ात पाना या उस पर सर्वोत्तम इलाज़ ढूंढना उतना ही मुश्किल होता है।

रेल प्रशासनपर श्रमिकोंकी यातायात करना यह अकस्मात आन पड़ी जिम्मेदारी थी। लॉक डाउन में संक्रमण रोकने के लिए रेल के पहिए थमे, यह भारतीय रेल के लिए ऐतिहासिक घटना ही थी। महायुद्ध काल मे भी रेल का परिचालन बन्द नही किया गया था। सारी यात्री गाड़ियाँ तुरन्त बन्द की गई। लेकिन मालगाड़ियां, पार्सल विशेष गाड़ियाँ तो चलाई जा रही थी। हजारों, लाखों कर्मचारियों को घर रुकने को बोला गया। छोटी बड़ी बीमारी वाले और 50 वर्ष या उससे ज्यादा उम्र के कर्मचारियोंको ड्यूटी पर आने की सख्त मनाही की गई। केवल 10 से 25 % कर्मचारियोंके भरोसे रेल चलाई जा रही थी। ऐसी स्थितियोंमे श्रमिकोंके बढ़ते हुजुम के लिए गाड़ियोंको पटरी पर उतरना उतना ही पेचीदा प्रश्न था जितना संक्रमण काल मे कर्मचारियोंकी फूल स्ट्रेंथ लगाकर ड्यूटी करवाना।

जब श्रमिक गाड़ियाँ शुरू कराई गई तब की स्थितियाँ देखे तो केवल 25% या उससे भी कम और उसमे भी स्किल्ड अनुभवी लोगोंके बिना इतनी गाड़ियोंको नियंत्रित करना कोई मुँह का खेल नही था। माना की रेलवे इससे कई गुना गाड़ियाँ चलाती है, लेकिन कर्मियोंके दल एक चौथाई रह जाए तब क्या हश्र होगा यह सामने है।

अब बात करते है, उस वक्त की जब गाड़ियाँ अपने नियोजित मार्गोंकी जगह अलग मार्गोंसे चलानी पड़ी। जितनी भी विशेष गाड़ियाँ, श्रमिक स्पेशल गाड़ियाँ बड़े मेट्रो सिटीज से निकल उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखण्ड, ओडिशा की ओर जा रही थी। याने सारी गाड़ियोंका दबाव किसी एक ही दिशा की ओर था। प्लेटफॉर्म्स और सेक्शन ब्लॉक होने लगे। रेल ट्रैफिक कोई रोड़वेज की तरह नही होता कि रोड़ पर कुछ अवरोध आ जाए तो बाजू के खेतोंसे मार्ग निकाल लिया जाता है। सेक्शनपर गाड़ियोंका जाम लगता चला गया और कन्जेशन टालने के लिए गाड़ियोंको डाईवर्ट किया गया। जब गाड़ी डाईवर्ट होती है तो उसे खाली मार्ग , सेक्शन ब्लॉक की तलाश रहती है न की उसे यह विचार किया जाता है, की गाड़ी को कौनसे राज्य से ले जाना है और कौनसे से नही। जो भी रूट वेकण्ट हो, जिस ब्लॉक में गाड़ी को आगे बढ़ने का मौका मिल रहा था उसे आगे बढाया गया और पीछे के रुकी हुई गाड़ियोंको प्लेटफॉर्म पर लाया जा रहा था।

रेल प्रशासन ने श्रमिकोंको न सिर्फ उनके गाँवोंतक पहुचाने की जिम्मेदारी ली थी बल्कि उनके खानपान, उनकी सुरक्षा की व्यवस्था भी भली भाँति सम्भाली थी। इस तरह का संचालन लगभग सारे रेल कर्मचारियोंके लिए बिल्कुल नया था। उसमें सीमित कर्मचारियों के साथ ऐसी अनपेक्षित अकस्मात आयी परिस्थितियोंसे निपटना और परिस्थितियों से बिल्कुल अपरिचित, महामारी से सुरक्षा के तरिकोंका ज्यादातर मालूमात नही, ऐसे कर्मचारियों की हाजिरी में रेल प्रशासन ने यह जिम्मेदारी का शिवधनुष न सिर्फ पेला बल्कि अच्छी तरह निभा भी लिया।

कुछ अव्यवस्थाएं जरूर हुई, गाड़ियाँ असमय, अस्थानों से घूमते हुए अपने गन्तव्यों तक पहुंची। लेकिन अपने टारगेट, अपने गोल, अपनी रेस उसने पूरी की। यही रेलवे की अचीवमेंट है, कामयाबी है और जिसके लिए रेल प्रशासन, उसके सारे कर्मचारी अभिनंदन और गौरव के पात्र है

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