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रेल के यात्री किराए बढ़ रहे है, ज्यादा ज्यादा कितना ज्यादा बढ़ाकर देना चाहोगे?

अब इस तरह के सवाल रेल यात्रिओंको परेशान नही करते, क्योंकी हर रेल यात्री यह बात अच्छी तरह से समझता है, की रेल किराया कितना सस्ता है और बढ़ाना है, बढाना है कह कर भी रेल प्रशासन उन किरायोंमे कोई दिखाई दे या महसूस हो ऐसी वृद्धि नही कर पाता है। यह हकीकत है।

हाल ही मे रेल बोर्ड के सीईओ यादव इनकी आभासी पत्रकार परिषद (वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेन्स) में रेल किराए धीरे धीरे तर्कसंगत करने की बात की। यह बात तमाम रेल यात्री जानते है, धीरे धीरे तर्कसंगत क्यो कहा जाता है, क्योंकी हमारे देश मे इन विषयोंको विरोध प्रदर्शन के मुद्दे समझा जाता है और बस राह देखी जाती है की किराए बढ़ाए गए है ताकी आन्दोलनोंकी शुरवात की जाए। रेल प्रशासन ने कई वर्षोँबाद जनवरी 2020 में प्रत्येक किलोमीटर के किरायोंमे फ्लैट 4 पैसे की वृद्धि की थी, जिसमे कई द्वितीय श्रेणी के किरायोंमे कोई बदलाव हुवा ही नही, या हुवा भी तो बहोत मामूली था। रही बात वातानुकूलित किरायोंकी तो वहाँपर भी कोई झटका लगे ऐसे बढ़ोतरी नही थी।

इसी पत्रकार परिषद में स्टेशनोंके सुविधा चार्जेस वसूलने की भी बात उठी। सीईओ यादव कहते है, रेलवे के 7-8 हजार स्टेशनोंमें से 10 से 15% प्रतिशत स्टेशनोंपर उपयोगकर्ता शुल्क (यूजर चार्जेस) वह भी मामुली, लिए जा सकते है, याने 700 से 800 स्टेशनोंपर रेल यात्री को यूजर चार्जेस देना पड़ेगा। हमे लगता है, भलेही रेलवे के दस हजार स्टेशन्स हो, यात्रिओंका स्टेशनोंपर ज्यादातर आना जाना इन सात आठ सौ स्टेशनोंपर ही होता है। बाकी 50 से 80% स्टेशन तो ऐसे ही है कि जहां दिनभर में मुश्किल से 2 या 4 गाड़ियाँ रुकती होंगी या सवारियाँ आती जाती होंगी।

नीति आयोग के अध्यक्ष अमिताभ कान्त भी इस पत्रकार परिषद मे सहभागी थे, उन्होंने भी रेल यात्री किराए बढ़ाए जाने का समर्थन किया है। वे आगे कहते है, हमारे यहाँ यात्री किरायोंको सब्सिडाइज्ड रखा गया है, बदलेमें इन किरायोंका भार गुड्स एवं पार्सल याने माल भाडेसे संतुलित किया जा रहा है और इसका नतीजा यह है, की देश 70% माल यातायात सड़क मार्ग से चल रही है। रेल प्रशासन को चाहिए की यात्री और माल भाडोंके किरायोंमे संतुलन बनाए रखा जाना चाहिए। निजी रेल निजी संस्थाओं द्वारा चलाए जाने का भी उन्होंने स्वागत किया। ज्ञात रहे, निजी गाड़ियोंके किरायोंका निर्धारण इनको ऑपरेट करने वाले संचालक ही तय करेंगे।

हम यहाँपर बताना चाहते है, जब कोई संस्था अपने बुनियादी जरूरी निर्णय नही ले पाता या हिचकता है तो उस जरूरत को पूरा करने के लिए दूसरे विकल्प तलाशें जाते है। यह बात तय है की 4 पैसे प्रति किलोमीटर किराए बढ़ाना या स्टेशनोंपर उपयोगकर्ता से मामूली सा यूजर चार्ज वसूलना इस तरह से रेलवे की बुनियादी जरूरतें कहीं पूरी हुई है? फिर उन्हें नए रेल मार्ग, गेज कन्वर्शन, समग्र रेल का विद्युतीकरण, नए आधुनिक लोको, नए गतिमान डिब्बे किस तरह लाए जा सकते है, आप ही बताइए।

आज महाराष्ट्र परिवहन के किराए साधी बस के ₹7.45 से 8.80 इतने है तो वातानुकूलित सेवा के ₹10.10 से 18.90 प्रति टप्पा है। यह टप्पा 6 किलोमीटर का होता है। याने सवा रूपए से लेकर सवा तीन रुपए प्रति किलोमीटर हर यात्री को चुकाना है। इसमें रेलवे की तरह टेलिस्कोपिक किराए नही होते की आप जितनी लम्बी यात्रा करोगे उतना ही किराए के दर प्रति किलोमीटर कम होते जाएंगे, और जहाँतक अन्य राज्योंके परिवहन दर है, वह अमूमन इसी तरह के होंगे। वही आप रेल किरायोंकी बात करोगे तो 200 किलोमीटर द्वितीय श्रेणी में एक्सप्रेस का किराया है ₹80/-, स्लिपर ₹125/-(आरक्षण शुल्क ₹20/- यदि सुपर एक्सप्रेस है तो और ₹30/- जोड़े जाएंगे) याने द्वितीय श्रेणी में 40 पैसे प्रति किलोमीटर और स्लिपर में 62.5 पैसे प्रति किलोमीटर और सब अतिरिक्त आरक्षण, सुपर शुल्क जोड़े तो 87.5पैसा प्रति किलोमीटर। सस्ता है की नही? यह सिर्फ 200 किलोमीटर के रेट्स है जितने आप ज्यादा दूर चलोगे रेट्स प्रति किलोमीटर कम होते चले जाएंगे।

अब आप सवारी गाड़ियोंके किरायोंपर नजर डालोगे तो आप सद्गगदित हो जाओगे, की यह किराए है या मामाजी के घर की गाड़ी। सवारी गाड़ी का द्वितीय श्रेणी का 200 किलोमीटर का किराया है ₹45/- और स्लिपर का है ₹80/-(₹20/- आरक्षण शुल्क जोड़िए) याने 22पैसे प्रति किलोमीटर और स्लिपर के 50 पैसे प्रति किलोमीटर। अब आप ही बताए किस तरह इकठ्ठा हो सकता है फण्ड रेल की उन्नति के लिए? आप की जानकारी के लिए बता दूं, यह किराए जनवरी 2020 के बढ़े हुए किराए है।

जब जनवरी में द्वितीय /स्लिपर श्रेणी सवारी में 1 पैसा, एक्सप्रेस में 2 पैसा, वातानुकूलित श्रेणियों में 4 पैसा प्रति किलोमीटर किराया बढाया गया और उपनगरीय सेवाओं, मासिक, त्र्य मासिक पासेस को किराया वृद्धि से दूर रखा गया।

मित्रों, अब हमें किरायोंकी वृद्धि या स्टेशनोंके उपयोगकर्ता चार्जेस के बारे में सोचने की बजाए रेलवे की उन्नति, गतिमानता के बारे में सोचना होगा। विदेशोंमें 600 किलोमीटर प्रति घंटा रेल चलाने के प्रयोग किए जा रहे है और अभी हम 110 से आगे बढ़कर 130 kmph को छूने का प्रयास कर रहे है। जब हम फलाँ गाड़ी को एक्सटेंड करें, फलाँ गाड़ी का स्टॉपेज बढ़ाना है, फलाँ गाड़ी को चलवाईए या डिब्बों की साफसफाई, स्टेशनोंकी अव्यवस्था की शिकायतें करते है तो जरा उनकी लागत, उस व्यवस्था को सुचारू रखने का खर्च इन बातोंपर भी गौर करें। हाँ साथ ही थोड़ा यह भी सोचे की भारतीय रेल को इसके लिए हम क्या शुल्क चुका रहे है। बातें है तो कड़वी लेकिन यदि आपके समझ मे आती है तो भारतीय रेलवे का निजी गाड़ियाँ लाने, स्टेशनोंको निजी हाथोंमें सौंपने का निर्णय भी बड़ी आसानी से समझ आ जाएगा।

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