2 जून 2024, रविवार, जेष्ठ, कृष्ण पक्ष, एकादशी, विक्रम संवत 2081
आजकल भारतीय रेल की सबसे बड़ी और विकराल समस्या है, अवैध यात्री। आप और हम जानते है, भारतीय रेल में अनारक्षित एवं आरक्षित कोच, इस तरह यात्री टिकटोंका वर्गीकरण किया हुवा है। अनारक्षित टिकट में केवल द्वितीय श्रेणी का टिकट उपलब्ध है, जिसे आम तौर पर ‘जनरल’ टिकट कहा जाता है। वहीं आरक्षित टिकट में शयनयान स्लिपर, द्वितीय श्रेणी सिटिंग यह ग़ैरवातानुकूलित और थ्री टियर, इकोनोमी, चेयर कार, टु टियर, प्रथम श्रेणी इत्यादि वातानुकूलित कोच उपलब्ध है। आरक्षित आसन व्यवस्थामे आगे गाड़ियोंके भी कई प्रकार है। मगर मेल/एक्सप्रेस एवं सुपरफास्ट यह दो प्रकार ऐसे है, जिनमे अनारक्षित एवं आरक्षित यह दोनोंही प्रकार के वर्ग, श्रेणियोंके टिकट उपलब्ध कराए गए है।
देश मे भारतीय रेल यह आम जनजीवन का सर्वाधिक सुलभ एवं सरल यातायात साधन है। उसमें उपनगरीय रेल क्षेत्र को अलाहिदा रखा जाए तो अमूमन 90% गाड़ियाँ मेल/एक्सप्रेस एवं सुपरफास्ट श्रेणी की है जो हम भारतीय रेल यात्रिओंकी जीवन-वाहिनी है। एक आम भारतीय वर्ष में एखाद या दो बार लम्बी रेल यात्रा करता होगा पर 200 से 500 किलोमीटर की यात्रा उसे महीने में भी कई बार करने का योग आ जाता है। और इस तरह की रेल यात्रा के लिए उसका साधन है, यह मेल/एक्सप्रेस, सुपरफास्ट गाड़ियाँ।
किसी आम रेल यात्री को अपनी इस कामकाजी या जरूरत की रेल यात्रा के लिए लगभग शॉर्ट नोटिस पर याने अचानक ही निकलना पड़ता है, जिसके लिए उसे रेलवे में आरक्षित टिकट कदापि ही मिल पाता है, चाहे रेल विभाग की तत्काल या प्रीमियम तत्काल टिकटोंकी व्यवस्थाए ही क्यों न हो। उसे केवल ‘जनरल’ याने अनारक्षित टिकट का ही सहारा होता है। अब आगे रेल यात्रा की अवस्था यह है, अनारक्षित टिकट अमर्याद संख्या में बेचे जाते है और उस मुकाबले अनारक्षित यात्री कोच इन मेल/एक्सप्रेस या सुपरफास्ट गाड़ियोंकी बदली हुई कोच संरचना में, पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नही कराए जाते है। आजकल इनकी संख्या घटते घटते, पूरे गाड़ी संरचना में महज 2 या 3 कोच इतनी रह गई है।
ऐसी हालत में अनारक्षित कोचों में ठूँस ठूँस कर भरी भीड़ से घबराया, एक आम जरूरतमंद यात्री अपनी शर्म और गैरत से मरते, डूबते और डरते हुए आरक्षित शयनयान के कोच में, दरवाजोंके पास, पायदानों पर अपनी यात्रा से पार पाने का प्रयत्न करता है और यही है आजकल का भारतीय रेल का अवैध यात्री!
बिना टिकट या बिना वैध टिकट के यात्रा करने का आदी नही होने के कारण टिकट जाँच दल के पकड़ में वह बड़ी सहजता से आ जाता है। अपनी मजबूरियों का लाख रोना रोकर, दण्ड की रकम चुकाकर यह रेल यात्री अपनी रेल यात्रा निपटता है। यह वाकया कभी कभी इस तरह भी होता है, की उसका किसी टिकट जाँच दल से सामना नही होता और वह अपनी मजबूरी में की गई अवैध (?) रेल यात्रा बिना किसी दण्ड को चुकाए पूर्ण कर लेता है। जब ऐसा कई बार होता है और उसे इस बात की आदत हो जाती है, कोई टिकट जाँच दल हर रोज, हर बार नही आता और वह धीरे धीरे आदतन अवैध यात्री बनते चला जाता है।
हाल ही में हमारे प्रधानमंत्री जी ने कहा, रेल विभाग अवैध, आदतन बिना टिकट यात्रिओंकी तस्वीर रेलवे स्टेशनोंपर लगवाए। हमने एक आम भारतीय रेल यात्री की अवैध यात्रा करने की बाध्यता को विस्तृत तरीक़े से रखा। अब आप बताइए, क्या इतनी सहज है, अवैध यात्रिओंकी रोकथाम?
