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रेलवे में मास्क नी पेहनेगो, तो ₹500 को जुर्मानो भरनो पडेगो!

रेल प्रशासन ने एक परीपत्रक जारी किया है, देशभर में संक्रमण के हालात देखते हुए रेल गाड़ी में, रेलवे स्टेशनों और रेलवे के प्रत्येक परिसर में, हरएक व्यक्ति को मास्क पहनना आवश्यक किया गया है। यदि बिना मास्क के कोई भी व्यक्ति रेलवे परिसर में मिलता है, तो उसे ₹500/- का जुर्माना वसूला जायेगा। यह कार्रवाई रेलवे के नियम क्रमांक cc 76/2012 के तहत की जाएगी। यह नियम तुरन्त प्रभाव से, आगे और सूचना मिलने तक, अगले छह महीनोंके लिए लागू किया गया है।

यात्रीगण इस कठोर परन्तु संक्रमणकाल की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लिए गए निर्णय के लिए रेल प्रशासन का आभार ही प्रकट करेंगे। जाहिर है, सुरक्षा सर्वोपरी है, फिर वह यात्री हो या रेल कर्मी। लेकिन इसके साथ ही रेल प्रशासन से आग्रह है, की कुछ और भी ऐसे विषय है, जिनपर रेल प्रशासन ने अब गहराई से ध्यान देने की जरूरत है।

आपने हाल ही रेलवे के मुख्य स्टेशनोंकी तस्वीरें ख़बरोंमें, न्यूज चैनलोंपर, सोशल मीडिया में देखी होगी, खाली प्लेटफार्म, गिनेचुने यात्री, सबकुछ एकदम नपातुला। मगर वहीं गाड़ी 100-200 किलोमीटर आगे आती है, तो यात्रिओंसे खचाखच भर जाती है, कैसे? मुम्बई से बराबर निकली और नासिक में देखें तो भारी भीड़। यात्री लोग कसारा, इगतपुरी से चढ़े जा रहे? हाँ, वह भी बिना टिकट। और तो और चेकिंग स्टाफ़ इन्हें उतारने की बजाय इनसे पेनाल्टी वसूलता है। बकायदा पेनाल्टी लगाकर टिकट, रसीद के साथ बनाकर दिया जाता है और यात्री उसी डिब्बे में बैठा अपनी यात्रा को आगे बढ़ाता है।

यात्री मुख्य टर्मिनल से चलने के बजाय, रास्तेमें आगे के छोटे स्टेशनोंसे चढ़ रहे है। छोटे स्टेशनोंपर कोई जाँच नही हो रही है। चालाख यात्री बिना टिकट या प्लेटफार्म टिकट लेकर गाड़ी में चढ़ जाते है। प्रशासन से यह आग्रह है, यह संक्रमण के पहले का, चेकिंग स्टाफ़ के टारगेट पूरा करानेवाला पैनाल्टी वाला खेला अब तो बन्द कीजिएबिना टिकट यात्री की पेनाल्टी/जुर्मानेवाली टिकट बनाने के बजाए उन पर करवाई करें ताकी वास्तविक यात्री, आरक्षण टिकट धारी यात्री बेचारे सुरक्षित अपनी यात्रा कर सकें।

गाड़ियोंमे अनाधिकृत विक्रेता, सरेआम खाद्यपदार्थ बेचते है। छोटाबड़ा नाश्ता, भेल, ककड़ी फल वगैरा बेचने वाले बड़े आरामसे गाड़ियोंमे घूमते है, अपना व्यवसाय करते है। यही नही, प्लेटफार्म पर कितने वेंडर्स अनाधिकृत रहते है, इसका भी लेखाजोखा रेल प्रशासन को लेना चाहिए। अनुमतिपत्र किसी और का और चाय बेचने वेंडर कोई और। इसके अलावा 24 घंटे चाय और खाद्यान्न रेलवे स्टेशनोंपर बिकता है, लेकिन इन वेंडरोंकी चौकसी 24 घंटे शायद ही होती हो। इसके अलावा अनेक रेलवे स्टेशनोंपर आनेजाने के कई ख़ुफ़िया रास्ते है, जिनसे ऐसे तमाम गैरकानूनी, असामाजिक तत्व रेलवे स्टेशनोंपर आतेजाते रहते है। हालाँकि यह रास्ते केवल रेलवे के जाँच अधिकारियोंके लिए ख़ुफ़िया होते है, बाकी तमाम लोग इन रास्तों से अच्छी तरह से वाकिफ़ होते है। यह हो गयी रेल गाड़ियों और प्लेटफॉर्मोंपर की बात मगर टिकट बुकिंग खिड़की, आरक्षण केंद्र भी इन बातोंसे अछूते नही है। वहाँ पर भी प्रशासन के निगरानी की जरूरत है।

एक बात तय है, रेल प्रशासन को ही अपने पुराने ढर्रों को बदलने की जरूरत है। क्यों नही रेलवे अपने टिकट बुकिंग, आरक्षण बुकिंग प्रणाली में बदलाव लाती है? क्यों फिजिकल, छपे टिकटोंको अनावश्यक रियायत मिलती है? ई-टिकट जिसमे रेल प्रशासन का कोई खर्च नही लगता उसमे सर्विस चार्ज लगाया जाता है और जहाँ टिकट छपना है, बुकिंग बाबू और तमाम मशीनरी लगी पड़ी है उसमें कोई सर्विस चार्ज नही? यह कैसी पहेली है, समझ नही आती। आरक्षण केंद्र पर छपे टिकट के बजाए ई-टिकट जारी कीजिए ना, क्या दिक्कत है? यात्री को मोबाइल, ई मेल में ही टिकट मिलेगा यह नियम बनाए, बहुत सारी समस्या सुलझ जाएगी। प्रतिक्षासूची के छपे PRS के टिकट लेकर अभी भी लोग यात्रा करने गाड़ियोंमे चढ़ जाते है। टिकटोंका हस्तांतरण भी होता है। ई टिकट से चेकिंग स्टाफ को भी टिकटोंकी जाँच करने में काफी सुविधा होंगी।

संक्रमण काल मे रेल प्रशासन को इस तरह के कई बदलाव करते चलना है। यही समय है, यात्री और कर्मचारी दोनोंमें अनुशासन लाने का, जिस तरह रेल प्रशासन अपने वर्षों पुरानी समयसारणी के ढांचे को शून्याधारित प्रणाली लाकर बदल रही है, उसी तरह अपने वाणिज्यिक कामकाज को भी अद्यतन करने की सख्त जरूरत है। देखते है रेल प्रशासन क्या करता है।

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