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यात्री किरायोंके बढ़ते घाटे से रेल विभाग परेशान ; निजात पाने के लिए अपनी कम अन्तर की गाड़ियाँ राज्य सरकार को सौप सकता है।

13 नवम्बर 2024, बुधवार, कार्तिक, शुक्ल पक्ष, त्रयोदशी, विक्रम संवत 2081

प्राप्त जानकारियोंके अनुसार रेल विभाग अब यात्री किरायोंके सुधार पर लगनेवाले राजकीय अडंगोंपर गम्भीरता से विचार कर रहा है। फ़िलहाल रेल विभाग अपने प्रत्येक टिकट पर ‘छप्पन प्रतिशत रियायती किरायोंका’ दुखड़ा छापता है।

संक्रमण काल के बाद रेल प्रशासन ने विद्यार्थियों, मरीजों और दिव्यांग व्यक्तियों को दी जानेवाली किरायों की छूट को छोड़ बाकी सभी तरह की किराया रियायत कड़ाई के साथ बन्द कर दी है। रेल की सबसे सस्ती, सवारी गाड़ियोंके किरायोंमे भी बड़ा उलट फेर किया गया था। सब सवारी गाड़ियोंके गाड़ी क्रमांक में ‘0’ टैग लगाकर उन्हें विशेष गाड़ियोंकी श्रेणी में रखकर मेल/एक्सप्रेस के किराए में चलाने का एक असफल प्रयोग भी किया गया मगर राजनीतिक दबाव के चलते उन में से कई गाड़ियाँ फिर सवारी रूप और किरायोंमे लौटाई गई। कुछ नियमित मेल/एक्सप्रेस श्रेणियों में रखने में रेल विभाग सफल रहा।

अब एक और प्रयोग की ओर रेल विभाग बढ़ रहा है। रेल विभाग की तमाम कम अन्तर में चलनेवाली गाड़ियाँ, उपनगरीय रेल, करीबन 200 किलोमीटर के भीतर चलनेवाली डेमू/मेमू गाड़ियाँ जो फिलहाल सवारी श्रेणियों में चल रही है, उन्हें राज्य सरकारों के हवाले करने पर विचार-विमर्श किया जा रहा है। यही गाड़ियाँ रेल विभाग को खल रही है और हमेशा रेल बजट में निगेटिव उत्पन्न के पाले में रहती है। एक सोच के अनुसार उपरोक्त गाड़ियोंके परिचालन को अपने पास रख सारे वाणिज्यिक कार्य राज्य सरकार के हवाले किए जाएंगे। कुछ राज्य में राज्य सरकारें अपना परिवहन चलाती है अतः इस तरह की कार्यवाही से वह अवगत है। इन गाड़ियोंके किराए, स्टोपेजेस और फेरे का निर्धारण राज्य सरकार कर सकेगी। उससे मिलने वाली वाणिज्यिक और ग़ैरवाणिज्यिक आय भी वहीं अर्जित करेंगी। रेल विभाग उनसे ऑपरेटिंग शुल्क लिया करेंगी।

इस तरह की कार्यवाही में यात्रिओंके पाले में क्या पड़नेवाला है, यह समझने का प्रयत्न करते है। सबसे पहले किराए स्थानीय परिवहनों के स्तर पर अर्थात दुगुने, तिगुने बढ़ सकते है। रेल परिचालन में पहले ही इन गाड़ियोंको (उपनगरीय छोड़कर) दुय्यम प्राथमिकता थी, इस निर्णय के बाद और भी स्तर गिर सकता है। स्थानीय राजनयिकों की दखलंदाजी बढ़ सकती है। यह यात्रिओंके होनेवाले नुकसान की बातें है मगर कुछ बातें यात्री हित की भी हो सकती है। गाड़ियोंके फेरे, समयसारणी और स्टोपेजेस के निर्णय, स्थानीय जरूरतोंके अनुसार तीव्र गति से लिए जाएंगे। हालाँकि अन्तिम निर्णय रेल विभाग ही लेगा चूँकि रेल संसाधन वहीं के वहीं है, राज्य सरकारों की गाड़ियाँ कोई अलग पटरी या अलग स्टेशन, प्लेटफॉर्म पर थोड़े ही जानी है?

एक विचार यह भी है, जिस तरह रेल मंत्रालय ने भारतीय रेल के संसाधन के तत्त्वों पर गठित नौ क्षेत्रीय कार्यालयोंको राज्यवार तत्व पर पुनर्रचना कर सोलह किया उससे आए दिन किसी न किसी क्षेत्र से अपना अलग मण्डल या अलग क्षेत्रीय कार्यालय बनाने की मांग उठने लगी है। अखण्ड भारतीय रेल इस निर्णय से राज्य रेल की श्रेणी की ओर जाने लगी है। यदि स्थानिय राज्य सरकारों को रेल विभाग अपने वाणिज्यिक काम बाँट देती है तो इसका और कितना बुरा असर रेल के केन्द्रीय परिचालन एवं प्रबंधन पर पड़ेगा यह सोचने की बात रहेगी।

कुल मिलाकर रेल विभाग किराया बढ़ाने का ठीकरा राज्य सरकारों पर मढ़ने की कवायद करने की सोच रहा है। यात्री किरायोंके जरिए ज्यादा उत्पन्न का घी सीधी उंगली से निकालना सम्भव नही हो पा रहा इसलिए राज्य प्रशासन को बीचमे लाकर उंगली टेढ़ी की जाने की सोच है।

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