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रेलवे सफ़र नामा

जी, जी बिल्कुल सही लिखा है, बस हिंदी का सफर नही अंग्रेजी वाला सफ़र पढ़ लीजिए।

महीनेभर पहले कन्फर्म आरक्षण कर के खुश तो बहोत हुए थे हम। पर हाय री किस्मत! आरक्षित डिब्बे में, हाँ हमारे वाले ही, जिसमे हमारे कन्फर्म आरक्षण थे, भाईसाब पैर रखने भर की जगह नही थी।
सुबह 7 बजे अपने बैग, टिफिन सारे झोले झंडे के साथ प्लेटफार्म पर धमके, बस सोच ही रहे थे की अपनी आन बान और शान के साथ अपनी जगह पर बैठेंगे और बढ़िया बातें करते, खाते पीते अपनी मंजिल पहुंचेंगे। देख कर हैरान की गाड़ी में पहलेसेही लोगोंसे अटी पड़ी है।

2 लोअर, 1 मिडल, 1 अपर बर्थ इस तरह का हमारी नियोजित यात्रा की ठौर थी। बड़ी मुश्किल से, कुछ मानवता की दुहाई देते तो किसी की दुवाओं से अपनी झोली भरते आखिरकार हम चारोंको एक लोअर बर्थ नसीब हुआ।

जो हसरतें हँसते, खाते पीते जानेकी थी वह तो अपनी जगह तक पोहोंचते पोहोंचते ही काफूर हो चुकी थी। आप सोचिए, लोग किस तरह रेल में सफर करते है बस अंग्रेजी वाला सफर ही रह गया है आजकल भीड़ भरे रेल की यात्रा में।

अभी खत्म नहीं हुआ है, कल फिर मिलेंगे।

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