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गरीब की लुगाई, गाँव की भौजाई

यह हिन्दी मुहावरा अक्सर इस्तेमाल होता है, जहां लोग सार्वजनिक सम्पत्ती का दुरुपयोग होता देखते है। हमारी भारतीय रेल पर भी यह मुहावरा सटीक लागू होता है।

यूँ तो हम भारतीय ऑटो रिक्शा, टैक्सी में, छोटे छोटे अंतर की यात्रा के लिए कई रुपए खर्च कर देते है।अमूमन सड़क पर की यात्रा के लिए 5 से लेकर 10 रुपए प्रति किलोमीटर सर्वसाधारण किराया देय होता है। वही रेलवे की उपनगरीय यात्रा कई गुना किफायती है। 1 से 20 किलोमीटर तक 5 रुपए, 26 से 45 किलोमीटर के लिए 10 रुपये, 46 से 70 किलोमीटर तक 15 रुपये ऐसे स्तर है आखरी 200 किलोमीटर के लिए केवल 40 रुपये लगते है। याने एवरेज 20 पैसा प्रति किलोमीटर। रेलवे में आप किसी एक टिकटपर जितनी ज्यादा लम्बी यात्रा करोगे, उतना ही किराया किफायती होते चला जाएगा, इसके बिल्कुल उल्टा सड़क परिवहन में होता है। वहाँ टेलिस्कोप किराया वगैरा जैसे कुछ नही होता, हर किलोमीटर के स्तर बनाए रहते है और फ्लैट रेट से किराया लगता है। किराए की टेलिस्कोपिक पद्धति गैर उपनगरीय रेल किरायोंमें भी लागू है। ग़ैरउपनगरीय किरायोंमे मेल/ एक्सप्रेस और सवारी गाड़ी ऐसे दो भाग किए रहते है। फिर आगे डिब्बों की श्रेणियां अलग अलग की गई है। वातानुकूलित प्रथम, द्वितीय, तृतीय, प्रथम श्रेणी बिनावातानुकूलित, स्लिपर और द्वितीय श्रेणी आरक्षित, अनारक्षित और सवारी गाड़ियोंमे प्रथम, स्लिपर और द्वितीय अनारक्षित ऐसे केवल तीन श्रेणियां है।

सर्वसाधारण मेल/एक्सप्रेस में द्वितीय वर्ग के लिए 100 किलोमीटर के 49 रुपये, 200 किलोमीटर 76 रुपए, 500 किलोमीटर 160 रुपये, 1000 किलोमीटर के लिए 273 रुपये तो 2000 किलोमीटर के लिए 450 रुपये लगते है। वही सवारी गाड़ियोंमे 100 किलोमीटर के लिए 25 रुपये, 200 किलोमीटर के लिए 45 रुपए, 500 किलोमीटर के लिए 95 रुपये और 1000 किलोमीटर के लिए 160 रुपये लगते है। मेल एक्सप्रेस के स्लिपर में द्वितीय श्रेणी के मुकाबले 60 से 70 प्रतिशत ज्यादा किराया देना पड़ता है, तो तृतीय वातानुकूलित में द्वितीय श्रेणी साधारण से 4 गुना, द्वितीय वातानुकूलित में 6 गुना और प्रथम वातानुकूलित में करीबन 11 गुना किराया जाड़े जाड़े हिसाब में लगता है।

कुल मिलाकर द्वितीय श्रेणी अनारक्षित मेल एक्सप्रेस में 25 पैसा प्रति किलोमीटर (1000 किलोमीटर के लिए) और सवारी गाड़ी में 16 पैसा प्रति किलोमीटर (1000 किलोमीटर के लिए) किराया भारतीय रेल अपने यात्रिओंसे लेती है। अब आप बताए क्या ऐसे और इतने कम किराए किसी परिवाहन के हो सकते है?

आज भारतीय रेल वित्तीय संकटोंसे जूझ रहा है। वर्षों बीत गए है किसी तरह की सुव्यवस्थित किराए वृद्धि किए। पिछले वर्ष रेल विभागने वर्ष 2014 के लंबे अंतराल के बाद, केवल 1 पैसा प्रति किलोमीटर की वृद्धि की थी, जिसमे कई स्तर पर मामूली किराया बढ़ा। यह वृद्धि का अंतर बताएंगे तो आप आश्चर्य से दंग हो जाओगे। मेल/ एक्सप्रेस में 100 किलोमीटर के लिए 47 से बढ़कर 49 रुपए, 200 किलोमीटर के लिए 72 से बढ़कर 76 रुपए, 500 किलोमीटर के लिए 150 से बढ़कर 160 रुपये, 1000 किलोमीटर के लिए 253 से बढ़कर 273 रुपये और 2000 किलोमीटर के लिए 410 से बढ़कर 450 रुपए वृद्धि हुई। यह किराया वृद्धि 2014 के बाद, 1 जनवरी 2020 में की गई। वही सवारी गाड़ियोंमे 100 किलोमीटर के लिए कोई बदलाव नही, 200 किलोमीटर के लिए भी कोई बदलाव नही, 500 किलोमीटर के लिए 90 से बढ़कर 95 रुपये, 1000 किलोमीटर के लिए 150 से बढ़कर 160 रुपए और उपनगरीय किरायोंमे कोई वृद्धि नही की गई थी।इतनी मामूली वृद्धि, या इसे फेरफार ही कह लीजिए क्योंकि इसे वृद्धि कहना कतई ठीक नही लगता, के बावजूद कई लोगोंने(?) भारी हंगामा कर अपना विरोध प्रदर्शित किया था। जब यह उक्ति ” गरीब की लुगाई, गांव की भौजी ” सटीक बैठती है।

दरअसल किराए बढ़ाने की चर्चा शुरू होते ही यात्री संगठन (?) अपनी विरोध प्रदर्शन की तैयारी में लग जाते है। कोई भी किराया वृद्धि के लिए तैयार नही रहता और इसके चलते रेलवे प्रशासन को अपनी आय बढ़ाने हेतु, अलग अलग तरीके खोजने पड़ते है। प्रीमियम तत्काल, प्रीमियम गाड़ियाँ शायद इसकी ही उत्पत्ती है। यही यथायोग्य किरायोंकी संरचना की जाए तो अतिरिक्त प्रभारोंकी जोड़तोड़ करने की आवश्यकता क्यों पड़े। उदाहरण के लिए सुपरफास्ट चार्जेस लीजिए। द्वितीय श्रेणी मे/एक्स में 15 रुपये, स्लिपर में 30 रुपए और वातानुकूलित में 45 रुपए लिए जाते है। सवारी गाड़ियाँ और कुछेक एक्सप्रेस गाड़ियोंको छोड़ दे तो लगभग 80% गाड़ियाँ सुपरफास्ट हो गयी है तो क्यों न यह किराया सीधा ही जोड़ दिया जाए और सुपरफास्ट गाड़ियोंकी स्पीड की धारणा जो की फिलहाल 55 किलोमीटर प्रति घंटा एवरेज गति निर्धारित है जिसे 60 या 65/70 तक बढाई जाए?

दूसरा स्टेशनोंके प्लेटफार्म के हुलिए कई तरह से बदले जा चुके है। किसी जमाने मे स्टेशनोंपर लिफ्ट, एस्कलेटर, रैम्प एक सपना था जो अब कई स्टेशनोंपर आम बात है। बैट्रिचलित गाड़ियाँ दिव्यांग और वृद्धोंके लिए बहुतोंपर उपलब्ध है। स्टेशनोंपर बैठक व्यवस्था, पंखे, शीतल पेय जल जिसे यात्री अपना अधिकार मानते है, बड़ी आसानी से मुफ्त में उपलब्ध है और वही सड़क परिवहन के बस स्टैंडों पर नदारद रहते है। जिसकी न कोई शिकायत भी कभी की जाती है। क्योंकि वह अपेक्षित ही नही रहता यात्रिओंके लिए। रेलवे स्टेशनोंकी अद्ययावत उद्घोषणा, जगह जगह पर लगे जानकारीपूर्ण डिस्प्ले, सदा ततपर कर्मचारी, चाकचौबंद RPF की सुरक्षा व्यवस्था, है कोई तुलना सड़क परिवहन से?

लेकिन यात्रीकिरायोंकी आय से रेलवे आमदनी की पूर्ति नही हो पा रही है यह कटु सत्य है और इसके लिए रेलवे बड़े स्टेशनोंके यात्री किरायोंमे डेवलपमेंट चार्जेस भी जोड़ने वाली है। यात्री प्रतीक्षालय में भी कुछ न कुछ शुल्क लगाया जानेवाला है। विश्रामालय लीज पर दिए जा रहे, निजी ट्रेनोंकी घोषणा हो चुकी है, जिनके किरायोंपर किसीका विरोध प्रदर्शन नही हो सकेगा, क्योंकि यह मुहावरेवाली भौजाई नही न होगी। यह गाड़ियाँ बड़े ट्रैवेलर्स घरानोंकी रसूखदारों की ओर से चलाई जाएगी। इनके किराए रेलवे के किराया सूची से हट कर होंगे। वहाँ यात्रा करनी है, तो निर्धारित किराया देना ही होगा, जिसमे किसी रियायत की कोई गुंजाइश ही नही।

रियायत से याद आया, रेल प्रशासन अपने यात्रिओंको रियायत देने में भी बड़ी दरियादिल है। बड़ी लम्बी सूची है रेलवे में रियायत पानेवालोंकी। रेलवे को चाहिए इसमें भी लगाम कसनी चाहिए। क्योंकि एक मुहावरा यह भी है, घर मे नही चने और अम्मा चली भुनाने।

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