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क्या प्रशासन के पास रेल गाड़ियोंमे चल रहे अवैध विक्रेताओं को रोकने की क्षमता नहीं है?

संक्रमण काल मे 23 मार्च से यात्री रेल गाड़ियाँ बन्द कर दी गयी थी जो 12 मई से 15 जोड़ी राजधानी गाड़ियाँ खुलने से फिर शुरू हुई। धीरे धीरे हिस्से दर हिस्से में जरूरत और यात्रिओंकी माँगोंपर गाड़ियाँ खोली जाने लगी। और अब ऐसी स्थिती है की काफी कुछ मार्गोंपर गाड़ियाँ खुल चुकी है, चलने लगी है। यज्ञपी यह गाड़ियाँ नियमित गाड़ियोंके भाँती नही है, पुर्णतयः आरक्षित है, विशेष श्रेणियोंमे चलाई जा रही है, लेकिन बहुतांश विशेष गाड़ियाँ उनके नियमित गाड़ियोंके समयसारणी के आधारपर ही चलाई जा रही है। इससे उन नियमित मार्गोंपर हमेशा यात्रा करने वाले यात्रिओंको समयसारणी के बदलावोंकी परेशानी का सामना नही करना पड़ रहा है। उनके लिए एक नियमित गाड़ी की तरह ही यह गाड़ियाँ है। फर्क केवल इतना ही है की अनारक्षित यात्रा पुर्णतयः बन्द हो गयी है।

आम आदमी जो कभी भी रेल यात्रा करनी होती तो आरक्षण कर रेल यात्रा करता था और छोटा सफर होता या दिन दिन में रेल यात्रा करनी होती तो अनारक्षित टिकट खरीद अपनी रेल यात्रा करता था। इन दिनों जब केवल आरक्षण कर के ही रेल यात्रा की जा रही है और इतना ही नही जिस व्यक्ति के पास आरक्षित टिकट नही है वह रेलवे के परिसर तक मे प्रवेश नही कर पा रहा है, तो प्लेटफार्म और रेल गाड़ियोंमे पोहोंचना बहोत आगे की बात है। जंक्शनोंपर रहनेवाले, अपने रिश्तेदारों को चाय नाश्ता, खाने के टिफिन पकड़ाने के सदाबहार, बारह मासी काम पर भी टोटली बन्दी लग गयी है।

गौरतलब यह है, की ऐसी प्रतिबंधित स्थितियोंमे भी रेल गाड़ियोंमे अवैध विक्रेताओंपर किसी तरह की कोई पाबन्दी या अटकाव नही है। आम आदमी वैसे ही बिना टिकट रेल परिसर में प्रवेश करने से कतराता था, जो अब बिल्कुल ही रेलवे से छिटक गया है। आरक्षण रहे तो ही रेलवे दिखेगी ऐसी हालत आम आदमी की है। ऐसे में जिस धड़ल्ले से रेल गाड़ियोंमे अवैध विक्रेता अपने सामान बेचने के व्यवसाय चला रहे है, बड़े ताज्जुब की बात है। यह विक्रेता किसी यात्री की तरह स्टेशनोंके प्रवेशद्वार से स्टेशनोंमें एंट्री नही करते, इनके अलग अलग मार्ग है, जिनसे उनका आना जाना चलते रहता है। ( यह ऐसे रास्ते है,जो शायद रेलवे के सुरक्षा कर्मियोंको कतई पता नही रहते ☺️) जहाँ एक आम यात्री अपनी सारी सुरक्षा, आरक्षित टिकट, परिचय पत्र के साथ रेल गाड़ियोंमे प्रवेश करता है, वहीं यह विक्रेता बिना टिकट, बिना परिचयपत्र और बिना किसी हेल्थ चैकअप के अधिकृत रेल यात्रिओंके सुरक्षा को धता बताकर अपना रोजगार तलाशते रहते है।

हम जानना चाहते है, क्या प्रशासन के पास इन अवैध विक्रेताओंपर कसने के लिए नकैल नही है या इनको रोकने की मानसिकता नही है? आए दिन रेल यात्री ट्विटर पर इस तरह की शिकायत करते रहते है और रेल अधिकारी अपना PNR बताए, घटनास्थल बताए ऐसे मैसेज भेज समय बरबाद करते है। क्या ऑन बोर्ड सुरक्षा कर्मी उसी वक्त उक्त स्थान पर पोहोंच कर अपनी उपस्थिति दर्ज नही करा सकते? माना की अधिकारी PNR जाँच कर यह समझना चाहते हो की कही फेक कॉल तो नही, लेकिन उससे पहले यदि वहाँपर सुरक्षा कर्मी रवाना किया जाए तो शिकायतकर्ता को सुरक्षितता का एहसास होगा और अवैध विक्रेताओंमें दहशत।

प्रशासन चाहे तो एक भी अवैध विक्रेता, भीख मांगने वाले, झाड़ू लगानेवाले गाड़ी में भी दिखाई न देंगे और यात्रिओंको भी इस बात पर गौर करना चाहिए की माँगनेवालोंसे व्यर्थ सहानुभूति न रखे, अनाधिकृत व्यक्तिओंसे खानपान या किसी तरह का सामान न खरीदे। जब यात्री अपनी सुरक्षा के प्रति सजग होकर कड़ाई से रहेंगे तभी ऐसे विक्रेता और अनावश्यक लोग रेल्वेमें अपने गैरकानूनी काम करने से हतोत्साहित होंगे।

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