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‘ट्रेन्स ऑन डिमाण्ड’ अर्थात मांग के आधार पर गाड़ियोंकी उपलब्धि

निम्नलिखित गाड़ियोंकी सूची देख लीजिए फिर आगे इस TOD के ज्वलंत मुद्दे पर चर्चा करते है,

06044/43 कोचुवेली तंबाराम कोचुवेली एक फेरा विशेष

02190/89 जबलपुर नांदेड जबलपुर एक फेरा विशेष

03023/24 हावड़ा पटना हावड़ा एक फेरा विशेष

03175/76 सियालदाह गौहाटी सियालदाह एक फेरा विशेष

03401/02 भागलपुर दरभंगा भागलपुर एक फेरा विशेष

उपरोक्त गाडियाँ रेल्वे की भर्ती परीक्षा हेतु चलाई जा रही है। इन गाड़ियोंके परिपत्रक मे आप जो TOD मार्क देख रहे है वह है ‘ट्रेन ऑन डिमाण्ड’ यह वह तरकीब है जो बीते वर्ष रेल सीईओ वी के यादव ले आए थे। धारणा यह थी, जिन गाड़ियों मे यात्रीओंकी प्रतीक्षा सूची लंबी खींच जाए उन गाड़ियोंकी क्लोन, प्रतिकृति गाड़ी चलाई जाए ताकि मुख्य गाड़ी का प्रतीक्षा सूची यात्री भार के लिए एक अतिरिक्त गाड़ी तुरंत ही हाजिर रहेगी और यात्रीओंकी परेशानी थोड़ी कम होगी। हालांकि यादव जी के समय यह क्लोन ट्रेन हुवा करती थी, जैसे ही अधिकारी बदले नाम भी बदल गया और अब यह गाडियाँ TOD कहलाने लगी है।

यह TOD गाडियाँ यात्रीओंकी मांग अत्यधिक रहने से एक फेरा तत्व पर चलाई जाती है। वैसे तो हमारे देश मे कहीं से कहीं के लिए ट्रेन चलवा दें, यात्री भार की कौनों कमी नाही। पहले जो जो गाडियाँ हॉलिडे स्पेशल, एग्जाम स्पेशल, मेला – सत्संग स्पेशल इत्यादि चलती थी वह सारी विशेष गाडियाँ इस TOD श्रेणी मे लाई गई है। इसकी विशेषता यह है, यह गाडियाँ 1.3 किराया दर से चलाई जाती है, परिचालन के एक दिन यहाँतक की महज कुछ घंटों पहले घोषित की जाती है, केवल एक फेरा गाड़ी होती है। अब आप कहोगे विशेषताएं बता रहे हो या बुराइयाँ गिनवा रहे हो? जी, हकीकत तो यही है। जिनकी एग्जाम होगी या किसी शादी ब्याह मे जाना होगा, क्या वह यात्री निकलने के आखरी वक्त तक रेल्वे द्वारा की जाने वाली विशेष गाड़ी के जादुई घोषणा की प्रतीक्षा करता रहेगा? जादुई इसलिए की कोई भरोसा ही नहीं की कौन सी गाड़ी चलाई जाएगी और उसका मार्ग, समयसारणी क्या होगी? अत: यह जितनी भी एकल फेरा गाडियाँ अब तक घोषित की गई है, बिल्कुल ही बिल्कुल खाली ही चली है।

दरअसल कुछ वर्षों पहले, यह क्लोन, ट्रेन ऑन डिमाण्ड और 1.3 वाले किराये इत्यादि घोषणाओं के पहले, सभी क्षेत्रीय रेल्वे फरवरी महीने तक अपनी गर्मी विशेष गाड़ियोंकी घोषणा कर देती थी और यात्री बाकायदा 2 – 2 महीने पहले अपना आरक्षण भी कर लेते थे, जो बिल्कुल योग्य और सुविधाजनक था मगर पता नहीं रेल प्रशासन ने क्या सोची और वह पद्धति बंद हो गई या नियंत्रित कर दी गई और यह इन्स्टेन्ट वाली गाड़ियोंका आविष्कार किया गया। एकतरफ मुम्बई की ओर से उत्तरी भारत के लिए हर आधे-एक घण्टे से हर रोज लगातार पूरे सप्ताह के लिए भी गाडियाँ चले तो भी उन्हे यात्री भार की कमी न होगी मगर इन यात्रीओंके लिए रेल प्रशासन के पास कोई नियोजन नहीं है। सप्ताह मे 2-3 दिन एखाद गाड़ी चलाने से यात्रीओंका समाधान नहीं होता है और ना ही सब्र। वह तो बिना आरक्षण, बिना टिकट और बिना जगह गाड़ी के दरवाजे मे लटकता या टॉयलेट के बगल मे, पैसेज मे खडा होकर अपने गाँव निकल जाता है।

यह बात कतई नहीं की यात्री पैसे बचाना चाहता है, चूंकि उसे टिकट नहीं मिलती, आरक्षण नहीं मिलता यहाँ तक की अगले दिन कोई गाड़ी होगी यह भरोसा भी नहीं मिलता तो वह खुद की जान की परवाह न करते हुए किसी तरह सामने खड़ी गाड़ी मे यात्रा करने मजबूर हो जाता है। यह वहीं यात्री है जो संक्रमण काल के दौरान गाड़ियोंके अभाव मे पैदल ही अपने गाँव निकल पड़ा था। तब प्रशासन ने आनन-फानन मे कई श्रमिक गाडियाँ चलवाई और इन लोगों को गाडियाँ उपलब्ध करवाई गई। लेकिन आज भी यह यात्री ऐसे ही बैचेन हो जाते है, इनके लिए अभी भी रेल प्रशासन पूर्व नियोजन नहीं करती है और यह लोग उसी प्रकार गाड़ियों मे बेहद करुण अवस्था मे यात्रा करते हुए अपने गाँव पहुंचते है। यह हकीकत है, आप किसी भी स्टेशन पर मुम्बई की ओरसे उत्तर भारत मे वाराणसी या बिहार मे पटना की ओर जाने वाली गाड़ियोंमे देख सकते हो, और हम प्रशासन से भी पूरी विनम्रता के साथ निवेदन करते है की आप भी देखिए और इनके लिए कुछ तो पूर्व और यथोचित नियोजन कीजिए। अभी जून के पहले सप्ताह से यही यात्री उलटी दिशामे अर्थात मुम्बई, पुणे, गुजरात की ओर वापसी यात्रा शुरू करेंगे। इन्हे इंस्टेंट वाली गाड़ियोंकी की जगह सप्ताह, दो सप्ताह पहले घोषणा कर गाडियाँ उपलब्ध करवाएं।

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