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चलिए फिर तैयार हो जाइए, भारतीय रेल की “कैटल क्लास” यात्रा के लिए!

दरअसल ‘कैटल क्लास’ सीधा अर्थ जानवरों को ढोए जाने के लिए उपयोग मे लाने वाला डिब्बा यह होता है और इसीलिए हम, भारतीय रेल के सभी सन्माननीय रेल यात्रीओंकी हृदय से क्षमा मांगते हुए लेख का यह शीर्षक दे रहे है। कल दिनांक 28 फरवरी को रेल प्रशासन द्वारा संक्रमणकाल की पूर्व स्थिति अनुसार यात्री गाड़ियोंकी आसन व्यवस्था को आरक्षित/अनारक्षित अवस्था मे पुनर्स्थापित किए जाने की सूचना जारी की गई।

हमारी रेल व्यवस्था मे मेल/एक्स्प्रेस द्वितीय अनारक्षित कोच के लिए ‘कैटल क्लास’ की संज्ञा का उपयोग करना भी अतर्किक है क्योंकि जानवरों को भी ढोते वक्त उनकी संख्या का निर्धारण किया जाता है मगर मेल/एक्स्प्रेस के अनारक्षित कोचों मे जिस तरह यात्री ठूँस-ठूँस कर यात्रा करते रहते है यह बेहद मानवीयता की परिसीमा है। अब तक संक्रमणकालीन निर्बंध के चलते तमाम यात्री गाड़ियोंमे द्वितीय श्रेणी के सभी कोचेस आरक्षित स्वरूप मे चलाए जा रहे थे और इसके बावजूद भी कुछ गाड़ियोंमे इन कोचेस मे अनावश्यक तरीकेसे यात्री यात्रा कर ही रहे थे हालांकि अनारक्षित द्वितीय श्रेणी व्यवस्था लागू होने को अभी भी 120 दिनोंकी प्रतीक्षा है। इसकी मुख्य वजह यह थी की रेल प्रशासन इन कथित आरक्षित कोचों मे कभी भी टिकट निरीक्षक को नियुक्त नहीं कर पाई यह हकीकत है।

हम यह कतई नहीं कह रहे है, की भारतीय रेल मे द्वितीय श्रेणी जनरल क्लास रहे ही ना अपितु उसे इस तरह का ‘कैटल क्लास’, जानवरों से भी बदतर हालातों मे रेल यात्रीओं को यात्रा करनी पड़े इस बात पर आपत्ति है। रेल प्रशासन को चाहिए की वे अब लंबी दूरी की गाड़ियों मे कुछ आरक्षित द्वितीय श्रेणी कोच की व्यवस्था बरकरार रखते हुए द्वितीय श्रेणी अनारक्षित कोच बढाए, स्थानीय यात्रिओंके लिए संक्रमणके पूर्वकाल मे चलनेवाली तमाम अनारक्षित डेमू/मेमू/सवारी गाड़ियोंको तत्काल पुनर्स्थापित करे और MST धारकोंकी संख्या देखकर उस क्षेत्र में जरूरत के अनुसार इंटरसिटी गाड़ियाँ चलवाए।

MST पास धारक रेलवे के महीने या तीन महीने का अग्रिम किराया भुगतान कर चलनेवाले निश्चित यात्री है और उनके लिए रेल प्रशासन को पूर्व नियोजन करने में कतई परेशानी नही होनी चाहिए। रेल प्रशासन को इन लोगोंके संख्या की जानकारी पास जारी करते वक्त ही हो जाती है फिर भी इन यात्रिओंके प्रति रेल प्रशासन कितनी अनास्था रखती है यह शोचनीय बात है। ग़ैरउपनगरिय क्षेत्रों में MST पास जारी तो कर दिए जाते है मगर इन यात्रिओंकी यात्रा सुचारू और सुरक्षित हो इस लिए कोई सटीक प्रबन्ध नही किया जाता और यह लोग पहले ही यात्रिओंसे ठूस ठूस के भरे हुए कोचेस यात्रा करने के लिए मजबूर होते है।

रेल प्रशासन के पास यदि स्थानीय डेली कम्यूटर, रोजाना अप डाउन करने वाले यात्रिओंके लिए बेहतर व्यवस्था ना हो तो लम्बी दूरी के अनारक्षित द्वितीय श्रेणी के यात्रिओंको 120 दिनों बाद आने वाली “कैटल क्लास” की दुरावस्था के लिए तैयार हो जाना चाहिए अन्यथा रेल प्रशासन को स्थानीय यात्रिओंकी नियमित गाड़ियाँ, MST विशेष नियमित कोचेस की व्यवस्था करना अतिआवश्यक हो जाता है।

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