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अपना सिक्का खोटा हो तब ही तो आधी कीमत में चलाने की कोशिश होती है!

क्या आप उपरोक्त बयान को रेल द्वारा पूरे पैसे लेने के बावजूद टिकट पर छपे, “केवल 57% ही किराया चार्ज कर रहे है” इससे तो नही न जोड़ रहे? अरे हम कहत रहे है, बेशक जोड़िए, का है की भैया, हम को तो कौनो रियायत नही मिलती रेल किरायोंमे और जब हम पूरा किराया देते है और ऊ लोगन कहते है, हमरा 43 प्रतिशत किराया दूसरे लोगो की जेबन से आवत रहा तो हमको बड़ा गुस्सा आता है। माथा भनभना जात है। क्यूँ भई, हमने आपको कहा, की हमसे आधा ही किराया लेव? पूरा पैसा जो आपने मांगा हमने दिया, साथ ही आपके फलाने, ढेकड़े टेढ़े मेढ़े चार्जेस उ भी दे दिए मगर जौन व्यवस्था आप देवे का करी उसमे आप बराबर कटौती करते रहे।

द्वितीय श्रेणी या स्लीपर क्लास अब तो सारे ही आरक्षित वर्ग है मगर जितनी सीटें उतनी ही सवारी होना चाहिए की नही? मगर ऐसा होता है भला? भैया दुगुनी, तिगुनी सवारियाँ डिब्बे में ठूंसी रहती है। बराबर हिसाब जमा लेते हो आप। द्वितीय श्रेणी, स्लीपर में आधा किराया ही वसूलते हो तो सवारी भी तो दुगुनी भरोगे, है नी?

हम एक सनीमा में डाइलॉग सुने थे, ” प्रशासन अगर चाहे तो एक जोड़ी चप्पल भी किसी मंदिर के बाहर से चोरी नही हो सकत है” उ ही बात हियाँ पर भी लागू है। रेल में चाय, समोसा, कचौरी बेचने वाले सिर्फ गाड़ी के यात्रिओंको ही दिखते है, रेल के चौकीदारोंको नही। भिक मांगनेवाले, तृतीय पंथी जो जबरी टैक्स सवारियों से झपटते है, कहते है, अभी तो मुद्दल ही जमा हुवा है, अपना जेब तो इसके आगे भरेगा। तो भई, यह मुद्दल मुद्दल है वह किस रास्ते, कौनसे कलर की जेब मे जाएगा? पानी बोतल तो अब ऑफिशियल ₹20/- का कर दे रेल वाले, कमसे कम रोज की 15 की बोतल 20 में ली यह शिकायत तो बन्द हो जाएगी।

रेल प्रशासन ने कई रियायतें बन्द कर दी। ठीक है। मगर कुछ रियायतोंके बन्द करने के बजाय सभी रियायतोंको गैस सिलेंडर वाली सब्सिडियोंके ( फिलहाल तो आती नही, मगर जब आ रही थी वैसे ) जैसा अकाउंट से जोड़ दीजिये न? पूरा मूल्य देकर टिकट खरीदिये, 8 दिनोंके भीतर आपकी रियायत सब्सिडी के रूप में आपके अकाउंट में जमा हो जाएगी। इससे एक होगा, झूटी रियायतें लेकर वातानुकूलित वर्ग में घूमनेवाले यूँही गायब हो जाएंगे।

दूसरा इन दिनों रेल गाड़ियोंमे वातानुकूलित कोच में पानी बोतल का गोरखधंधा बड़े धड़ल्ले से चलता है। वातानुकूलित कोच के अटेंडेंट वाले कम्पार्टमेंट इन्ही बोतलोंसे भरे रहते है। अधिकृत सेवकोंके साथ उनके हेल्पर (?) यह बोतले बेचकर एक एक फेरे में हजारों रुपये छापते है। यह सारा जुगाड़ बड़े वरदहस्त रहे बगैर होना मुमकिन ही नही। रेलगाड़ियोंमे ऐसे धंदे तो प्लेटफॉर्म्स पर भी कुछ अलग अवस्था नही है। रेल अफसरों को यकीन नही आएगा, उनके नाक के नीचे 10 पंजीकृत वेण्डरों की जगह 100 वेण्डर अपना पेट भरते है।

शीर्षक वाला बयान हमारे गंगारामजी का है, जो वर्ष में दो बार पक्का मुम्बई से गोरखपुर जाना आना करते है। उनका यह कहना बिल्कुल वाजिब लगता है, रेल प्रशासन सारी बातें जानता है, समझता है तब ही तो शर्म के मारे आधे किराये लेता है अन्यथा तेजस, गतिमान, हमसफ़र, वन्देभारत गाड़ियोंमे क्यों नही कहता की आपका 43% किराया अन्य लोग भर रहे है? क्योंकि यह गाड़ियोंकी व्यवस्था चाकचौबंद है। वहाँ साधारण मेल/एक्सप्रेस गाड़ियोंके जैसी पोलम पट्टी नही चलाई जाती।

शायद इसलिए रेल प्रशासन अपनी यात्री गाड़ियोंमे बदलाव करना चाहता है। वन्देभारत समान गाड़ियाँ ज्यादा से ज्यादा लाने का प्रयत्न कर रहा है। क्योंकि मेल/एक्सप्रेस गाड़ियोंमे अब व्यवस्थाओंको मुस्तैद करना याने पानी सिर के ऊपर हो गया है। एक तरफ मा. रेलमंत्री ने कह दिया है, जो गाड़ी कमाई ला कर देगी वही चलाई जाएगी। तो इसका इलाज सिर्फ यही है, की अपनी जाँच और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत कर लीजिए, आपकी आय कहाँसे फिसल रही है, यह बहुत जल्द सामने आ जायेगा।

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