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यह कैसी होड़ है?

जब सम्पदाए सीमित हो तब जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला तत्व कारगर होता है। फिलहाल यूँ कह लीजिए जिसका सांसद उसकी रेल। यह सब बातें गाड़ियोंके खींचतान को लेकर चल रही है।

रेल विभाग एक केंद्रीय व्यवस्था है, जिसपर देश की मध्यवर्ती शासन व्यवस्था का नियंत्रण रहता है। राज्य शासन की ज्यादातर दखल नही रहती। अतः रेल विभाग में राजनीतिक दखल, सुझाव, प्रस्ताव भी सम्बन्धित राजनीतिक ही देते है। आम तौर पर यात्रिओंको इन विषयोंपर ज्यादा सरोकार नही होता अपितु कुछ यात्री संगठन मसलन शौकिया या जरूरतन स्थापित डेली अप डाउन यात्री संगठन, मण्डल या क्षेत्रीय रेल उपभोक्ता समितियां जो की रेल प्रशासन द्वारा गठित की जाती है, जनमानस को अपने हक़ के प्रति जाकरुक करते रहती है। आम जन को इन्ही लोगोंकी बयानबाजी से ज्यादातर अपने नफे-नुकसान के बारे मे समझता है या समझाया जाता है।

कुछ वर्षोँपहले तक रेल प्रशासन अपने व्यवस्थाओके मुजीब गाड़ियोंका प्रस्ताव रेलवे बोर्ड को भेजता था और रेलवे बोर्ड सम्बन्धित सभी क्षेत्रीय रेलवे की सहमति लेने के बाद उस गाड़ी की घोषणा करता था। यही स्वरूप गाड़ियोंके विस्तार, फेरे बढाने में भी कायम रहता था। धीरे धीरे रेल विभाग का देशभर में विस्तार होने लगा, अलग अलग ब्रांच लाइन का गेज कन्वर्शन होने के साथ ही सीधी गाड़ियोंकी मांग होने लगी। दरअसल एक देश एक गेज, यह यूनिगेज प्रोग्राम मालवहन व्यवस्था को सुचारू करने हेतु बनाया गया था। एक गेज के मालगाड़ी से माल उतार कर दूसरे गेज की मालगाड़ियों में लदवाना बेहद तकलीफ़ों भरा था और इस वजह से रेल विभाग की मालवहन व्यवस्था सीमित हो जाती थी। यूनिगेज में देश के सुदूर इलाकोंतक माल का बिना चढ़-उतार किए बिना मालवहन हो सकता है।

जब मालगाड़ियां अलग अलग ब्रांच लाइनोंसे निकल कर मेन लाइन्स पर और फिरसे ब्रांचेस पर चलाई जा सकती है तो यात्री गाड़ियाँ क्यों नही? ऐसे करते करते देश के छोटे से छोटे ब्रांच लाइन से भी लम्बी दूरी की गाड़ियाँ चलाई जाने लगी, गाड़ियोंके विस्तार होने लगे। रेल मंत्रालय का नए गाड़ियोंकी घोषणामे, विस्तार और फेरोंके बढाए जाने में दखल बढ़ने लगा। व्यवस्थाए राजनीति के हिसाब से ढलने लगी और सत्तारूढ़ राजनीतिक अपने दलबल के आधार पर गाड़ियोंके गन्तव्य में खींचतान करने लगे। यह बातें बिल्कुल भी छिपी नही रहती बल्कि अखबारोंके प्रथम पृष्ठोंपर गौरवपूर्ण तरीकेसे, राजनीतिक के नाम, पदनाम के साथ छपती है। खास बात तो यह है, की आम जनता को भी इस दखलंदाजी से कोई एतराज नही बल्कि वह भी इसे उक्त राजनयिकों का विशेषाधिकार समझती है।

गाड़ी की यदि गति बढाई जाएगी तो समयोंमे अन्तर आना स्वाभाविक है, उसी तरह रेल विभाग अपनी व्यवस्थाओमें सुधार कर कुछ बदलाव करता है, फेरे बढ़ाता है, स्टापेजेस हटाता है या गन्तव्य में बदलाव करता है तो यात्री संगठनोंकी ओर से स्थानिक यात्रिओंको आगाह किया जाता है कि उनका नुकसान कितना हो रहा है, जब की रेल विभाग यात्रिओंके फायदे जताने का प्रयत्न करता है। अब जब भी रेल विभाग की ओरसे यात्री गाड़ियोंमे छोटे से छोटे बदलाव की खबर आती है तो यात्री संगठन से लेकर राजनीतिक सारे की सारे सक्रिय हो जाते है। होड़ मच जाती है, कोई उक्त बदलाव को अपनी उपलब्धि बताता है तो कोई क्षेत्र के जनता के घनघोर नुकसान की दुहाई देता नजर आता है। हालाँकि जनता यह सब कवायद मूक दर्शक बन देखती रहती है।

भारतीय रेल की स्थापना हुई तब से ही रेल विभाग की कार्यप्रणाली सुचारू रूप से चलती रहे इसके लिए अलग अलग क्षेत्रीय कार्यालय बनाए गए। यह सब मेन लाइन और उसपर होने वाले कार्य बहुलता को देखकर उनको अलग अलग क्षेत्रों में बाँटा गया था न की अलग अलग राज्योंकी अलग अलग क्षेत्रीय रेलवे व्यवस्था थी। मगर जिस तरह यात्री संगठन या राजनीतिक इन व्यवस्थाओंको तोड़ मरोड़ कर जनता के सामने ला रहे है, यह देखकर अचरज़ होता है की क्या मध्य रेल महाराष्ट्र, पश्चिम रेल गुजरात का प्रतिनिधित्व करती है? क्या महाराष्ट्र का नान्देड, सिकंदराबाद वाले मुख्यालय के दक्षिण मध्य रेलवे का मण्डल नही हो सकता या पश्चिम रेलवे में रतलाम मण्डल खुद को असहज महसूस करता है? या खण्डवा, बुरहानपुर यह मध्य प्रदेश के शहर पश्चिम मध्य रेलवे में सम्मिलित होने की ख्वाहिश रखते है।

यह चन्द राजनीतिक असमंजसता की विचारधारा का फलित है। अपने, श्रेय हड़पने की होड़ में देश की रेल व्यवस्था को राज्य और शहरोंतक तक ला कर रख दिया है।

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