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रेलवे अपने संसाधनोंके साथ, आपकी सुखसुविधा के लिए जूझ रही है।

किसी भी उद्योग, व्यवसाय को यशस्वी तब माना जाता है, जब वो करनेवाले को कुछ कमाई कर के दे। हम उद्योग या व्यवसाय को चलाने के खर्च को लागत बोलते है और कमाई को उत्पन्न। अपने उद्योग को हमेशा चलता रखने, उसमे समय समय पर हुए आधुनिकता की वजह से लाए गए बदलावोंपर खर्च करते रहते है जो की हमारे कमाई, उत्पन्न के हिस्से से होने वाला उद्योग में लगाए जाने वाला प्रमुख अंग होता है।

रेलवे यह भी भारत सरकार द्वारा चलाए जाने वाला एक उद्योग ही है, माना की सामाजिक जिम्मेदारीयों का वहन करना इसका प्रमुख उद्देश्य है, लेकिन इस उद्योग को भी तो वही सब स्थितियों से गुजरना है न? लागत, खर्च, प्रॉफिट, लॉस यह सब।

रेलवे अपने बजेट में, अपने इस उद्योग चलाने को लगनेवाले खर्च को ऑपरेटिंग रेश्यो बताती है। इसका हिसाब इस तरह बताया जाता है की हर 1 रुपिया कमाने के लिए OR (ऑपरेटिंग रेश्यो) क्या रहा? तो विगत बजेट में रेलवे का OR था 98.4% इसका मतलब यह है, रेलवे ने अपना 1 रुपया कमाने के लिए साढ़े अठ्ठयन्वे पैसे खर्च किए है। यही जब रेलवे अपने उद्योग के OR को विकेन्द्रित करके देखता है तो OR 61% गुड्स पर और 136% यात्री ट्रैफिक पर नजर आता है।

यदि हम मोटामोटी स्टेटिस्टिक्स देखते है तो कुल मिला कर यह पता चलता है की रेलवे को यात्री ट्रैफिक में फायदा तो कुछ नही बल्कि खर्च ही करना पड़ता है, जबकी गुड्स में कमाया गया धन उसे यात्री गाड़ियोंमे खर्च करना पड़ रहा है।

अब यात्री गाड़ियोंकी भी टैली समझते है। मुख्यतः यात्री सेवाओंको दो भाग में बाँट दीजिए। वातानुकूलित ( AC ) और ग़ैरवातानुकूलित ( नॉन AC ) रेलवे में 31% ट्रैफिक AC से और 69 % ट्रैफिक नॉन AC से चलती है। जिसमे नॉन AC वाला ट्रैफिक का बहोत सारा हिस्सा जो की सबर्बन गाड़ियाँ और मेट्रो है, सब्सिडाइज्ड याने कम किरायेवाला है। अब इस सब्सिडी का भार या तो केंद्र सरकार झेलती है या राज्य सरकार या फिर नगर निगम। बताया जाता है कोलकाता मेट्रो का OR ऑपरेटिंग रेश्यो 240% है, याने 1 रुपिया अर्जित करने के लिए करीबन ढाई रुपिया खर्चा। तब बताइए कैसे होगी कमाई?

रेलवे की कमाई जब गुड्स में ज्यादा और यात्री वहन में कम है तो यह कहा गया है रेलवे के 17 में से 10 ज़ोन का OR 100% से ज्यादा है। किस तरह? हम उदाहरण के तौर पर लेते है, पूर्वोत्तर रेलवे, इस ज़ोन में ज्यादातर यात्री गाड़ियाँ चलती है और गुड्स ट्रैफिक बहोत ही कम वही पूर्व तटीय रेलवे में गुड्स गाड़ियोंके मुकाबले यात्री गाड़ियाँ बेहद कम चलती है। इसलिए पूर्व तटीय रेलवे का OR काफी अच्छा है। यहाँपर हर स्टेटिस्टिक्स या आंकड़े देने से यह लेख न रहते एक रिपोर्ट बन जाएगा इसीलिए हम यहाँपर केवल सारांश ही बता रहे है।

अब आप सोचते होंगे किराया या माल भाड़ा बढाने से इसका हल हो सकता है। लेकिन उसमे परेशानी यह है, की माल भाड़ा सड़क मार्ग के तुलनात्मक दृष्टिकोण से पहले ही ज्यादा है और उसी वजह से रेल्वे के कमाई का यह साधन दिन ब दिन कम होता जा रहा है। 1950-51 में गुड्स से कमाई 81% थी जो फिसलकर गत वर्षोंमें करीबन 40% तक आ गयी है। रेलवे गुड्स में लौह अयस्क, सीमेंट और कोयला ढोती है, जिसमे पॉवर स्टेशन्स मुख्य ग्राहक है। वही अनाज या दूसरी कमोडिटी के मामले में रेलवे का मुकाबला रोड़ से होता है, जिसमे सड़क मार्ग बाजी मार लेता है। सड़क मार्ग में डोअर टू डोअर सेवा मिलती है, जबाबदेही सीधी रहती है। माल खेतोंसे, वेयर हाउस से सीधा मंडी तक जाता है जो रेलवे में नही हो पाता।
दूसरा यात्री किरायोंमे AC क्लासमें अब किराया बढ़ाने की गुंजाइश न के बराबर है, पहले ही उच्च श्रेणी के यात्री हवाई सेवा, सड़क मार्ग पर वॉल्वो, कार की तरफ मुड़ गए है और नॉन AC में जनहित का भारी दबाव है। चूँकि आम जनता का यात्रा साधन नॉन AC होने से इसमें बढ़ोतरी नही की जा सकती, ऊपर उपनगरीय गाड़ियाँ भी भारी सब्सिडी में चलती है।

अब इतनी सारी समस्याओंके साथ रेलवे को अपना सारा साजोसामान का रखरखाव, उनका उन्नयन याने अपग्रेडेशन भी करना होता है। आए दिन नई गाड़ियोंकी मांग होते रहती है, नए मार्ग, गेज कन्वर्शन, मार्गोंका दोहरीकरण, विद्युतीकरण यह सब की माँग है ही।

रेलवे अब एक अलग तत्व पर काम करने का प्रयत्न कर रहा है। अपना मुख्य आधार गुड्स एवं पार्सल की ट्रैफिक को हासिल करने का। जो DFC डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर माल यातायात के लिए अलग से लाइने बनाने से हासिल करने की कोशिश है। दूसरा यात्री ट्रैफिक में यात्रिओंको फायदे वाले सेगमेंट याने वातानुकूलित 3 टियर की तरफ आकर्षित करना, उसके लिए जितनी भी नई गाड़ियाँ शुरू की गई है उसमें ज्यादातर वातानुकूलित थ्री टायर वाली हमसफ़र एक्सप्रेस गाड़ियाँ है। निजी अत्याधुनिक गाड़ियोंको लाना, अपनी जमीनोंका व्यावसायिक उपयोग करना, स्टेशनोंको लीज पर देना जिसके लिए उन्हें आधुनिकीकरण किए जाने की व्यवस्था करना।

मित्रों, जब हम कहीं सुनते है, स्टेशन या गाड़ियाँ बेची जा रही है, वैसा नही है। बल्कि कई अंशोंमें आपकी सब्सिडाइज्ड यात्रा का तालमेल कायम रखने की कवायद की जा रही है।

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