आरक्षण याने क्या? हाँ साहब, हम रेलवे में, आप जो अपनी सिटों, बर्थस का आरक्षण करवाते है उसीकी बात कर रहे है।
रेलवे में एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमे आप करीबन दुगना यात्रा का किराया देकर अपनी शयिका याने बर्थ या आसन याने सीट आरक्षित कर सकते हो और ऐसा माना जाता है की, अपने पूरे रेल यात्रा में उस क्रमांक की आरक्षित सीट बर्थ पर केवल और केवल आपका यात्रा करने का अधिकार होगा।
यही नही जिस डिब्बे में आपका आरक्षण है, उसका टॉयलेट, बेसिन का उपयोग आप सहजता से करोगे, अपनी आरक्षित जगह से पैसेजसे गुजरते हुए दरवाजे तक, बेसिन, शौचालय तक जाना यह भी आपका अधिकार रहना चाहिए। क्योंकी इन सब सुविधाओं के लिए आप अतिरिक्त मूल्य जो, रेलवे को दे रहे हो।
यह सब स्लिपर शयनयान की बाते है, वातानुकूलित डब्बोंमे आरक्षण के किराए का मोल ज्यादा है तो सुविधाएं भी थोड़ी ज्यादा बढ़ जाती है। वहाँ आपको बिस्तर, नैपकिन, टॉयलेट में लिक्विड सोप और यात्रा के दौरान थोड़ी ज्यादा प्राइवसी, वातानुकूलित कक्ष के साथ मिलती है।
आरक्षण में भी प्रकार है। सामान्य आरक्षण, तत्काल आरक्षण और प्रिमियम तत्काल आरक्षण। हालाँकि इसमें फर्क केवल जगह के किराए का होता है सुविधाओं का नहीं। सामान्य आरक्षण से लेकर प्रिमियम तक किराया दुगुना, चौगुना बढ़ते चला जाता है।
अब आप सोचते होंगे, यह तो आम बात है। आरक्षण किया तो यह सब सुविधाएं तो मिलना आम बात है। लेकिन शायद आप गलत है या फिर आजकल की, रेलवे की आरक्षित टिकट वाली यात्रा आपको गलत सिद्ध कर देगी।
आजकल आरक्षित डिब्बे और सामान्य अनारक्षित डिब्बे एकजैसे ही माहौल वाले हो गए है। हर कोई यात्री बिना किसी संकोच के सीधे आरक्षित डिब्बे का रुख़ करता है चाहे उसका आरक्षण हो या न हो, प्रतीक्षासूची धारी यात्री तो बड़े हक़ से आरक्षित डिब्बेमे यात्रा करते हुए मिलता है। रेल्वे के कर्मचारी, रोजाना आनाजाना करने वाले पास धारी यात्री, द्वितीय श्रेणी छोटी दूरी के यात्री सभी अपनी सुविधानुसार, अपने बल और दल के साथ आरक्षित डिब्बेमे आपको यात्रा करते मिलेंगे।
इतना कम है क्या तो और लीजिए। अनाधिकृत बिक्रेता चाहे कितनी ही भीड़ हो अपनी रोजगारी पूरी करते ही है। इस तरह के सफ़र में आपको दुवाओंकी सख़्त जरूरत रहती है, वह भी समय समय पर एकदम उचित दाम पर याने रुपए, दो रुपए में उपलब्ध हो जाती है। इतनी भीड़ में हर तरह की सफाई याने आपके डिब्बे की ही नही तो आपके जूतों, चप्पलोंकी, आपके बटुए, अटैची, बैग, गहने, मोबाइल इन सब साधनोंकी भी सफाई का ख्याल रखा जा सकता है।
जब इतनी मुश्क़िलोंका तकलीफ़ोका पहाड़ इन आरक्षित डिब्बोंमे है, आरक्षण पाने के लिए यात्री, दुगुना चौगुना ज्यादा पैसा देते है, कन्फर्मेशन के लिए एजंटोंको भरपूर कमीशन भी देते है और अपनी यात्रा भी करते है। यकीन मानिए, कितने मजबूर है यात्री।
किसी को अपने काम पर पोहोचना है तो किसी को अपने रिश्तेदारों के यहाँ किसी प्रसंग पर हाजिर होना है। कोई अपनी छुट्टियोंपर घर जा रहा है तो कोई छुट्टी खत्म कर अपने फ़र्ज पर वापसी कर रहा है। अपने देश मे आजभी रेलवे से सस्ता और उपयोगी संसाधन यात्रा के लिए उपलब्ध नही है।
इस मजबूरी के धागे से बंधे लोग रेलवे में सफर करते है। ज्यादा, और थोड़ा ज्यादा पैसा देकर, प्रिमियम चुकाकर आरक्षण का वर्च्युअल कन्फर्मेशन याने आभासी पुष्टीकरण अपनाते हैं।
जिस दिन यातायात के संसाधन अद्ययावत हो जाएंगे, आज जो भरपूर मूल्य देकर आरक्षण की दौड़ लगाने वाले यात्री, रेलवे को सबसे पहले भुला देंगे। बुलेट ट्रेन का काम शुरू हो चुका है। हवाई ट्रैफिक दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है, रोड भी एक्सप्रेस वे में तब्दील होते जा रहे है। एयर टैक्सी की बातें चल पड़ी है। अब भी रेल प्रशासन नहीं जागी तो कब जागेगी? कब यात्रिओंको अपने मौलिक आधिकारिक सुविधाओं सुकून मिल पाएगा?
