Uncategorised

शेगाँव, वर्धा, उरुली में गाड़ियोंको मिले स्टॉपेज

02 अप्रैल 2026, गुरुवार, चैत्र, शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा, विक्रम संवत 2083

रेल प्रशासन ने नागपुर दुरन्तो, कर्णाटक सम्पर्क क्रांति एक्सप्रेस और अन्य दो एक्सप्रेस गाड़ियोंको नए स्टोपेजेस देने का निर्णय लिया है।

12289/90 छत्रपति शिवाजी महाराज मुम्बई नागपुर छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस मुम्बई दुरन्तो एक्सप्रेस अब वर्धा स्टोपेज लेगी। इसके साथ ही 12629/30 और 22685/86 यशवंतपुर हज़रत निजामुद्दीन, चंडीगढ़ यशवंतपुर सम्पर्क क्रान्ति एक्सप्रेस एवं 12135/36 पुणे नागपुर पुणे अब उरुली स्टेशन पर रुकेगी। 22109/10 लोकमान्य तिलक टर्मिनस बल्हारशाह लोकमान्य तिलक टर्मिनस एक्सप्रेस शेगाँव रूकेंगी।

निम्नलिखित परिपत्र देखिए,

क्या इससे ऐसी धारणा नही बनती की भारतीय रेल ने कन्सेप्चुअल ट्रेन्स अर्थात संहितायुक्त रेल गाड़ियाँ चलाना छोड़ दिया है या रेल प्रशासन के नियोजन से अब यह व्यवस्था बाहर हो गई है?

दुरन्तो एक्सप्रेस की संहिता थी, राज्य के महत्वपूर्ण शहर या राजधानी को किसी तीव्र गति, बिना रुके, कम समय मे पहुँचना।

सम्पर्क क्रान्ति गाड़ियाँ भी लगभग इसी संहिता में शुरू की गई थी। इनका उद्देश्य राज्य की राजधानी से देश की राजधानी से सम्पर्क कराना। यह गाड़ियाँ जिस राज्य के नाम से निकलती केवल उसी राज्य के सभी महत्वपूर्ण स्टेशनोंपर रुकती थी, अन्य राज्य के किसी भी महत्वपूर्ण स्टेशनों, जंक्शनपर इन्हें स्टोपेज नही दिया गया था।

मगर यात्रिओंकी पुरजोर माँग या राजनियकों की इच्छा अनुसार इन गाड़ियोंके स्टोपेजेस बिना किसी संहिता के बढ़ते चले गए। केवल वातानुकूल थ्री टियर वाली हमसफ़र गाड़ियोंमें अब स्लिपर, वातानुकूल टू टियर कोच लगने लगे है। महामना एक्सप्रेस गाड़ियोंमे अलग किराया श्रेणी के अलावा कुछ भी अलग नही होता। गतिमान की गति दिनोंदिन घटाई ही जा रही है।

इन विशिष्ट गाड़ियोंकी कोच संरचना, उनकी यूनिक लाइवरी, साजसज्जा के प्रति भी रेल प्रशासन गम्भीर नही है। अब डेक्कन क्वीन की बात ही लीजिए, बड़े चाव से NID नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन, अहमदाबाद को साथ रख कर बनवाई थी मगर आए दिन को अलग ही डिजाइन के कोच जोड़ कर चलती नजर आती है। दुरन्तो गाड़ियोंकी डिजाइन तत्कालीन रेल मंत्री ममता बैनर्जी की प्रेरणा से बनी थी, मगर अब दुरन्तो सर्वसाधारण LHB कोच के लाल डिब्बों से चलती है। राजधानी, शताब्दी, गरीबरथ ऐसी कई गाड़ियाँ है, जिनकी कोई विशेषताओं को रेल विभाग ने बिल्कुल सम्भाला सहेजा नही है।

दिक्कतें नही है, किसी कोच से, कोई रंगों से, किसी कन्सेप्ट के साथ चले भारतीय रेल, किसी को कोई फर्क नही पड़ता। न यात्री को न ही रेल प्रशासन को क्योंकि रेल विभाग ने अपनी गाड़ियोंके विशेषताओं की गरिमा को कहीं खो दिया है। बस सिर्फ नामों तक ही सीमित रह गई सारी विशेषताएं।

Leave a comment