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ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग होनी चाहिए या नही इस पर डिबेट।

अब तक हमारे सभी पाठक, ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग क्या होती है यह अच्छी तरह समझ गए होंगे। रेल प्रशासन इसे आने वाले नए टाइमटेबल से लागू करने जा रही है। हमारे कुछ पाठकगण इस ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग के प्रति साशंकित है, किसी को यह खिलवाड़ लगता है तो कोई बहोत उत्साहीत है। हमने सोचा, झीरो बेस टाइमटेबलिंग होनी चाहिए या नही इस पर एक डिबेट ले कर दोनों मुद्दे सामने रखते है, फिर आप लोग जो निर्णय ले।

ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग का सीधा मतलब है कि पुरानी सारी ट्रेनें, उनके शेड्यूल को भुलाकर, वैनिश कर नए सिरे से एक एक गाड़ी का शेड्यूल बनाना और पूरे टाइमटेबल की रचना करना। ऐसे में रेल प्रशासन ने अपने तेज गति वाले टाइमटेबल में सबसे बड़ी बाधा निर्माण करने वाली पैसेंजर ट्रेनों को एक्सप्रेस में कन्वर्ट करने का एक आसान सा उपाय ढूंढ लिया। पैसेंजर को एक्सप्रेस में कन्वर्ट करना याने उसका स्पीड बढ़ना और स्पीड बढ़ने के लिए स्टापेजेस कम करना। अब आप बताइए क्या यह उन छोटे छोटे स्टेशनोंके यात्रिओंके साथ सीधी नाइन्साफ़ी, अन्याय नही है? और यदि स्टापेजेस बन्द किए बिना यह गाड़ियाँ उसी तरह चलती रही तो उनमें बैठे यात्रिओंके साथ एक्सप्रेस के किराए वसूल करना यह भी तो अन्याय ही है।

दूसरा पैसेंजर को कन्वर्ट करना समझ आया लेकिन उन सदाबहार एक्सप्रेस और लिंक एक्सप्रेस गाड़ियोंका क्या जीन्हें बन्द, शार्ट टर्मिनेट या डाईवर्ट किया जा रहा है? 19019/20 बांद्रा देहरादून एक्सप्रेस गाड़ी को मुख्य मार्ग से हटाकर रतलाम, चित्तोड़गढ़, कोटा होकर चलाने पर बात अड़ी है। यह गाड़ी रतलाम से कोटा के बीच 220-30 किलोमीटर के लिए करीबन 7 घंटे का वक्त लेती है और 19 स्टेशनोंपर रुकती है। बिल्कुल फुल्ली ऑक्युपाई रहती है यह ट्रेन। उसी प्रकार इंदौर – उज्जैन – जयपुर लिंक बन्द की जा रही है। इंदौर से जयपुर और वापसी के लिए यह लिंक एक्सप्रेस बेहद लोकप्रिय है। बड़े राजनेता इस गाड़ी के बन्द किए जाने पर नाराज है।

यह तो 18 क्षेत्रीय रेलवे में कुछेक क्षेत्र के मिनिट्स आने पर के हाल है, यदि बाकी क्षेत्रीय रेलवे के भी परीपत्रक इसी अंदाज में आएंगे तो इस ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग की शुरुवात कौनसे सिरे से करनी पड़ेगी इसका पता नही।

ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग के लिए इस तरह के विरोध के सुर गूँज रहे है तो दूसरी तरफ प्रशासन अपनी बात पर अड़ी है और अपने सारे भविष्य के प्लानिंग की बातें करती है जो इसी ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग से जुड़ी है।

ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग के फेवर के मुद्दे भी बताते है। जब लगभग 3 महीने से यात्री गाड़ियाँ न के बराबर चल रही है तो ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग के लिए इससे बेहतर वक्त कोई दूसरा हो ही नही सकता। आप भूल जाइए की 19019/20 या अनेकों लिंक एक्सप्रेस ऐसी कोई गाड़ियाँ चल रही थी। जब सिरे से टाइमटेबलिंग होंगी तो ढेरों तेज और आरामदायक, सुविधाजनक समयोंके साथ यह गाड़ियाँ अवतरित होंगी। आज गाड़ियाँ नही चल रही है तो यात्री किसी ओर स्टेशनोंसे गाड़ियोंकी सेवा ले ही रहे है न? छोटे स्टेशनोंके यात्री किसी आस पास के जंक्शन से गाड़ी पकड़ या छोड़ ही रहे है न? यदि लम्बी दूरी की गाड़ियाँ उदाहरण के लिए वहीं बांद्रा देहरादून एक्सप्रेस लीजिए 1698 किलोमीटर के इस लंबे स्पैन में 98 स्टापेजेस याने एवरेज हर 17-18 किलोमीटर पर स्टापेजेस। यह कोई एक्सप्रेस गाड़ी है? इंदौर जयपुर लिंक लीजिए इंदौर पैसेंजर के 5-6 डिब्बे, भोपाल जयपुर एक्सप्रेस में उज्जैन में जुड़ते है। याने उज्जैन में 30 से 40 मिनिट का स्टॉपेज, दो लाइनें शंटिंग के लिए ब्लॉक, दोनोंमेंसे कोई गाड़ी विलम्बित हों तो दूसरी के लिए इतन्जार याने और देरी। यह लिंक एक्सप्रेस की व्यथा है। ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग में यह सब हटा कर के नई पुनर्रचना में डायरेक्ट गाड़ियाँ मिलेगी। छोटे स्टेशनोंके लिए इंटरसिटी, मेमू, डेमू गाड़ियाँ मिलेगी।

200-300 किलोमीटर के लिए कोई गाड़ी 3.5, 4 घंटे लगा रही है तो कोई एक्सप्रेस पैसेंजर को लाज आ जाए ऐसे 7, 7.5 घंटे लगा रही है 15017 लोकमान्य तिलक टर्मिनस गोरखपुर काशी एक्सप्रेस भुसावल से 13.45 को निकल रात 21.05 को इटारसी पोहोंचती है। यह अंतर मात्र 307 किलोमीटर का है। क्या आपको नही लगता बरसोंसे इसी समय से चलने वाली गाड़ियोंमे सुधार की जरूरत है? ब्रिटीशोंके कालसे आ रही इस तरह के टाइमटेबलिंग की पुनर्रचना किया जाना एकदम उचित कदम है।

हमारा यह मानना है ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग अवश्य होना चाहिए। परिवर्तन यह प्रकृति का नियम है। गाड़ियाँ बन्द करना, मार्ग बदलना, पैसेंजर को एक्सप्रेस में तब्दील करना या शार्ट टर्मिनेट करना यह सब इन नए सिरे से टाइमटेबल बनाने के शुरवाती झटके है। रेल प्रशासन ने यात्रिओंको इत्मीनान, भरोसा दिलाना चाहिए कि बदलाव यात्रिओंके जरूरत के हिसाब से भी होते रहेंगे। जहाँ गाड़ियोंकी जरूरत होंगी वहाँ पर गाड़ियाँ निश्चित ही शुरू की जा सकती है। फिर वह एक्सप्रेस की जगह मेमू या शटल भी हो सकती है। रोजाना वाली लिंक एक्सप्रेस बन्द हो कर कोई साप्ताहिक या द्विसाप्ताहिक सीधी गाड़ी मिल रही है तो इसमें हैरान ना हो। यदि लिंक वाले स्टेशन का वेटेज ज्यादा होगा तो उनकी गाड़ी की फ्रीक्वेंसी याने फेरे बढ़ाए जा सकते है।

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