भारतीय रेल की नई पॉलिसी यह कहती है की आप बिल जरूर लीजिए ताकी आपको वेंडर ज्यादा चार्जेस न लगा सके।
अब हकीकत देखे, गाड़ी में पानी खरीदने के वक्त ₹15 की बोतल, जो आम तौर पर रेलवे के निर्धारित ब्रैंड की नही होती और ₹20 से कम में नही मिलती। काफी हुज्जत करने के बाद यदि मिल भी जाए तो न सिर्फ वेंडर बल्कि आजूबाजू के यात्री भी आपको हीन दिन नजरोंसे देखते है, जैसे कौन झगड़ालू किस्म का व्यक्ति ट्रेन में आकर के बैठ गया।
खाना या नाश्ते की हकीकत, यहाँ वही बात होती है। वेंडर बिना पैसे लिए आपको सामान देता नही और बिल मांगोगे तो बोलेगा साथ मे थोड़े ही लेकर चलते है, बिल लाकर दे देंगे तब लेना याने फिर वही शर्मिंदगी।
हकीकत नम्बर 3, खाना आर्डर करेंगे तभी रेट बोल दिया जाता है, शाकाहारी खाना ₹ 120 पर प्लेट। जब आप पूछोगे, रेलवे का रेट तो ₹45 है। तो वेंडर फिर से आपको ‘ किस दुनिया मे रहते हो’ वाली दृष्टी से देखेगा और कहेगा आपको बिल मिल जाएगा। जब खाना आएगा तो बाकायदा ₹120 का बिल मिलेगा, जो की थाली की जगह अ ला कार्ट वाला रहेगा, जिसमे रोटी की जगह पराठे, सब्जी पनीर वाली, दाल की जगह दाल तड़का, दही की जगह स्विट इस तरह बिल का पुरा हुलिया बदला रहेगा। हो गयी न आप की बहस खत्म?
हाँ, आप थाली मंगवाने पर जोर दोगे तो वेंडर आपको बता देगा थाली उपलब्ध नही है। खाना कैसेरोल में ही आएगा और इसी तरीकेसे आएगा।
एक पेन्ट्री कार के मैनेजर से बातचीत पर पता चला, लाखों रुपए देकर जो पेन्ट्री चलाने के लिए लेता है, क्या उसे यह पता नही होता की उसकी गाड़ी में कितने अवैध विक्रेता पानी बोतल, नाश्ता, खाना बेच रहे होते? उन अवैध विक्रेताओं पर कोई बंधन नही, न मेडिकल जांच, न उनके खाने के सामानोंकी योग्यता पर कोई मापदंड और न ही बिल, मेन्यू कार्ड, रेट कार्ड का झंझट। पेन्ट्री से दुगुना व्यवसाय तो यह अवैध विक्रेता कर लेते है।
इसके बाद जगह जगह पर सरकारी मेहमानों की खातिरदारी तो चलते ही रहती है। अलग ब्रैंड की पानी की बोतलें भी किसी की मर्जी से मजबूरन चलानी पड़ती है। दो अंडों के आमलेट की जगह 10 अंडों के घोल में 15 आमलेट बनाए जाते है। बहोत कुछ है बाबू बताने को, क्या कर लीजिएगा जान कर?
तो साहब, बिल तो मिल जाएगा पर जो सामान आपको चाहिए, जो मेन्यू कार्ड पर है वह मिलेगा क्या?
