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“मै 1% चान्स रहा तो भी जाता हूँ”

अक्षयकुमार की एक बेहतरीन फ़िल्म “बेबी” का यह डायलॉग है। एक जासूसी मिशन की यशस्वी होने के अनुपात के संदर्भ में यह डायलॉग है। अब आप सोच रहे होंगे, हमारे रेलवे के ब्लॉग में यह सब कहाँसे आ रहा है?

मित्रों, जब देश मे कई जगहोंपर ऑक्सीजन के किल्लत की बात सामने आई और विशाखापट्टनम स्टिल प्लांट्स से मुम्बई ऑक्सीजन लाना था तब रोड ट्रांसपोर्ट के मुकाबले रेल से ऑक्सीजन लाने में 12 से 18 घंटे के समय की बचत हो रही थी, तब रेल प्रशासन की भूमिका कुछ इसी प्रकार की थी। तमाम परिचालन की बाधाओंको देखने के बावजूद यदि इतना समय बचाया जा सकता है तो दिक्कत क्या है? ऐसी घड़ी में एक एक मिनट कीमती है, यहाँपर तो कुछ घंटे बचाए जा सकते है। रेल प्रशासन ने इस चुनौती का बीड़ा उठाया और मिशन यशस्वी भी कर दिखाया।

मुम्बई के कलम्बोली से खाली टैंकर लेकर गाड़ी विशाखापट्टनम के लिए निकलने वाली थी और विशाखापट्टनम से टैंकरों में LMO (लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन) भर कर नासिक तक वापस आनी थी।माइक्रो निरीक्षण के लिए उच्चस्तरीय कमिटी बनाई गई। इस तरह की मालगाड़ी को रो रो सर्विस कहते है। जब सैन्य दल की मुव्हमेंट होती है तब जो सावधानी बरती जाती है वैसे ही सारी तैयारी की गई। पूरे मार्ग के नक्शे, सुरंग, ROB पुलिया का अभ्यास किया गया। टैकरोंकी गाड़ी पे लदाई, उतरवाई के लिए जरूरी ठिकानों पर रैम्प बनवाए गए, जिसमे कलम्बोली का रैम्प केवल 24 घंटे में तैयार किया गया। द्रवरूप ऑक्सीजन यह घातक रसायन होता है, आज तक रेल्वेद्वारा इसका ट्रांसपोर्ट नही किया गया था। जब टैंकरों में यह ऑक्सीजन भरा होता है तब परिचालन में बहुत एहतियात बरतनी पड़ती है। यहाँपर तो यह टैंकर रेलगाड़ी पर लदने थे। परिचालन में 60 किलोमीटर प्रति घंटे की गति स्थिर रखना, अचानक गति को बढ़ाना या कम करना, तीव्रता से गाड़ी रोकना यह सब नही चलनेवाला था। इसके लिए तुरन्त में, रेल के परिचालन विभाग के कर्मियोंको प्रशिक्षित किया गया।

सारी मुव्हमेंट के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया ताकि गाड़ी के परिचालन में कहीं कोई रुकावट न आए। आननफानन में कलम्बोली में टैंकरोंको गाड़ी में चढ़ाने के लिए रैम्प बनाया गया। मुम्बई से विशाखापट्टनम जाने के लिए दो मार्ग है एक इगतपुरी, भुसावल, नागपुर, रायपुर होकर तो दूसरा कर्जत, पुणे, सोलापुर, वाड़ी होकर मगर इन दोनों मार्गपर घाट सेक्शन में सुरंगों की बाधा थी। मालगाड़ी जिसमे टैंकर लदे थे उसकी ऊंचाई, चौड़ाई इन सुरंगोसे गुजरने के लिए दिक्कत बन गयी थी। अतः गाड़ी को वसई रोड उधना जलगाँव होकर भुसावल लाया गया और आगे नागपुर, रायपुर विशाखापट्टनम ले जाया गया।

कलम्बोली से विशाखापट्टनम अन्तर करीबन 1850 किलोमीटर है। खाली टैकरोंसे लदी गाडीने मिशन का यह पहला टप्पा 50 घंटे में पूरा किया। कुल 7 टैंकर में, प्रत्येक में 100 टन LMO भरा गया जिसके लिए 10 घंटे लगे और यह चुनौतीपूर्ण वापसी यात्रा शुरू हुई।विशाखापट्टनम से ऑक्सीजन से भरे 7 टैकरोंको लेकर, केवल 21 घंटे में यह गाड़ी नागपुर पोहोंची। वहाँपर 4 टैकरोंको उतारा गया, फिर मिशन का अगला और आखरी सफर नासिक था जो करीबन 650 किलोमीटर का है, केवल 12 घंटे में पूरा हुवा। आखरी 3 टैंकर नासिक में उतारे गए और इस तरह यह चुनौती रेलवे ने पूरी की।

यह बोकारो से लखनऊ जा रही ऑक्सीजन विशेष गाड़ी का वीडियो है।

सड़क मार्ग से यह टैंकर आते तो पूरे सफर में 3 दिन लगनेवाले थे, रेलवे यह चुनौतीपूर्ण काम 2 दिन में किया

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