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हाय! ये कैसा झीरो बेस? जिस किसी मकसद से लाया गया, वहाँतक पोहोचेगा भी?

रेल प्रशासन ने झीरो बेस, शून्याधारित समयसारणी की जो हवा तैयार की थी की 10,000 से भी ज्यादा स्टापेजेस रद्द किए जाएंगे, गाड़ियाँ अब सरपट चलेंगी, लेकिन ऐसा किसी ट्रेनोके समयसारणी में अभी तक तो नज़र नही आया है। यह बात और है की रेलवे ने यह अधिकृत जाहिर भी नही किया है की यही शून्याधारित समयसारणी है।

संक्रमण काल का रेल बन्द, रेलवे को अपने परिचालन में आमूलचूल बदलाव लाने के लिए सुनहरा वक्त था। इस वक्त में, रेलवे चाहती तो अपनी सुपरफास्ट गाड़ियोंकी परिभाषा बदल सकती थी। जगह जगह पर राजनीतिक दबावोंके चलते, हर 25, 50 किलोमीटर के बीच के स्टापेजेस खत्म किए जा सकते थे। लेकिन उससे उन्हें अभी भी छुटकारा नही मिल सका है।

लम्बी दूरी की गाड़ियाँ चल रही है और सारी सवारी गाड़ियाँ बन्द है, उनके जगहोंपर उन्ही गन्तव्योंके बीच इण्टरसिटी एक्सप्रेस का नियोजन है। पर समझ नही आ रहा है, इस योजनाको जामा क्यों नही पहनाया जा रहा? कम अंतर की रेल यात्रा करनेवाले यात्री बेहद परेशान है, आक्रोशित है, आंदोलन पर उतर आए है। कई छोटे स्टेशनोंके बीच रोज़ानावाले यात्री ज्यादा स्टापेजेस वाली एक्सप्रेस गाड़ियोंमे जबरन और बिना टिकट के ही यात्रा करने लग गए है। 5,50 किलोमीटर के सड़क मार्ग से यात्रा करनेपर लगने वाले 80, 100 रुपए रोजाना खर्च करने की आम जनता की हैसियत नही है। इस तरह गैरकानूनी यात्रा करने के लिए ऐसे लोग और भी कई तरह की जोखिम भी उठा रहे है। चलती गाड़ी में चढ़ना, उतरना। प्लेटफॉर्म के बाहर निकलने के बाद गाड़ी में चढ़ना, आउटर एरिया से उतर कर रेल पटरियोंसे स्टेशन के बाहर छुपे मार्गोंसे जानाआना करना इत्यादि। रेल प्रशासन की इच्छा शक्ति होनी चाहिए ऐसे मार्गोंको तत्परतासे बन्द करना चाहिए था लेकिन वह हो न सका।

आज तमाम लम्बी दूरी की गाड़ियोंके रेल यात्री राहत की साँस ले रहे है और इसकी वजह है कम दूरी के पासधारक इन रेलोंमें नही है। अनारक्षित यात्री आरक्षित डिब्बों में नही है। वे चाहते है लम्बी दूरी की गाड़ियाँ सदैव ऐसे ही चलना चाहिए लेकिन क्या यह सम्भव है? क्या रेलवे ग़ैरउपनगरिय क्षेत्रोंसे मासिक पासधारकोंकी लम्बी दूरी के आरक्षित डिब्बों में अनाधिकृत प्रवेश को रोक सकेगी? इसका केवल एक ही रास्ता है। लम्बी दूरीकी गाड़ियोंके निकटतम अन्तरोंमें स्टापेजेस को हटाना और इसके ऐवज में इण्टरसिटी गाड़ियोंमे इज़ाफ़ा करना। तब ही यह सम्भव हो पाएगा।

पासधरकोंके लिए कई नियम है। जैसे की पासेस को जोड़ जोड़ कर लम्बी यात्रा करने की मनाही ( क्लबिंग ऑफ पास ) पासधारक अलग अलग खण्डोंपर पास लेकर 400 से 500 किलोमीटर का जानाआना करते है। ग़ैरउपनगरिय खण्डोंपर 150 किलोमीटर की पास मिलती है। भुसावल से मुम्बई, नागपुर, भोपाल ऐसे शहरोंके लिए 3 पास का क्लब करना आम बात है। हालांकि मासिक पास बीते 10 माह से बन्द है, लेकिन जब भी शुरू होगी उस पासधारक की पास को आधारकार्ड से संलग्न की जाती है तो इससे आसानीसे छुटकारा मिल सकता है। कोई भी व्यक्ति दो या दो से ज्यादा पास नही निकाल पाएगा।

हम रेल प्रशासन की इस मामले में मजबूरी समझते है, लेकिन आम यात्री ने भी इन चीजोंको बेहतर ढंग से समझना चाहिए। 25 किलोमीटर का सवारी गाडीका इकतरफा किराया मात्र 10 रुपये है, याने एक माह के कुल 30 दिनोंके 60 फेरोंके रुपए लगते है 600 केवल वहीं इतने ही अंतर की मासिक पास का चार्ज है 195 रुपए मात्र। इसमें भी ग़ैरउपनगरिय क्षेत्रोंमें एक्सप्रेस से यात्रा करने के लिए इन यात्रिओंको अनुमति है। समझ लीजिए हमारे मासिक पास के गणित में सवारी गाड़ी की जगह एक्सप्रेस रखते है तो? तो एक्सप्रेस के इकतरफा किराए 30 रुपए, 60 फेरीक़े हुए 1800। अब बताइए कहाँ 195 रुपए में महीनाभर रेल यात्रा और कहाँ रुपए 1800 के टिकट किराए? इसके बाद भी पास के मूल्य में मामूली भी बदलाव हुवा तो काफी हो हल्ला होता है और रेल प्रशासन को पहले अपनी व्यवस्था सुधारने की दुहाई दी जाती है।

रेलवे ऐसे भी यात्री गाड़ियोंसे कुछ भी कमाई हासिल नही कर पाती, यहाँतक की उसका खर्च भी नही निकलता। ऐसे में रेलवे अपने घाटे से उबरने के लिए निजी गाड़ियाँ, वातानुकूलित डिब्बे की हमसफ़र, तेजस गाड़ियाँ, स्टेशनोंके निजीकरण, गाड़ियोंके किरायोंमे सुपरफास्ट चार्जेस, विशेष गाड़ियोंके विशेष किराए, स्टेशन डेवलपमेंट चार्जेस, वेटिंग रूम्स का निजीकरण करके उससे उगाही इत्यादि तिकड़में आजमाई जाती है।

आपने अपने आरक्षित, अनारक्षित टिकटोंपर छपा संदेश तो देखा होगा ” रेलवे आपसे किरायाके कुल 57 फीसदी ही मूल्य ले रही है” क्या पूरा किराए देने के बाद भी इस तरह का छपा टिकट लेकर यात्रा करना शर्मिंदगी नही? क्या हम रेलवे को पूरा किराया नही देना चाहते या रेलवे के पास ऐसी व्यवस्था नही है कि पूरा 100 फीसदी किराया वसूल कर सके? यात्रिओंके सोचने, समझने की सख्त जरूरत है। किसी व्यवस्था पर कितना बोझ बनाया जा सकता है? की वह चरमरा न जाए, छटपटाहट में आपके किरायोंकी रियायत बनी रखने के लिए उसे कमाई के लिए अलग अलग हथकंडों को खोजना पड़े?

रेलवे प्रशासन के पास अब भी मौका है, वक्त रहते कड़ाई से निर्णय कर इधर उधर के चार्जेस लगाकर, अलग अलग हथकंडे आजमाकर अपना राजस्व बढाने के बजाय अपनी किरायोंकी सूची को अद्ययावत करे, परिचालन सुव्यवस्थित करे, रियायती सवारी गाड़ियोंके स्थान पर छोटी छोटी इण्टरसिटी गाड़ियाँ ले आए, रियायतें दी जाती है तो उन्हें भी यथयोग्य नियमनोंके साथ संलग्न करें। यह अब मुश्क़िलोंके चलते, बेहद जरूरी होता चला जा रहा है।

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