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ZBTT शून्याधारित समयसारणी का जिन्न! न उगलते बने, न निगलते। मात्र पसीज रहे छोटे स्टेशनोंके यात्री

रेल समयसारणी आखरी बार वर्ष 2019 में छपी थी। आमतौर पर रेल और यात्री का सम्बन्ध इसी समयसारणी से जुड़ता है। यात्री अपनी रेल यात्रा का नियोजन समयसारणी देखकर करता है और फिर उसके आगे टिकट खरीदने या आरक्षण करने की तजवीज़ शुरु होती है।

वर्ष 2019 मे रेल प्रशासन ने अपने वर्षोँपुरानी समयसारणी का रिस्ट्रक्चराइजेशन अर्थात पुनर्गठन करने हेतु देश के सर्वोत्तम अभियांत्रिकी शैक्षणिक संस्थान आईआईटी मुम्बई की मदत ली और इस ZBTT शून्याधारित समयसारणी का अविष्कार हुवा। अब आईआईटी के महानुभावों ने रेल प्रशासन को ZBTT के जो प्रस्ताव दिए है, उसको धरातल पर लाने में बड़ी कसमसाहट हो रही है। एक तरफ उसके फायदे नजर आ रहे है तो दूसरी तरफ बड़ी संख्यामे पीड़ित यात्री। यात्रिओंकी पीड़ा तो समझ आ रही है की अचानक उनके स्टेशनोंपर बरसों रुकनेवाली गाड़ियाँ अब नही रुक रही है। वर्षोंसे चल रही सवारी/एक्सप्रेस गाड़ियाँ रेल विभाग ने चलाना ही बन्द कर दिया है। यात्री बेचारा पूछे तो पूछे किसे, और उससे बड़ी समस्या यह है की उसके प्रश्न का उत्तर दे कौन? आम यात्री की पहुंच स्थानिक रेल कर्मी तक ही होती है, उन को कुछ भी पता नही। स्थानिक अधिकारियों, उच्च पदस्थ मण्डल और क्षेत्रीय अधिकारी तक ऐसे प्रश्नोंपर निरुत्तर है। क्योंकी इस ZBTT के कार्यान्वयन में सबसे बड़ी बाधा रेलवे का पुराना बुनियादी ढांचा और पुराना चल स्टॉक है और जब तक इस क्षेत्र में प्रगति नही होगी तब तक ZBTT का पूर्ण कार्यान्वित होना लगभग नामुमकिन है।

इस ZBTT के प्रस्तावोंने सैंकड़ों गाड़ियाँ रद्द या सवारी से बदलकर एक्सप्रेस में उन्नत करा दी है। सवारी गाड़ियाँ एक्सप्रेस बन जाने से उनके हजारों स्टोपेजेस रद्द कर दिए। विशेष बात तो यह है, की ZBTT जैसे ‘समग्र भारतीय रेल के समयसारणी का पुनर्गठन’ इतने बड़े व्यापक और लाखों, करोड़ों यात्रिओंके ऊपर असर करनेवाले कार्यक्रम के कार्यान्वयन पर कोई परिपत्रक प्रसार माध्यम को नही दिया गया है। ना ही इसके नफा, नुकसान की कोई जाहिर तौर पर चर्चा उपलब्ध है। कुछ परिपत्रक सोशल मीडिया में लीक हुए और रेल संगठन, रेल प्रेमियोंकी उसपर चर्चा, वादविवाद। ZBTT के नाम पर आम यात्रिओंके हाथ मे केवल यही मसौदा उपलब्ध है। ऐसी अवस्था मे परेशान यात्री के समझ मे ZBTT के फायदे गले नही उतरते और वह झट अपनी पुरानी व्यवस्था की मांग करता है। ZBTT में पुरानी ICF कोच वाली सवारी और मेल/एक्सप्रेस गाड़ियोंके बदले तीव्रतम गति वाली मेमू गाड़ियाँ चलाने का प्रस्ताव है, मगर इतनी मेमू गाड़ियोंके रैक रेल प्रशासन के पास उपलब्ध नही है। यह सर्वप्रथम समस्या है। पुराने कोच में गाड़ियाँ चलवा दें तो जब उन डिब्बों पर ‘चलने योग्य नही’ ऐसा ठप्पा लग चुका है तो उसे चलाने की जोख़िम कैसे ली जा सकती है? भला उसको खींचने के लिए लोको, इंजिन भी अब कम होते जा रहे क्योंकी रेल विभाग उच्चतम क्षमता के लोको के निर्माण में व्यस्त हो गयी है।

सोशल मीडिया में ऐसे लगभग सभी क्षेत्रीय रेल के ZBTT प्रस्ताव अस्पष्ट और असम्बद्ध तरीकेसे उपलब्ध है।

देश मे पहले लोको निर्माण के केवल 1, 2 कारखाने थे। वहीं उसका रखरखाव भी करते थे। डिब्बे बनाने के केवल एक ICF इंटीग्रल कोच फ़ेक्टरी पेरंबूर चेन्नई में थी। बाद में कपूरथला में शुरू हुई। अब रायबरेली, लातूर में भी डिब्बा कारखाने ज़ोरोंपर काम पर लगे हुए है। गाड़ियोंको लोको मुक्त करने और तेज गति वाली गाड़ियोंकी मांग हेतु ट्रेन-18 का अविष्कार हुवा जिसे आज हम वन्देभारत के नाम से जानते है। इस वन्देभारत का ही मिनी रूप मेमू गाड़ियाँ है। फर्क है तो कुछ साजसज्ज़ा और वातानुकूलित न होने का है। खैर अब वातानुकूलित मेमू भी देश मे चलने लग गयी है। कुल मिलाकर सारे प्रश्न एक दूसरे की गुत्थियों में उलझे पड़े है जिसके उत्तर को खासा वक्त लगनेवाला है।

इन सारी प्रशासनिक परेशानियों और समस्याओं से आम यात्री को कुछ लेनादेना नही है। उसे केवल यह समझ आता है की उसकी चलती गाड़ी रेलवे ने बन्द करा दी या स्टोपेजेस उड़ा दिया। जब उसे अपनी समस्याओं पर उत्तर नही मिलता तो वह अपना रुख जनप्रतिनिधि की ओर करता है और यह जनप्रतिनिधि रेल प्रशासन को बाध्य कर देते है की वह पुराने स्टोपेजेस प्रायोगिक तत्व पर ही सही मगर तुरन्त शुरू करा दे। हक़ीक़त बताएं तो आश्चर्य नही होना चाहिए की ZBTT के प्रस्तावित कई पड़ाव पुनर्स्थापित किये जा चुके है और कई स्टोपेजेस और भी शुरु होने में है।

सारे शून्याधारित समयसारणी के प्रस्तावों को लागू करने में इतनी दिक्कते है तो उसे अस्थायी रूप में स्थगित रखते हुए कुछ बन्द गाड़ियोंको चलाना और मांग किये जानेवाले स्टोपेजेस को पुनर्बहाल करना यह भी रेल प्रशासन के लिए बहोत टेढी खीर है। इतने बड़े रेल परिचालन में, आवश्यक संसाधनों की अनुपस्थिति में ZBTT को कार्यान्वित करना जितना मुश्किल है उससे कई ज्यादा उसे अब उसे “रोल बैक” करना (जो कतई नही होगा) या स्थगित भी रखना बेहद असम्भव है। इसीलिए हम इस स्थिति को रेल प्रशासन के गले में अटकी हड्डी का उदाहरण देते है।

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