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आखिर, रेल प्रशासन करे तो क्या करें?

उज्जैन की घटना बस कल परसों की ही है। एक ग्रामीण महिला अपने तीन बच्चोंके साथ उज्जैन से सीहोर जानेवाली गाड़ी में चढ़ी। पति पीछे टिकट खरीदकर आ रहा था। गाड़ी निकल पड़ी। महिला पता नही पति गाड़ी नही पकड़ पाएगा ऐसा सोच अकेले यात्रा करने से डर गई, या टिकट नही होने की वजह थी, उसने क्या सोचा, क्या समझा बस चलती गाड़ी से सामान फेंका, अपने एक – एक कर बच्चे को गाड़ी से फेंका और आखिर वह भी चलती गाड़ी से कूद गई। इस भयावह घटना मे राहत की बात यह थी की कोई जानमाल की नुकसानी नहीं हुई।

यह घटना, महिला का बिना टिकट यात्रा का डर कहें या और कुछ मगर चलती गाड़ीसे बच्चों को फेंकना, फिर कूद जाना यह बात आम यात्रीओंके लिए विचार करने को मजबूर कर देने वाली घटना थी। रेलवे हमेशा से कहती है, आम यात्रिओंके लिए जाहिर सूचनाएं देती है। रेल गाड़ी में सवार होने के लिए, स्टेशन पर गाड़ी के समय से, 30 मिनट पहले आये, उचित टिकट के बिना रेलवे के अहाते तक मे प्रवेश न करे। चलती गाड़ी मे न चढ़े, न उतरे। अन्य प्लेटफार्म पर जाने के लिए ऊपरी पैदल पुल का उपयोग करे।

अब यह बातें और किस तरह कहनी चाहिए? क्या रेल प्रशासन यह कहें की आप गाड़ी मे गैरकानूनी तरीकेसे चढ़ गए है तो डरिए नहीं, क्योंकी सिर्फ आप ही बिना टिकट गलतीसे यात्रा नही कर रहे अपितु कई निगरगट्ट और शर्मोहया त्याग चुके लोग गाड़ी में जानबूझकर भी बिनाटिकट चढ़े हुए है। उन्हें तो पकड़े जाने का कोई डर ही नही लगता, 5 -50 के टिकट की ऐवज में 1000-500 का जुर्माना या कभी हाथोंमें रस्सी डालकर पुलिसकर्मियों के साथ बारात, फिर हवालात। इतनी बात से उन्हे डर नहीं लगता। बड़े बेडर, फिर आप क्यों डरते हो? क्या यह कहें रेलवे?

या यह कहे, सामने के प्लेटफॉर्म पर तो जाना है, देखिए, सैकड़ो लोग झट छलांग लगा कर दूसरे प्लेटफार्म चढ़ जाते है। कभी गिरते है, कभी रेल से टकराते है, कटते है, कभी कभार मरते भी है। जान जोखिम में डालते है मगर सीढियां चढ़ने की मेहनत बचा लेते है।

चलती गाड़ी से चढ़ना/उतरना तो कई यात्री अपनी शान समझते है। कहते है, जहां हम गाड़ी छोड़ते है, वहां से बाहर जाने का रास्ता पास पड़ता है। समय की बचत होती है। फिर पान के ठेले पर 15 मिनट बतियाते रहेंगे, मगर गाड़ी से वही उतरेंगे जहां एग्जिट पॉइंट पास हो। इनकी पत्नी, बच्चे, मातापिता घर राह देखते रहते है, हमेशा तो ईश्वर की कृपा और मातापिता के आशीष से सलामतीसे घर पहुंच जाते है। एखाद बार चलती गाड़ी से उतरते वक्त गलती से, हड़बड़ाहट में फिसल गये तो? कहीं प्लेटफॉर्म पर कुछ अनजान कचरे, केले के छिलके से, सामान से या असमान जमीन से सामना हो गया और प्लेटफॉर्म एव गाड़ी के बीच की जगह मे गिर गए तो? है? ऐसा कभी होता है भला? क्योंकि ऐसे यात्री तो मिल्खा सिंग से भी तेज भाग सकते है, छलाँग लगाने मे इनकी क्षमता ऑलम्पिक दर्जे की होती है और शरीर ऐसा की दारासिंह जितना मजबूत। गिर भी गए, रेल के चपेट मे भी आ गए तो भी कट नही पाएंगे, क्यों? मगर हर यात्री इन यात्रीओं की तरह सुपर या स्पाइडरमॅन थोड़े ही होता है?

दूसरा, कई यात्री रेल्वे कोच को अपने घर की तरह समझते है। सामने के यात्रीओंके आसन पर पैर रख बैठना, अपने मुँह मे ‘केसरी’ सूखा मेवा चबा चबा कर, उसका ‘केसरी रस’ कोच के अंदर ही किसी कोने मे छिड़कने के लिए कोना ढूंढते रहते है। आप को पता तो होगा ही हल्का होने के लिए कौन कोना ढूंढते रहता है? समझदार हो, तो शायद अपने घरों की दीवारों, झरोकों और दरवाजों के पीछे भी यह सन्माननीय यात्री इसी तरह से रंगरोगन किया करते होंगे। अब ऐसा है की, रेल्वे तो इनको इनकी अद्भुत कलाकृतियों के चलते पुरस्कृत (?) भी कर दें मगर यह मॉडर्न पिकासो इतने शर्मीले और प्रसिद्धी पराङ्मुख होते है की ना ही अपने उस मॉडर्न आर्ट पर ऑटोग्राफ करते है न ही जाहीर करते है की वह इस अनुपम चित्रकारी के चित्रकार है।

मित्रों, रेल यह हमारी, आपकी अपनी संपत्ति है। इसका उपयोग हमे सबके साथ मिलकर करना है अत: जितना हम अपने लिए साफसुथरा चाहते है उतना ही औरों के लिए भी सोचें। रेल प्रशासन आपके लिए जो सूचनाए देता है, वह निश्चित ही आपके सुरक्षा हेतु है। रेल गाड़ी अपने दायरे से बाहर आपको नुकसान करने कभी नही आती, आप अपनी लापरवाही, बेपरवाह व्यवहार से उसके दायरे में जाते है और अपनी जान जोखिम में डालते है। जिस तरह आग, पानी, हवा, यंत्र का उपयोग हम सावधानी से करते है, उसी तरह रेलवे भी यांत्रिक साजोसामान है, जिसके उपयोग की कुछ नियम और पद्धति है, यदि यात्री इसके उपयोग के तरीके का सन्मान नही करेगा तो नुकसान भी उठाना पड़ सकता है और यह हानि आपके जान तक की भी हो सकती है।

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