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“थप्पड़ से डर नही लगता बाबू, प्यार से लगता है।”

यह फिल्मी डायलॉग हमारे रेल विषयक ब्लॉग पर क्या कर रहा है, यही सवाल आपके मन मे आया ना? चलिए बताते है।

जब नीतियां रातोंरात बदल दी जाती है, तो आम आदमी भौचक रह जाता है। कल रात को अचानक पश्चिम रेलवे WR ने एक परीपत्रक जारी कर यह कह दिया की उनकी 65 गाड़ियोंमे 04 मार्च से अनारक्षित टिकट जारी किए जाएंगे और तो और 29 जोड़ी याने की 58 गाड़ियोंमे सवारी गाड़ियोंका किराया दर लगेगा। खैर! आम यात्रिओंका तो फायदा ही हुवा। उसे अब ढेर सारी परेशानियोंसे मुक्ति मिल जाएगी। इसमें सबसे बड़ी परेशानी आरक्षण करके रेल यात्रा करने की थी। इस स्थितियोंमे ग्रामीण यात्री जिन्हें ऑनलाइन टिकिटिंग की ‘ओ’ समझ नही आती थी और ना ही उनके गावोंके स्टेशनोंपर आरक्षण केंद्र थे, सीधे बीना टिकट ही यात्रा करने मजबूर थे, अब बदली नीति के तहत टिकट निकाल यात्रा कर पाएंगे।

आननफानन में जब ऐसे नीतिगत फैसले आते है तो कुछ ऐसा ही होता है। गाड़ियाँ बन्द थी वह अलग परेशानी थी, संक्रमण काल मे शुरू की गई तो “दूरी है जरूरी” के निर्वहन की समस्या थी। यात्री जरूरी हो तभी रेल में यात्रा करें इस संकल्पना के साथ विशेष गाड़ियाँ, विशेष प्रतिबंध के साथ चलाई जा रही थी। सम्पूर्ण आरक्षित गाड़ियाँ, विशेष किराया दर इत्यादि नियम शुरू थे। जब स्थानिक यात्रिओंमें कम दूरी के गाड़ियोंकी माँग बढ़ी, जनप्रतिनिधियों ने भी दबाव समझा और लम्बी दूरी की गाड़ियोंके ही भाँती नीतिनियम कायम रखते हुए, इन ट्रेनोंको शुरू करवा दिया। लेकिन यह नीति कारगर नही रही और गाड़ियाँ खाली चलने लगी, बुकिंग्ज ही नही होती थी। फिर नीतियाँ बदली गयी और जनरल काउंटर पर अनारक्षित द्वितीय श्रेणी की टिकटें खोल दी गयी।

अब झमेला क्या है? तो भाईसाब पश्चिम रेलवे ने तो अपने क्षेत्रोंमें अनारक्षित टिकटें शुरू कर दी मगर पास पड़ोस की क्षेत्रीय रेलवे जैसे मध्य रेल, पश्चिम मध्य रेल में यह व्यवस्था लागू नही है। फिर? उसका हल यूँ निकला की पश्चिम रेलवे की जो गाड़ियाँ इन क्षेत्र में चलती है, जैसे सूरत भुसावल, नंदुरबार भुसावल, नागदा बीना जिन को अंशतः आरक्षित किया गया। याने पश्चिम रेलवे से निकलेगी तो अनारक्षित वर्ग चलेगा और मध्य रेल या पमरे से निकलेगी तो द्वितीय श्रेणी में भी आरक्षण कर के यात्रा करनी होगी। अब पेंच यह फँसा है क्या राज्य शासन की नीतियोँ पर कही क्रॉसिंग्स/विरोधाभास तो नही हो रहा? दूसरा सूरत से भुसावल के लिए द्वितीय श्रेणी अनारक्षित है वहीं भुसावल से सूरत के लिए आरक्षित क्योंकि मध्य रेलवे पर अनारक्षित टिकटें बन्द है, फिर वही गाड़ी में धरणगाव, अमलनेर से, जो की पश्चिम रेल क्षेत्र में आते है, सूरत की टिकट अनारक्षित मिल जाएगी? (साथ मे जोड़े गए चित्र देखे)

यह है उस फिल्मी डायलॉग की हमारे ब्लॉग में उपस्थिति का मतलब। रेल प्रशासन ज्यादा किराया या अलग श्रेणी में यात्रा करवाता है तो उससे यात्री को ज्यादा तकलीफ नही है, मगर जब यह दोहरी नीति या असमंजस वाली स्थितियां खड़ी कर देता है तो ऐसे किफायती टिकट उपलब्ध कराए जाने वाले प्यार, पुचकार से डर लगता है।

एक चपेटा, थप्पड़ और है, आईआरसीटीसी के ऑनलाइन टिकट और रेल प्रशासन के आरक्षण केन्द्र PRS की टिकिटिंग की दोहरी नीति का। ऑनलाइन टिकट में सर्विस चार्ज लगता है, वहीं PRS पैसेंजर रिजर्वेशन सिस्टम में यह चार्ज नही लगता। ग़ैरवातानुकूलित वर्ग का सीधा टिकट याने गाड़ी के गन्तव्य से आगे के स्टेशन का भी टिकट PRS पर मिल जाता है, वही ऑनलाइन में यह सुविधा अन्तर्भूत नही की गई है। इस तरह की दोहरी नीति से यात्रिओंको बड़ी मानसिक तकलीफ़ होती है। ऑनलाइन टिकट में यात्री खुद टिकट बनाता है याने PRS के तिकटबाबू की बचत, टिकट छपने की जरूरत नही याने रेलवे स्टेशनरी की बचत, यात्री अपने कम्प्यूटर, मोबाइल से टिकट बनाता है यानी रेलवे के साजोंसामान के इस्तेमाल की जरूरत नही। फिर सर्विस चार्ज आईआरसीटीसी के ऑनलाइन टिकट पर क्यों और PRS के टिकट पर क्यो नही? क्या यह ऑनलाइन टिकटिंग सुविधा के प्यार की कीमत चुकानी है?

इतनी सारी नीतियोंमे जो गड़बड़ी हो रही है, उसमे ग़ैरउपनगरिय मन्थली सीजन टिकट वालोंका तो कोई फैसला किया ही नही जा रहा है। यह MST/QST वाली सुविधा भी रेल प्रशासन के गले की हड्डी बन बैठी है। जहाँतक रेल प्रशासन इस सुविधा को ग़ैरउपनगरिय क्षेत्रोंमें नियंत्रित रखनेपर विचार कर रही है पर फिलहाल कोई नीति नही बन पा रही है। अतः इन पासधारकोको अभी भी रेल यात्रा करने की अनुमति नही दी गयी है।

अनुक्रमांक 7 देखिए, सीजन टिकट ग़ैरउपनगरिय क्षेत्र में मना है
भुसावल से सूरत द्वितीय श्रेणी आरक्षित वर्ग है
उसी गाड़ी में भुसावल की ओर यात्रा में द्वितीय श्रेणी में आरक्षण बन्द कर दिया गया है, याने अनारक्षित टिकट मिलेंगे

09077/78 गाड़ी को अंशतः अनारक्षित सवारी किराया श्रेणी में रखा गया है, लेकिन टिकट की स्थिति नदारद है।

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