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लिंक एक्स्प्रेस, स्लिप कोच का बंद होना क्या रेल्वे की उत्पादकता बढ़ाता है या यात्रीओं की परेशानी?

मध्य रेल मे भुसावल मण्डल का अलग ही एक महत्व है। जब हमारे देश मे रेल चलने लगी तो भुसावल सबसे पहला और एशिया का सबसे बड़ा लोको शेड बना। आज भी भुसावल शहर का अर्थकारण रेल कर्मचारियों के बदौलत चलता है, क्योंकी शहर की तकरीबन 70% आबादी रेल विभाग से किसी न किसी रूप से जुड़ी हुई है। भुसावल शहर की पहचान ही रेल्वे जंक्शन से है।

एक वक्त ऐसा था की भुसावल से देश के चारों ओर की गाड़ियों मे स्थानीय यात्रीओं को आरक्षित कोटा, स्लिप कोच आदि विशेष व्यवस्था के चलते जगह मिलने के लिए कतई परेशानी नहीं होती थी। मुम्बई की ओर सुबह सेवाग्राम एक्स्प्रेस मे दो कोच, काशी एक्स्प्रेस मे दो कोच, रात मे हावड़ा एक्सप्रेस मे एक फर्स्ट क्लास एवं एक द्वितीय श्रेणी ऐसे दो कोच, हावड़ा के लिए हावड़ा मेल मे एक पूरा स्लीपर कोच और आरक्षित कोटे की तो बात ही मत कीजिए, प्रत्येक गाड़ी मे भुसावल से भरपूर कोटा होता था। मगर जैसे ही PRS सिस्टम कम्यूटराइज हुए सारे आरक्षित कोटे उड़नछू हो गए। रेल्वे की शंटिंग वाली नीति बदली और स्लिप कोच बंद हो गए। यह सिर्फ भुसावल शहर नहीं सारे मण्डल की परेशानी हो गई। भुसावल और जलगाँव शहर इतने दूरी पर नहीं की कोई इन्हे अलग समझता हो। मात्र 25 किलोमीटर की दूरी है दोनों शहरों के बीच। जलगाँव जिले के बहुतांश लोग रेल संपर्क के लिए भुसावल स्टेशन का ही उपयोग करते है। जब स्लिप कोच बंद हुए तो उसमे भुसावल के साथ साथ महाराष्ट्र एक्स्प्रेस का धुले -चलिसगाव – पुणे और पठानकोट एक्स्प्रेस का धुले – चलिसगाव – मुम्बई कोच भी बंद हो गए। महाराष्ट्र एक्स्प्रेस का गोंदिया – दौंड – सोलापूर कोच बंद हो गया। काशी एक्स्प्रेस का गोरखपुर – भुसावल – कोल्हापूर कोच का शंटिंग बंद हो गया, सेवाग्राम एक्स्प्रेस का मुम्बई – वर्धा – बल्हारशाह के 4 कोच बंद हो गए। कुल मिलाकर यह समझीए की ब्रांच स्टेशनोंकी संपर्कता मिट्टी मे मिल गई और बड़े बड़े जंक्शन नाममात्र रह गए। कहने को सीधी गाडियाँ चलाई गई है मगर जहां प्रतिदिन व्यवस्था थी वहाँ पर संपर्क कट कर साप्ताहिक रह गया है।

रेल प्रशासन के लिंक गाडियाँ और स्लिप कोच बंद करने के पीछे गाड़ियोंके परिचालन समय मे कमी लाना यह है, मगर इससे यात्रीओं के कनेक्टिविटी का जो नुकसान हुवा है उसपर उनका ज्यादातर ध्यान नहीं है। देश के उत्तरी भाग उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल क्षेत्र मे रेल लाइनोंका जाल समृद्ध है। वहाँपर संपर्कता की कोई कमी नहीं, गाडियाँ भी बहुतायत मे है मगर पश्चिम मे गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र का पुणे कोल्हापूर इलाका, विदर्भ एवं मराठवाडा, मध्य प्रदेश का राजस्थान से जुड़ा इलाका, दक्षिण मे कर्नाटक, केरल इनमे ऐसे लिंक और स्लिप कोचों के बदौलत ढेर कनेक्टिविटी रहती थी। जिसे पटरी पर लाने मे अब कई पापड़ बेलने पड़ेंगे। ढेर व्यवस्था बढानी पड़ेगी। मंदसौर से कोटा होते हुए देहरादून एक्स्प्रेस मे एक हरिद्वार मेरठ लिंक एक्स्प्रेस चलती थी जो मंदसौर के यात्रीओं को दिल्ली, हरिद्वार से जोड़ती थी अब उस क्षेत्र के यात्री सीधी गाड़ी के लिए बेहद परेशान है। कुछ ऐसा ही राजस्थान के सुदूर क्षेत्र बाड़मेर, जैसलमेर के लिए भी लागू होता है। हावड़ा, गौहाती, दिल्ली से बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर, बीकानेर के लिए प्रतिदिन जोड़ने का काम यह लिंक गाडियाँ मेड़ता रोड जंक्शन स्टेशन से कर रही थी जिन्हे अब बंद करने से यह प्रतिदिन की संपर्कता द्विसाप्ताहिक, त्रिसाप्ताहिक रह गई है। हमारे बदलते और तीव्र गति से विकास करने वाले देश मे क्या इन रोज की संपर्कता का समाधान इस तरह हो सकता है? कतई नहीं।

रेल्वे को चाहिए की जहाँ जहाँ ऐसे लिंक एक्स्प्रेस और स्लिप कोच की व्यवस्था बंद की गई है उन स्टेशनोंकी, उनके परिसर की पुनः समीक्षा की जाए। लिंक एक्स्प्रेस चलाना संभव नहीं है तो नई गाड़ी की व्यवस्था करें या गाड़ियों को विस्तारित करें और उक्त संपर्क को फिर से स्थापित करने का प्रयास करें। जहाँ संभव हो ब्रांच लाइनों को मुख्य जंक्शन के लिए पृथक इंटरसीटी, डेमू, मेमू गाडियाँ चलाई जाए। यज्ञपि रेल प्रशासन ने गाड़ियों के ‘लाय ओवर पीरियड’ याने गंतव्य स्टेशन पर रैक के खाली पड़े के समयों की समीक्षा कर उन्हे निकटतम जंक्शनों पर चलवाने की प्रक्रिया शुरू की है फिर भी ऐसी कई गाडियाँ है जिन्हे अगले जंक्शन तक ले जाया जा सकता है। मुम्बई नागपूर सेवाग्राम एक्स्प्रेस को गोंदिया तक, लोकमान्य तिलक टर्मिनस मनमाड गोदावरी एक्स्प्रेस को भुसावल तक, निजामुद्दीन भुसावल गोंडवाना एक्स्प्रेस को साईनगर शिर्डी तक, काचेगुडा अकोला इंटरसिटी को भुसावल तक ऐसे कई उदाहरण दीए जा सकते है और जिन पर रेल विभाग काम कर सकता है। उक्त गाडियाँ आगे बढ़वाने मे इनका लाय ओवर पीरियड ही काम या जायगा और किसी अलग रैक की जरूरत नहीं पड़ेगी।

लिंक एक्स्प्रेस या स्लिप कोच बंद करवाने का स्थायी समाधान खोजना बेहद जरूरी है। इसमे न सिर्फ यात्री परेशान हो रहे बल्कि रेल्वे के मालवहन आदि राजस्व पर भी गहरा असर पद सकता है।

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