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प्लेटफॉर्म टिकट की दरें बढाए जाने से इतना बवाल क्योँ?

भारतीय रेल ने अपने प्लेटफार्म टिकटोंके शुल्क में ₹10/- से बढाकर ₹20/- से ₹50/- तक की वृद्धि कर दी है और इसका कारण संक्रमणका प्रसार रोकने हेतु, प्लेटफॉर्मोंपर अनावश्यक प्रवेश को हतोत्साहित करना यह बताया गया है।

एक तरफ भारतीय रेल ने यह साफ कर दिया है, की टिकटोंके शुल्क किन कारणोंके चलते बढाए गए है और उसके पीछे उनका उद्देश्य क्या है, वही दूसरी तरफ प्लेटफॉर्मोंपर डेवलपमेंट चार्ज लगाने की बातें पहले ही चर्चाओंमें आ गयी थी। स्वाभाविक है, की आम यात्री इन दोनों मुद्दों को एक ही नजर से देख रहा है। हालाँकि इस तरह के डेवलपमेंट चार्जेस लगना अभी कहीं पर भी शुरू नही हुये है।

हम यहाँपर एक विचार पर चर्चा कर रहे है। आम आदमी महीने में कितनी बार या यह बताइए वर्ष में कितनी बार प्लेटफार्म टिकट निकालता है? कितनी बार उसे सिर्फ प्लेटफॉर्मोंपर जाने की जरूरत पड़ती है? क्या यह हर रोज का मसला है? या महीने में एखाद बार या वर्ष में एखाद बार का? क्योंकी यदि यात्री को रेल यात्रा करनी है तो प्लेटफार्म टिकट नही यात्रा का टिकट खरीदना होता है। फिर क्यों इस मुद्दे पर आम जनता के मन मे भ्रम निर्माण किया जा रहा है?

हमारे देश मे वृतपत्र में जो छप कर आता है, उसे प्रमाण समझा जाता है, सोशल मीडिया में कोई पोस्ट ट्रेन्ड करती है तो लोग उस पर गम्भीरता से विचार करने लग जाते है। ऐसी स्थिति में अपने अर्धज्ञान को जनता पर थोपना कहाँ की रीत है? आम आदमी स्टेशनपर कोई चौक में घूमने, पान खाने या सैरसपाटे के लिए तो जाएगा नही और यात्रा का टिकट ले कर जाने या यात्रा पूरी कर स्टेशनपर उतरने में कैसी परेशानी?

रहा सवाल प्लेटफॉर्म टिकट का तो उचित और आवश्यक कारण के लिए यदि शुल्क चुकाकर भी जाना पड़े तो व्यक्ति अवश्य ही जाता है। यहाँपर हम इस मूल्य वृध्दि का समर्थन नही कर रहे है बल्कि ‘आवश्यकता और उसके लिए चुकाए गए मूल्य का महत्व’ यह बताने का प्रयत्न कर रहे है। इसके लिए हम एक उदाहरण यहाँपर देते है।

हाल ही मे एक मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल में एक नोटिस बोर्ड टंगा दिखाई दिया। उक्त बोर्ड पर मरीज को मिलने के लिए जो भी लोग आते है, उसके लिए समय और शुल्क निर्देशित किया गया था। समय के बारे में सब ठीक था लेकिन शुल्क? जी हाँ! यदि आपको अपने किसी मरीज रिश्तेदार को मिलना है, उसके तबियत के हालचाल पूछने है तो अनुमतिपत्र तय किया गया था और उपर्युक्त समय मे कोई भी व्यक्ति, अनुमतिपत्र लेकर मिलने जा सकता है, उसका मूल्य, एक व्यक्ति के लिए, एक बार विज़िट करनेपर ₹100/- यह था।

बोर्ड पर नीचे आखरी पंक्ति यह थी, उपरोक्त अनुमतिपत्र के शुल्क का हिसाब रखा जाता है, और अंत मे जब मरीज यहांसे छुट्टी लेकर जाता है तब उसके कुल अस्पताल के खर्च में से ‘अनुमतिपत्र द्वारा जमा की गई रकम’ को घटा दिया जाता है। यकीन मानिए, उस अस्पताल में, मरीज से, अनावश्यक, दिखावे वाले मिलनेजुलने हेतु कोई भी नही आता। हाँ एक बात और मरीज से साथ एक सक्षम व्यक्ति की एंट्री पास मुफ्त बनी रहती है।

अब आप बताइए इस तरह के कदम किसी भी प्रशासन को क्यों उठाने पड़ते है, आशा है प्लेटफॉर्म के बढ़े शुल्कपर आपके विचारोंको एक अलग दिशा मिलेगी। एक बात और, बर्षोंसे आप प्लेटफॉर्मोंपर जाते रहे होंगे, उसपर उपलब्ध सुविधा, असुविधा का जायजा भी आपने लिया होगा, तब के और अब के रेलवे प्लेटफॉर्मोंमें फर्क तो अवश्य ही महसूस किया होगा। चलिए, छोड़िए कुछ बोलेंगे तो अलग अलग उपाधियां लग जाती है। ☺️☺️

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