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कम दूरी के रेल यात्री रेल से दूर हो रहे है। शायद, यही चाहत थी ….

संक्रमण काल से पहले, जब नियमित गाड़ियोंका परिचालन हो रहा था, तब ही से रेलवे के शून्याधारित टाइमटेबल की संकल्पना की चर्चाएं शुरू हो गयी थी।

शून्याधारित समयसारणी में दस हजार स्टापेजेस रद्द किए जाएंगे, सवारी गाड़ियाँ लगभग समाप्त कर दी जाएगी। लिंक एक्सप्रेस गाड़ियाँ इतिहास बन जाएगी। रेलवे प्रीमैसेस याने परिसर रेल के अधिकृत व्यक्तियों और यात्रिओंके अलावा बाकी लोगोंके लिए प्रतिबंधित हो जाएगा, चूँकि ऐसे तो कानून पहलेसे ही है, बस कड़ाई से पालन अब किया जा रहा है। यह सब कवायदें रेल विभाग को घाटे से उबारने के लिए उठाए जाने वाले कदम है। जिसमे कई सारी सेवाओंके निजीकरण का भी प्रस्ताव है।

रेल यात्री जब तक इन संकल्पनाओं को समझता, पचा पाता तब तक तो संक्रमण से बचाव के लिए रेल यात्री सेवांए बिल्कुल बन्द कर दी गयी। सारे रेल यात्री करीबन दो, ढाई महीनोंके लिए रेल सेवाओंसे दूर हो गए। वैसे भी लॉक डाउन के चलते केवल अत्यावश्यक कामकाज के अलावा सब कुछ बन्द बन्द ही था।

एक एक करके गाड़ियाँ खुलने लगी, लेकिन प्रतिबंध कड़ा था। संक्रमण कुछ थमते नजर आया तो यात्री सेवाओंमें इज़ाफ़ा किया गया। कई एक्सप्रेस गाड़ियाँ विशेष श्रेणी में चलना शुरू हुई। हालांकि अब भी सारी यात्री गाड़ियाँ विशेष श्रेणी में ही चल रही है। इसकी वजह यह बताई जाती है, विशेष गाड़ियोंपर नियमित गाड़ियोंके जैसी प्रतिबद्धता नही रहती। ना ही इनका कोई शेड्यूल रहता है और ना ही कोई फिक्स अवधि। यहाँतक की किसी भी समय प्रशासन इन्हें समय की मांग अनुसार रद्द, आंशिक रद्द या मार्ग परिवर्तन कर सकती है।

फिर मुख्य प्रयोग शुरू किया गया। सवारी/डेमू/ मेमू गाड़ियोंको विशेष एक्सप्रेस में तब्दील कर चलाने का। इन किफायती दरों में चलनेवाली गाड़ियोंको एक्सप्रेस के किरायोंके साथ साथ आरक्षण शुल्क भी जुड़ गया। लम्बी रेल यात्रा के लिए आरक्षण करना या उसके लिए ज्यादा किराया चुकाना यह वाज़िब भी था मगर सौ, डेढ़ सौ किलोमीटर की घण्टे दो घण्टे की रेल यात्रा इस तरह करना यात्रिओंके लिए भारी पड़ गयी। लिहाजा गाड़ियोंसे रेल यात्री बिदक गए, मुँह मोड़ने लगे। अनारक्षित गाड़ियोंकी मांग बढ़ती चली गयी। कम दूरी की रेल यात्रा करनेवाले यात्रिओंको द्वितीय श्रेणी के फटाफट टिकट लो और यात्रा करो वाली आदत जो थी।

फिर कुछ क्षेत्रोंमें अनारक्षित गाड़ियोंको भी पटरियोंपर लाया गया, मगर किराए का दर एक्सप्रेस का ही था और गाड़ियाँ भी एक्सप्रेस विशेष श्रेणियों में ही अवतरित हुई। ये भी बात नियमित यात्रिओंके गले से नही उतर रही की उसकी वही सब स्टेशनोंपर रुकते रुकते यात्रा करनेवाली सवारी गाड़ी में उसे अब दुगुना, तिगुना किराया लगने वाला है। और तो और अब भी मासिक पास/टिकट धारक को ग़ैरउपनगरीय क्षेत्र प्रतिबंधित है। टिकट खरीदकर ही यात्रा करनी है। तो नियमित और रोजाना के रेल यात्री इन गाड़ियोंमे यात्रा करने से दूर हो गए।

कुल मिलाकर रेलवे से कम दूरी की रेल यात्रा करने वाले यात्री अब रेलवे से कन्नी काटने लगे है। जब तक मासिक पास का चलन शुरू नही किया जाता तब तक रेलवे की यात्रा उनके किसी काम की नही अपितु बहुत महंगी पड़ती है। यात्री संगठनों का कहना है, कभी कभी ऐसा लगता है, रेल प्रशासन चाहती ही थी के ग़ैरउपनगरीय क्षेत्रोंसे मासिक पास धारक, किफायती सवारी गाड़ियाँ बन्द हो जाए और इसी योजना के तहत यह सारा किया जा रहा है। यह बात तो तय है, की सवारी गाड़ियाँ और उनके सस्ते किरायोंके दिन लद गए है। डेमू/मेमू गाड़ियोंके लिए और मासिक पास धारकोंके लिए हो सकता है की कोई नई नियमावली भी आ जाए

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