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केवल आरक्षित, कन्फर्म टिकट धारक यात्री को ही यात्रा की अनुमति होने के बावजूद, गाड़ियाँ किस कदर दुगुनी, तिगुनी भर कर जाती है? समझे, यह है कारण

महाराष्ट्र, गुजरात के प्रमुख शहरों मुम्बई, पुणे, अहमदाबाद, सूरत से, दिल्ली से हजारों की संख्या में श्रमिक अपने गाँव की तरफ लौट रहे है। रेल प्रशासन इनके लिए सतत निरीक्षण कर हर 24 घंटे में अलग अलग गंतव्यों के लिए विशेष गाड़ियाँ घोषित करते जा रहा है और यह गाड़ियाँ तुरन्त फुल्ल बुक हो कर रवाना भी हो रही है।

जब गाड़ियाँ मुम्बई के छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस, लोकमान्य तिलक टर्मिनस, पनवेल, पुणे या पश्चिम रेल के मुम्बई सेंट्रल, बान्द्रा से निकलती है तो यथावत भरी होती है, जितने सीट्स उतने ही यात्री होते है, मगर नासिक, मनमाड़ के आगे गाड़ीके हर डिब्बे में दुगुने, तिगुने यात्री दिखाई देते है। कई यात्री खड़े है, पैसेज, दरवाजों में बैठे मिलते है इसका कारण क्या है? कैसे भर जाते है इतने यात्री जबकी गाड़ी से शुरुवाती जाँच में सबके पास आरक्षित टिकट होता है? हम कुछ समझाए इसके पहले एक यात्री का निम्नलिखित ट्वीट देखिए,

@Central_Railway @drmpune @BhusavalDivn 5 migrant labourer traveling in 01467 pune to Gorakhpur
They have reservation upto MMR
But they wish to go in same train
They r ready to pay fine.

fined them and try to give a place in at least 2S. If they do not get a place, they are ready to stand up. It is a request to help them from the point of view of humanity.
@RailMinIndia @RailwaySeva @PiyushGoyal @PMOIndia

उपरोक्त ट्वीट में यात्री लिख रहा है, की वह पुणे गोरखपुर गाड़ी में यात्रा कर रहा है, उसमे 5 श्रमिक बैठे है जिनके पास पुणे से मनमाड़ की टिकट है और वे उसी गाड़ी में आगे याने (गोरखपुर) जाना चाहते है। ट्वीट करने वाला व्यक्ति रेलमन्त्री, प्रधानमंत्री और रेल प्रशासन को ट्वीट कर आग्रह कर रहा है, मानवता के आधार पर इन यात्रिओंको आप मनमाड़ में मत उतारिए, आप भले ही इनसे जुर्माना ले लीजिए,गाड़ी में यह लोग कही बैठकर या खड़े होकर निकल जाएंगे।

तो यह सब हो रहा है। क्रॉस बुकिंग में नासिक, मनमाड़ या मार्ग के कोई स्टेशनोंकी बुकिंग में पुणे या मुम्बई से वह सीटें उक्त स्टेशनोंतक खाली मिलती है तो यह यात्री वहीं तक की टिकट ले कर गाड़ी में सवार हो जाते है। हो सकता है, अनाधिकृत टिकट विक्रेता (टाउट्स) इन लोगों को इस तरह के आधेअधुरे टिकट दे कर गाड़ीमे चढ़वा देते है और समझा देते है, पेनाल्टी बनवा लीजिए और चलते रहिए पोहोंच जाएंगे अपने गाँव। मार्ग के स्टेशनोंसे भी यात्री गाड़ी में चढ़ते है तो यह लोग मानवता की गुहार लगाकर वही डटे रहते है, या बर्थ के किसी कोने में, पैसेज में टिक जाते है। चेकिंग स्टाफ़ भी इनकी मजबूरी समझता है। क्या करें? बिना टिकट वाली पेनाल्टी बनाकर, रिसीट थमाकर अपनी कर्तव्यपूर्ती कर निकल जाता है। इस तरह गाड़ी स्टेशन दर स्टेशन भरते ही जाती है।

अब आप बताए, क्या यह उचित है? मानवीय आधार पर भी यह कतई ठीक नही। एक तरफ इस संक्रमणकाल में, यात्रिओंको मास्क पहनना, एक दूसरे से दूरी बनाए रखना नितांत आवश्यक है। ऐसे में मानवता यही है की इस तरह यात्रा बिल्कुल नही करना चाहिए। गाड़ियाँ बहुतायत में छोड़ी जा रही है। यात्रिओंको चाहिए की वे अपना धैर्य रखें, यात्रा का उचित टिकट ले तब ही यात्रा करे। उपरोक्त घटना में यदि रेल प्रशासन उन्हें मनमाड़ में गाड़ी से उतारती है, तो यह कतई अमानवीय व्यवहार नही है, बल्कि डिब्बे में बैठे बाकी यात्रिओंका सुरक्षा का विषय है।

रेल प्रशासन के पास जब प्रत्येक यात्री की यथास्थित जानकारी है, उसके गन्तव्य का पता भी टिकट लेते वक़्त दर्ज कराना जरूरी है, तब इस तरह यात्री मनमाड़ में न उतरते हुए कैसे आगे जा सकता है?

चार्ट में दर्ज है की 5 यात्री मनमाड़ उतरने वाले है, तो रेल प्रशासन यह क्यों नही देख पाता कि फलाँ कोच से, फलाँ सीट के यात्री गाड़ी से क्यों नही उतरे? रेल प्रशासन के पास पूरी व्यवस्था अद्ययावत है, यात्री की जानकारी है, उनको चाहिए की 5 यात्रिओंको मानवता(?) दिखाने के बजाए गाड़ीमे यात्रा करने वाले उन 500 यात्रिओंके प्रति अपना फर्ज, अपनी मानवता दिखाए। बिल्कुल जरूरी कानूनन कार्रवाई करे। गाड़ीमे जगह उपलब्ध हो तो ही उनसे जुर्माना ले कर टिकट बनवाए। कमसे कम इस संक्रमणकाल में तो यही अपने स्टाफ़ और यात्रिओंके प्रति सबसे उपयुक्त कर्तव्य है।

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