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देशभर में 20 शहरों के रेलवे स्टेशनोंकी क्षमता लगभग तीन गुना बढाई जाएगी

03 नवम्बर 2025, सोमवार, कार्तिक, शुक्ल पक्ष, त्रयोदशी, विक्रम संवत 2082

देशभर में करीब 20 ऐसे शहर हैं, जहाँ पहुँचने की और गाड़ियों की बहुत ज़्यादा डिमांड रहती है। ऐसे 20 शहरों की क्षमता को दोगुना करने का काम हाथ में लिया गया है, और इस काम में सबसे बड़ा फ़ैक्टर रहेगा मेगा कोचिंग टर्मिनल।

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने अहमदाबाद में निर्माणाधीन बुलेट ट्रेन स्टेशन का मुवायना करते वक्त उपस्थित पत्रकारोंसे बात करते हुए कहा।

तस्वीर : PIB से साभार

अहमदाबाद के वटवा में बनेगा मेगा टर्मिनल। जहाँ अभी 45 ट्रेनें अहमदाबाद से चलती हैं, वहीं आने वाले समय में 150 ट्रेनें यहां से शुरू हो सकेंगी। इसी तरह दिल्ली, लखनऊ, पटना, हावड़ा, चेन्नई, बंगलुरू, सूरत, पुणे ऐसे करीबन 20 रेलवे स्टेशन्स रेलवे के नज़र में है जहाँ यात्रिओंकी नई सेवा शुरू करवाने की ज्यादातर माँग रहती है।

इन निर्देशित स्टेशनोंपर टर्मिनेटिंग गाड़ियोंके रखरखाव के लिए पिट लाइन्स और अतिरिक्त सेटेलाइट टर्मिनलों का निर्माण कर ज्यादा प्लेटफार्म बनाने का निर्णय रेल प्रशासन के विचाराधीन है।

दरअसल यह सारा वाक़या बरात के पीछे घोड़ा चलाने के अंदाज़ में लगता है। आज की ही यह हालत है, नियमित गाड़ियोंके लेने के लिए प्लेटफ़ॉर्म उपलब्ध नही होते और गाड़ियाँ घंटो बड़े स्टेशनोंके बाहर अपना सारा समय बिता देती है। ऑटोमैटिक सिग्नलिंग सिस्टम्स लग गई, गाड़ियाँ LHB होकर 130 kmph की गति से दौड़ने लग गई मगर समयपर या समयसे पहले चलती गाड़ी को लाकर खड़ा करने के लिए प्लेटफ़ॉर्म ही उपलब्ध नही रहता। नई गाड़ियाँ माँग कहे या राजनीतिक दबाव कहिए शुरू कर दी जाती है। हजारों की संख्या में विशेष गाड़ियाँ चलाई जाती है, मगर उनका परिचालन देखेंगे तो कोफ़्त होंगी इतना भयंकर है। हाल ही में एक विशेष 05559 रक्सौल उधना गाड़ी तकरीबन 55 घण्टे देरी से चल रही है।

अमूमन सभी त्यौहार विशेष  गाड़ियाँ कमसे कम 3,4 घण्टे  देरी से चल रही है। इसमे ज्यादातर टर्मिनल स्टेशन्स की दिक्कतें है। वहाँपर आनेवाली गाड़ी थोड़ी भी देरी से चलती हो तो, उक्त गाड़ियोंको, उनकी वापसी यात्रा शुरू होने के समय पर ही गन्तव्य स्टेशन पर स्वीकारा जाता  है और उस चक्कर मे गाड़ी बेइंतहा लेट हो जाती है। दूसरा नियमित गाड़ियोंके परिचालन को रेल कंट्रोल विभाग थोड़ा भी हिलने नही देना चाहता चूँकि उन्ही गाड़ियोंसे उनका समयपालन, पंक्चुअलिटी चार्ट बनाया जाता है।

ऐसे लगता है, यह सारी विशेष गाड़ियाँ रेल परिचालन विभाग पर बोझ सी बन जाती है। जिस तरह बोझ असहनीय हो जाता है, बढ़ जाता है, तब कोई भी उसकी परवाह नही करता ओर उस गाड़ी का परिचालन भगवान भरोसे होते चला जाता है। यहाँतक की गाड़ी रेल इन्क्वायरी सिस्टम में दिखना तक बन्द हो जाती है।

किसी एक नई वन्देभारत जैसी गाड़ी को रेल परिचालन व्यवस्था में जोड़ने में उक्त मार्ग की कमसे कम दस जोड़ी नियमित गाड़ियोंके समयसारणी को डिस्टर्ब करना पड़ता है, बदलना पड़ता है। और यह सैकड़ों, हजारों विशेष गाड़ियाँ जब घोषित होती है तो नियमित गाड़ियोंके क्या हाल होते होंगे और जो नियमित गाड़ियोंको व्यवस्थित रखते है तो उन अतिरिक्त चलने वाली विशेष गाड़ियोंकी व्यवस्था कितनी बदतर होती होंगी, आप सहज ही समझ रहे होंगे।

ऊपर हमने कहा, बारात के पीछे घोड़ा, उसकी वजह यही है। नियोजन बादमे करने की कोशिशें होती है और गाड़ियाँ पहले चला दी जाती है। शायद ही कोई ऐसा त्यौहारी अवसर अब तक गया हो की सभी विशेष गाड़ियाँ समयपर चली हो। बताइए, क्या आपने देखा है?

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