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अहं, गलत सोच रहे हो। यह ट्राम नही रेल गाड़ियाँ ही है।

शहरोंमें, सडकोंपर पटरी बिछाके शहर यातायात के लिए ट्राम गाड़ियाँ चलती थी, आज भी कोलकाता में चल रही है। लेकिन हमारा व्हिडियो ट्राम गाड़ियोंका नही रेल गाड़ियोंका है।

यह कुल तीन व्हिडियो मिल कर एक फ़िल्म बनी है जिसमे 2 नम्बर की व्हिडियो भारतीय रेलवे में दिल्ली एरिया की है। एक बात जाहिर है, किसी एक दिन में तो यह बस्ती यहाँपर नही बैठी है, और न ही रेल इनकी बस्ती में घुसी है। कितनी कमाल की बात है न, की नगरनिगम, नगरसेवक, क्षेत्र के विधायक, समाजसेवी इन की सब नजरोंसे बच कर इन लोगोंने यह बस्ती पटरियोंके बाजू में खड़ी की है।

यह सब क्या, कब, कैसे, क्यों ऐसे “क”कार वाले प्रश्नार्थक सवाल हम आप पर छोड़ते है, बस हम आपके लिए केवल दृश्यांकन लाए है।

साभार: द मालवा रेल फैन ग्रुप IRUMNDN

शहरोंकी बस्ती में रेल घुस गई या रेल की पटरियोंपर लोगोंने अपने घर बसा लिए?
यह कोई ढाई दिन के झोपड़े की कहानी नही है, धीरे धीरे बरसोंसे बने, नगरनिगमोंकी नाक के नीचे, तिनके तिनके जोड़कर बनाए गए घरौंदे है।

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