भारतीय रेलवे अनारक्षित कोचों के लिए बायोमेट्रिक प्रणाली से प्रवेश दिया जायेगा। पीयूष गोयल के नेतृत्व वाले भारतीय रेलवे ने पहली बार सीटों की गारंटी के लिए बायोमेट्रिक पहचान की एक प्रणाली शुरू की है।
यह समाचार आज के वृत्तपत्र में पढ़ने में आया। पश्चिम रेलवे के मुम्बई सेन्ट्रल एवं बांद्रा टर्मिनस स्टेशनपर कोई 9-10 गाड़ियोंमे यह व्यवस्था लागू करने की बात की गई है।
ठीक है, जहाँसे गाड़ी शुरू होती है उन स्टेशनोपर तो रेलवे यात्रिओंको सिटोपर बैठा देगी लेकिन आगे के स्टेशनोंका क्या हाल रहेगा? आज भी 90 और 100 सीट के सेकण्ड क्लास जनरल डब्बोंमे 250, 300 लोग यात्रा करते है। डिब्बे के टॉयलेट तक मे यात्री ठूंसे रहते है। सीट्स तो छोड़िए, सीट्स के नीचे, सामान रखने के रैक, दो सीट के बीच के पैसेज, दरवाजे के कॉरिडोर इंच इंच जगह पर यात्री भरे रहते है। क्या ऐसी स्थिति में मंत्रीजी की यह योजना काम कर पाएगी?
आप सेकण्ड क्लास की बात कर रहे है, कई गाड़ियोंके स्लिपर डिब्बों की हालत भी इसी तरह की होती है जबकी वे डिब्बे तो आरक्षित होते है। आम यात्री जानना चाहेंगे की मंत्रीजी के इस पर क्या विचार और सुझाव है।
दिन ब दिन रेलवे की एक वातानुकूलित सेवा छोड़े तो सभी डिब्बों की हालत लचर और दर्दनाक है। मुम्बई से उत्तर की ओर जानेवाली फिर वह गाड़ी वाराणसी, गोरखपुर, लखनऊ कहीं की भी हो करीबन हर गाड़ी अपनी यात्री क्षमतासे दुगनी भरी होती है और यह पूरे वर्ष में सभी गाड़ियोंकी हालत ऐसी ही होती है।
आप सोचते होंगे, समस्या है तो कोई समाधान भी होगा। है न। सभी स्लिपर डिब्बों में अनिवार्य रूपसे TTE और RPF रहे। आरक्षित टिकटोंका वेटिंग लिस्ट केवल e-टिकट स्वरूप में ही ढिया जाए जो कन्फर्म न होने के स्थिति में अपने आप कैंसल हो जाए और वेटिंग लिस्ट का यात्री स्लिपर के आरक्षित डिब्बेमे जबरदस्ती यात्रा न कर पाए।
अंत्योदय गाड़ियाँ की संहिता काफी अच्छी है लेकिन उसमें सीट्स का आरक्षण शुरू किया जाए तो यात्री उसमे अपनी यात्रा सुनिश्चित कर पाएगा। फिलहाल की स्थिति में यात्रिओंको पता ही नही चलता है की अंत्योदय गाड़ी में उसे जगह मिलेगी या नही।
और भी उपाय निकलेंगे, लेकिन यह बायोमेट्रिक एंट्री वाला समाधान अधुरासा ही लगता है।
