15 फरवरी 2025, शनिवार, फाल्गुन, कृष्ण पक्ष, तृतीया, विक्रम संवत 2081
हाल ही में आम बजट के साथ रेल बजट का आवंटन भी घोषित हुवा। दो लाख पचपन हजार करोड़ रुपए का आवंटन, रोजाना तकरीबन 11 लाख से ज्यादा की यात्री संख्या मगर अलग बजट घोषणा बन्द कर केवल निधि की ही घोषणा की जाती है। पहले रेल बजट जब अलग से सादर किया जाता था, कई घोषणाए आम जनता की सुनने मिलती थी। नई गाड़ियाँ, नए रेल मार्ग, नए रेल सुधार इत्यादि। अब नई गाड़ियाँ और सारे सुधार केवल परिपत्रकों से घोषित किए जाते है। रेल बजट जानने, समझने का सारा खुमार काफ़ूर हो गया।
रेल बजट निधि आवंटित होने के बाद सदन में एक विपक्षी सांसद ने भारतीय रेल की कुछ सांख्यिकी और हक़ीकत पेश की। आइए, समझते है।
* रेल बजट में वर्ष 2009 से 2014 के बाद करीबन 5 गुना इज़ाफा हुवा।
* रेल में यात्रिओंकी हालात गम्भीर, देश की प्रमुख यातायात का साधन, अब केवल मजबूरी की यातायात का साधन बन कर रह गई है भारतीय रेल।
* निरन्तर घटती रफ़्तार और बढ़ता किराया। चीन, जापान की सबसे धीमी ट्रेन भी भारत की सबसे तेज ट्रेन से अधिक तेज दौड़ती है।
* देश की नैशनल कैरियर, भारतीय रेल धीमी रहेंगी तो देश के विकास की गति भी धीमी ही रहेगी।
* वर्ष 2013/14 में औसत किराया 32पैसा/km था जो वर्ष 2021/22 में 66पैसा/km हो गया।
* एक जमाने मे लग्ज़री समझे जाने वाले वातानुकूलित थ्री, टू टियर भी आजकल सामान्य श्रेणी की तरह हो गए है। कोई भी यात्री एडजस्टमेंट का तमगा गले मे लटकाए आरक्षित यात्री से सटकर बैठ जाता है, कहता है, थोड़ा एडजस्ट कर लीजिए, एक स्टेशन ही तो जाना है।
* बेडरोल में हाइजीन, स्वच्छता मिलना मुश्किल, महीने में केवल एक बार धुलते है कम्बल
* प्लेटफार्म की चाय, नाश्ता, खाना अत्यंत अभिरुचि हीन।
* भीड़ के समय, विशेष गाड़ियाँ चलती तो है, मगर केवल उसे ही नसीब होती है, जो दिनरात टिकटोंकी बुकिंग पर नजरें गड़ाए रख सकता है। अर्थात भरपूर मिसमैनेजमेंट है, इन गाड़ियोंके परिचालन में।
* रेल टिकट बुकिंग वेबसाइट IRCTC पर रजिस्ट्रेशन करने से लेकर टिकट बुक करने तक सारी प्रोसीजर एक गहन तपस्या है। एखाद बार किसी तपस्या का फल मोक्ष मिल सकता है, पर IRCTC का तत्काल टिकट मिलना मुश्किल।
* जब अधिकृत ब्रेंड का पेयजल नामित किया गया हो तो नकली या हीन दर्जे के पेयजल, फुड पैकेट्स किस तरह बेचे जा सकते है?
* वरिष्ठ नागरिक किराया रियायत किसी न किसी रियायती दर पर दोबारा शुरू की जानी चाहिये।
* भेड़ बकरी की तरह, आलू की बोरियोंसे लदे रेल यात्री कोच। साधारण यात्री का कोई मोल नही।
* उचित मेंटेनेंस के अभाव का कारण दिया गया 75% दुर्घटनाओं में। जबकि मेंटेनेंस के नाम पर अचानक ही अनेकों नियमित गाड़ियाँ रद्द कर दी जाती है।
बड़ा लम्बा बयान था और हर तरह से हक़ीकत बयान की जा रही थी।
रेल विभाग में समग्र बदलाव की जरूरत है। चाहे वह टिकट बुकिंग हो, आरक्षण प्रणाली हो या रेल परिचालन हो। रेल विभाग ने एक बार शून्याधारित समयसारणी की घोषणा की तो थी, मगर पता नही परिचालन में व्यापक सुधार नही हो पाया।
आज रेल परिचालन में 200 km प्रति घण्टा गति क्षमता वाली LHB गाड़ियाँ पटरी पर लाई जा रही है, मगर रेल के बुनियादी संसाधन यथावत होने से इनकी औसत गति बढ़ ही नही पा रही है। एक तेज गति की वन्देभारत गाड़ी यदि रेल सिस्टम में जोड़ी गई तो कमसे कम 10 जोड़ी गाड़ियोंकी समयसारणी हिलती है। यह भीषण त्रासदी है। रेल नेटवर्क, स्टेशन नेटवर्क अद्यतन होना बेहद जरूरी है।
एक तरफ यात्रिओंकी गाड़ियोंको लेकर माँग भी बेतहाशा बढ़ रही है, दूसरी तरफ नियमित गाड़ियोंमे यात्री सुरक्षित और सुकून महसूस कर सके ऐसी हालत बिल्कुल नही है। टिकट जाँच दस्ते बढ़ गए है मगर जुर्माना देकर भी यात्री बड़े खुशी से यात्रा करना पसन्द कर रहे है। अर्थात दण्ड की रकम भी उसे दण्ड जैसे नही लगती है, इतनी मामूली है।
रेल कर्मियों का, यात्री के प्रति सेवा भाव कहीं न कही गुम हो चुका है। चूँकि पूरे गाड़ी में यात्री सुविधा हेतु नियुक्त TTE टिकट परीक्षक दो या तीन ही होते है, जो कई बार स्लिपर कोच में यात्री व्यवस्था देखने पहुँच ही नही पाते।
कुल मिलाकर टका सेर भाजी टका सेर खाजा वाली गती है। न किराया उचित मूल्य में बढ़ेगा न ही सुविधाएं चाकचौबंद हो पाएगी।
