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भारतीय रेल यात्री आरक्षण प्रणाली मे और सुधार की आवश्यकता है : रेल संबंधी स्थायी समिति की समीक्षा

भारतीय रेल हमारे देश की जीवन वाहिनी, नैशनल कैरियर मानी जाती है। भारतीय रेल न सिर्फ परिवाहन का सबसे किफायती और पर्यावरण अनुकूल संसाधन है बल्कि देश के सामाजिक, आर्थिक विकास मे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारतीय रेल प्रतिदिन 13,500 यात्री गाड़ियोंमे लगभग 2,30,00,000 यात्रीओंको लाने – ले जाने की लिए लंबा रास्ता तय करती है। यात्रीओं की इतनी व्यापक संख्या को देखते हुए रेल्वे की यह जिम्मेदारी बनती है की वे अपने यात्रीओं के लिए देशभर से कहीं से भी यात्रा करने के लिए किसी भी स्टेशन से टिकट बुकिंग करने की उचित सुविधा प्रदान करे।

रेल्वे मे पहले आरक्षित एवं अनारक्षित टिकट मैनुअल तरिके से बुक की जाती थी। अब यह काम कंप्यूटर से ऑनलाइन PRS प्रणाली से किया जा रहा है। चूंकि विषय आरक्षण प्रणाली का है, तो उसी को ले कर आगे बढ़ते है। ऑनलाइन PRS प्रणाली की शूरवात सितंबर 1985 से CMC के सहयोग मे नई दिल्ली से हुई जिसे रेल्वे की तकनीकी उपकम्पनि CRIS एवं CONCERT द्वारा सिकंदराबाद, मुम्बई, कोलकाता और चेन्नई मे आगे बढ़ाया गया। अप्रेल 1999 से यह प्रणाली पूरे देशभर मे कार्यान्वित की गई। 30 जून 2020 तक 4043 आरक्षण केंद्र मे 10725 टर्मिनल रेल्वे आरक्षण का काम सुचारु रूप से कर रहे है। इनमे रेल्वे के PRS काउंटर, आईआरसीटीसी के वेबसाइट और ऐप, डाकघर के PRS, YTSK यात्री टिकट सुविधा केंद्र और गैर रेल्वे केंद्र जो भौतिक रूप के टिकट बुक करते है, शामिल है।

भारतीय रेल्वे अपनी आरक्षण प्रणाली को दिन ब दिन मजबूत और अद्यतन करते रहती है। वर्ष 2019-20 मे PRS का अधिकतम लेन – देन प्रति मिनट (TPM) 8,711 था जो फिलहाल 28,915 तक उन्नत किया गया है। जनवरी 2020 के आँकड़े यह बताते है की एवरेज 14,16,990 लेन – देन प्रतिदिन हो रहे है जिस मे लगभग 84% टिकट की बुकिंग और 16% रद्दीकरण किया जा रहा है। आईआरसीटीसी के ई-टिकट और PRS के भौतिक टिकट मे एक बहुत बड़ा फर्क है। ई-टिकट यदि अंतिम चारटींग के बाद प्रतीक्षा सूची मे रह गए तो अपने आप रद्द हो जाते है जब की PRS टिकट रद्द कराने के लिए व्यक्तिशः पहल करनी पड़ती है। यज्ञपि रेल्वे उसका PNR क्रमांक रद्द कर देती है फिर भी उस टिकट पर अनारक्षित कोच मे यात्री यात्रा कर सकता है। अब इसमे सबसे बड़ी तकलीफ यह है की वह यात्री अपनी प्रतीक्षासूची वाली टिकट लेकर आरक्षित कोच मे जबरन यात्रा करने का प्रयत्न करता है। हालांकि रेल प्रशासन उस यात्री को आरक्षित कोच मे यात्रा करने के लिए दंडित करता है मगर व्यापक निगरानी के अभाव मे ऐसे यात्री को आरक्षित कोचों मे आम तौर पर सहज ही पाया जाता रहा है। रेल प्रशासन को चाहिए की ऐसे PRS टिकट को भी पूर्णतया रद्द समझ कर रिफ़ंड प्रोसेस के लिए आवश्यक माना जाए और ऐसे टिकट को अनारक्षित कोच मे भी रद्द समझा जाना चाहिए। यात्रा करने के लिए उचित टिकट ही वैध माना जाना चाहिए, यात्री को प्रतीक्षा सूची टिकट को अनारक्षित टिकट का विकल्प रद्द किया जाना चाहिए।

रेल्वे प्रशासन द्वारा यात्री सुविधा के लिए दिसम्बर 1997 से तत्काल आरक्षण प्रणाली शुरू की गई। शुरुवात मे तत्काल व्यवस्था केवल 110 गाड़ियोंमे और स्लीपर क्लास के लिए ही शुरू की गई थी लेकिन इसके उत्साहवर्धक परिणाम देखने के बाद अगस्त 2004 से इसे देशभर की सभी गाड़ियोंमे लागू किया गया। अक्तूबर 2014 से तत्काल कोटे मे एक प्रीमियम तत्काल नामक एक और कोटा शुरू किया गया। जिस मे टिकट का दर प्रीमियम डायनामिक रेट से बढ़ता है। प्रत्येक गाड़ी के तत्काल और प्रीमियम तत्काल कोटे का निर्धारण संबंधित क्षेत्रीय रेल्वे के पास है। तत्काल टिकट गाड़ी के प्रस्थान स्टेशन से एक दिन पहले शुरू होता है और पहले चार्टिंग तक आबंटित किया जाता है। इसके पश्चात यदि कोई जगह खाली रह जाती है तो उसे संबंधित स्टेशन के जनरल कोटे मे वर्ग कर दिया जाता है।

आरक्षण रद्दीकरण के नियम :

रेल यात्री किरायोंमे रियायत :

भारतीय रेल देश के सामाजिक एवं आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भागीदारी रखती है और जनता में यह स्तर बराबरी में रखने हेतु अलग अलग मदों में यात्री किरायोंमे छूट के प्रावधान प्रदान करती है। 54 वर्ग में रियायत दी जाती है जिसमे बच्चोंसे लेकर बुजुर्ग, मरीज, दिव्यांग, विविध राष्ट्रीय पुरस्कार, पत्रकार, किसान और युवा आदि आते है। बीते वित्त वर्ष 2018-19 में, रियायतोंके चलते रेलवे ने लगभग 2000 करोड रुपए का राजस्व खोया है। समिति ने रेल्वेसे रियायतों के क्षेत्र में सभी प्रवर्ग में रेलवे की उचित निगरानी बनाए रखने की सिफारिश की है। समिति ने रेल कर्मियों को दिए जाने वाली पास पीटीओ की भी जानकारी ली। रेल प्रशासन ने उसे रियायत नही बल्कि सेवा पात्रता का दर्जा दिया है। कई रेल कर्मी सुविधा होते हुए भी उसका उपयोग नही करते या उनको उसकी आवश्यकता ही नही पड़ती। इसका अलग से लेखाजोखा भी रेल विभाग के पास नही होने से इस मद पर कितना खर्च होता है इसका समिति द्वारा आकलन नही किया जा सका।

स्वतंत्रता सेनानी और उनके परिवार में भी रेल किरायों की रियायत दी गयी है। वर्ष 2016-18 में 10435 स्वतन्त्रता सेनानी पास जारी किए गए जिसपर कुल 34 करोड़ रुपये का भुगतान गृह विभाग से किया गया। आजादी को लगभग 75 वर्ष हो गए और औसतन स्वतंत्रता सेनानी की उम्र 85-90 के आसपास होनी चाहिए ऐसे में समिति ने इस प्रवर्ग में यथोचित समीक्षा कर स्मार्ट कार्ड जारी करने की सूचना की है। इस रियायत में रेलवे की कोई हानि नही होती, किराए का भुगतान गृह विभाग कर देता है।

समिति ने रेलवे के पूरे आरक्षण प्रणालीपर जानकारी लेने के बाद कुछ टिप्पणीयाँ और सूचनाएं दी है। रेल्वे के ऑनलाइन आरक्षण प्रणाली को और मजबूत और सुचारू करने हेतु उन्नत किया जाए, बुकिंग एजंट पर यथायोग्य निगरानी रखी जाए, सेकण्ड चार्टिंग की उपयोगिता की समीक्षा की जाए, महंगे फ्लेक्सी/डायनामिक किरायोंकी समीक्षा कर उन्हें तर्कसंगत बनाए, यात्री किराया रियायतें सामाजिक समानता रखने हेतु दी जाती है परंतु इसका ग़ैरफ़ायदा असामाजिक तत्व उठाते है इसलिए ऐसे तत्वों की यथोचित छानबीन कर उनपर अंकुश लगना चाहिए। रेल कर्मियों के पास लेने / छोड़ने का अलग से लेखाजोखा रखा जाए।

यूँ तो समिति ने व्यापक समीक्षा की है और रेलवे के आरक्षण प्रणाली पर समाधान व्यक्त किया है। समिति ने इसी व्यवस्था को कायम रखते हुए कुछ और सुधारणा करने के प्रस्ताव दिए है। हालांकि धरातल पर जब नियमोंके पालन का वक्त आता है तो मनुष्यबल की कमी के चलते कुछ तत्व इनका फायदा लेकर सही जरूरतमंद को वंचित रखते है। PRS काउंटर पर रेलवे द्वारा नियुक्त एजेन्टोंको विशिष्ट टिकटोंकी बुकिंग करते वक्त कुछ देरी से टिकट बुकिंग की अनुमति है मगर यात्रिओंकी मांग है, इन एजेण्टों को केवल IRCTC से ही टिकट निकालने की पात्रता रखी जाए और हर तरह के PRS टिकट की अनुमति रद्द की जाए। PRS टिकट और ई-टिकट के बुकिंग/रद्दीकरण के नियम प्रत्येक स्तर पर समान रखे जाए। PRS टिकट में सेवा शुल्क नही लिया जाता वहीं ई-टिकट में बुकिंग और रद्दीकरण दोनों अवस्था मे वह लगता है। इस तरह की असमानता पर समिति ने गौर कर इसे खत्म करना चाहिए था ऐसी लोकभावना है।

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लम्बी दूरी की तेज गति वाली गाड़ियाँ यात्री सुविधाभिमुख की जाए।

भारतीय रेल में तेज गति की गाड़ियोंका काफी बोलबाला है। शताब्दी, राजधानी, दुरंतो, गतिमान, हमसफ़र इनके अलावा भी कई सुपरफास्ट गाड़ियाँ ऐसी है जो 200-300 किलोमीटर तक बिना ठहरावोंके चलती है। हालाँकि तेज गति वाली गाड़ियोंकी ‘कम ठहराव’ यह विशेषता है, मगर कई यात्रिओंके इस बारे में सुझाव है जो न सिर्फ उनके अपितु रेल प्रशासन के परिचालन में भी बहुत उपयोगी साबित हो सकते है।

जब यह गाड़ियाँ अपने मुख्य टर्मिनल के शुरवाती स्टेशन से चलती है तब उनके उपनगरीय स्टेशनोंपर यदि 2 मिनट का भी ठहराव लेती है तो वह यात्रिओंके दृष्टिकोण से काफी सुविधाजनक हो सकता है। यही स्टोपेज लौटते वक्त भी कायम हुवा तो यात्रिओंका अपने घर पहुंचने के समय मे काफी बचत होगी। साथ ही मुख्य टर्मिनल स्टेशनपर भी यात्रिओंका दबाव कम होगा। उदाहरण के तौर पर मध्य रेल के मुम्बई छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनल को लीजिए। यहाँसे कोई सुपरफास्ट गाड़ी चले और दादर, ठाणे, कल्याण में जाते-आते दोनोंही वक्त स्टोपेज ले तो यात्रिओंके लिए बहुत सुविधाजनक होगा। इसी प्रकार मुम्बई सेंट्रल के लिए दादर, बोरीवली, विरार, डहाणू रोड है, नागपुर के लिए अजनी और इतवारी है और भी मुख्य स्टेशन के आसपास के उपनगर गिनाए जा सकते है।

चूँकि रेलवे के टर्मिनल स्टेशन और उपनगरीय स्टेशन लोकवस्ती में से जाते है, व्यापार व्यवसाय और मार्केट से भी निकटतम होते है अतः यात्रिओंको 10-15 मिनट में स्टेशनपर पहुंचकर गाड़ी पकड़ने की सुविधा रहती है। वही हवाई यात्रा भले ही रेलवे से कई गुना तेज है मगर यात्री को अपने रिहायशी इलाके या व्यवसाय की जगहोंसे हवाई अड्डे पर पहुंचने में 2-3 घंटे लग जाते है। यही कारण के लिए सड़क परिवहन ज्यादा लोकप्रिय है। सड़क परिवहन “एप्रोचिंग टाइम” शून्य के बराबर होता है। रेलवे भी अपनी कई गाड़ियोंमे टिकिटोंकी गणना के आधार पर ऐसे स्टोपेजेस बढाने का निर्णय ले सकती है।

यह तो हुई मुख्य टर्मिनल की बात, की जहाँसे गाड़ी आगे जाती ही न हो, मगर जो उपनगर आजकल सैटेलाइट टर्मिनल बनाए जा रहे है, उनमें भी एक सुझाव हक़ीक़त में लाया जा सकता है। मध्य रेलवे की मुम्बई, पुणे से नागपुर जानेवाली गाड़ियाँ अजनी की जगह नागपुर से आगे इतवारी में और बिलासपुर से आनेवाली गाड़ियाँ अजनी में टर्मिनेट की जाए। इससे दोनों ओरसे चलनेवाली गाड़ियोंको नागपुर स्टेशन के स्टोपेज का लाभ मिल पाएगा। इस तरह की सुविधा पटना स्टेशन के दोनों दिशाओं की गाड़ियोंमें राजेंद्रनगर और दानापुर स्टेशन, जबलपुर में मदनमहल और आधारतल, भोपाल में रानी कमलापति और निशातपुरा इस तरह हो सकती है।

रेल प्रशासन को वाकई ऐसे लोकभावना वाले सुझावोंपर विचार करने की आवश्यकता है।

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‘डेक्कन क्वीन’ का नया ‘अवतार’ देखा क्या? 😳

डेक्कन क्वीन, दख्खन की रानी, मुम्बई पुणे के बीच रोजाना रेल यात्रा कराने वाली हजारों यात्रिओंके दिलोंकी धड़कन!

मुम्बई पुणे मुम्बई के बीच हजारों यात्री प्रतिदिन इस गाडीसे जाना आना करते है। हमारे देश मे लोग अपने रोजमर्रा की आदतोंसे कितना प्यार और सन्मान करते है, यह आप केवल यह चित्र देखकर ही समझ सकते है।

Courtesy : IndiaToday

यह तस्वीर जब संक्रमणकाल में कई महीनों उपनगरीय गाड़ियाँ बन्द रहने के बाद दोबारा चलना शुरू हुई उस वक्त के अखबारोंमें और सोशल मीडिया में बहुत चली थी। मुम्बई और पुणे ही क्या देशभर में रेल गाड़ियोंके कई लोग दीवाने है, रेल फैन क्लब बने है, और यह लोग दिन और रात बस रेल की ही बातें करते रहते है। रेल गाड़ियाँ उनके डिब्बे, लोको, मार्ग और क्या क्या।

ऐसे में यात्रिओंकी चहेती डेक्कन क्वीन एक्सप्रेस के डिब्बों की रंग संगती में रेल प्रशासन ने बदलाव करने की ठानी तो हर एक रेल फैन की प्रतिभा और उत्सुकता उमड़ने लगी थी, मगर जब रेलवे ने नई डेक्कन क्वीन को यात्रिओंके सामने रखा तो रेल फैन तो भौचक्के रह गए। आप भी देख लीजिए,

उपरोक्त चित्र से ज्यादा समझ न आए तो नीचे एक यू ट्यूब लिंक दे रहे है, इस व्हिडिओ में आप को ग्राफिक्स के जरिए गाडीको दिखाया गया है।

डेक्कन क्वीन के डिब्बों की रंगसंगती में यह जो भी ‘मॉडर्न आर्ट’ वाला प्रयोग किया है वह NID  नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ डिज़ाइन नामक राष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थान की देन है जो रेल फैन्स को बिल्कुल भी नही सुहाया है। सारे रेल प्रेमियों की जुबान एकदम से कड़वे करेले निगलने सी हो गयी है।

हमारे एक तोताराम जी है जो प्रशासन के कट्टर समर्थक है। चाहे दुनिया डोल जाए वह उसमे भी जनता भी भलाई ढूंढ लेते है। उन्होंने कहा, “भाई, नोटोंके रंग बदले मगर बाजारों में उनकी कीमत तो नही बदली? गाड़ी भलेही बदरंग हो जाय, पड़ोसी देश के झंडे की तरह दिखने लगे तो क्या उनकी हो जाएगी? मुम्बई से चलेगी तो पुणे की बजाय ढाका पहुँच जायगी? और गाड़ी की सुविधा, उच्च तकनीक, अंतरंग देखिए, कलेवरों को क्या देखते हो।”

खैर, टिका टिप्पणी तो होती ही रहेगी। दुरंतो अवतरित होने को कई वर्ष बीत गए पर आजतक लोगोंको उन डिब्बों की पेंटिंग समझ नही आई। आर्ट के बाजारों में अनसुलझे चित्र ही ऊँचे दाम में बिकते है। तो यह समझ लीजिए, कोई गहन संदेश देने की मंशा है हमारे NID वालोंकी और वैसे भी नए रंगबिरंगे नोटोंकी तरह यह रंगसंगती भी हमारे जहन में घुलमिल जाएगी।

उपरोक्त लेख की तस्वीरें, यू ट्यूब लिंक RailPost.in और indiarailinfo.com के सहयोग से

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रेल के टिकट में रियायत, कन्सेशन? ना जी, दादा, दादी, नाना, नानी जरा ठहरिये! अभी और रुकना होगा।

भारतीय रेल में यात्री टिकट किरायोंमे रियायतोंकी लम्बी 54 प्रकार की सूची इन दिनों इन दिनों सिमटकर 15 प्रकार की हो गयी है। रियायत में सबसे ज्यादा उपयोग में लाएं जानेवाली, लोकप्रिय वरिष्ठ नागरिक रियायत भी फिलहाल बन्द ही है।

रेल प्रशासन ने संक्रमण की रोकथाम के हेतु 20 मार्च 2020 से सभी यात्री गाड़ियोंका परिचालन रोक दिया था। लगभग 2 महीने बाद धीरे धीरे गाड़ियाँ खुलने लगी मगर टिकटोंमें रियायत बन्द ही थी। फिर विशेष श्रेणी में गाड़ियोंका परिचालन किया गया और 15 रियायतोंको लाया गया, जिसमे 4 प्रकार की दिव्यांग जन रियायत और 11 प्रकार की मरीज एवं विद्यार्थी रियायत शुरू की गई। चूँकि 15 नवम्बर से सभी गाड़ियोंका नियमितीकरण किया गया तो यात्रिओंमें रियायत भी नियमित हो जाएगी ऐसा विश्वास जाग उठा था। गाड़ियोंके गाड़ी क्रमांक तो बदले मगर रियायतोंकी सूची का नियमितीकरण न हो पाया।

तमाम रेल यात्री और यात्री संगठन यह जानने के लिए उत्सुक थे, की जनता के प्रत्येक छोटे बड़े प्रश्न का उत्तर प्रशासन से लेने वाले जनप्रतिनिधि आखिर कब यह रेल टिकट की रियायतों को पूर्ण रूप से पुनर्स्थापित करवा रहे है? यह प्रश्न आखिर सदन के पटल पर पहुंच ही गया। राज्यसभा में रेल मन्त्री अश्विनी वैष्णव ने रेल यात्री किरायोंकी रियायतोंको फिलहाल नियमित स्तर पर लाने में जल्दबाजी होगी ऐसा उत्तर दिया। अभी भी संक्रमण का डर पूर्णतयः खत्म नही हुवा है।

तो बुज़ुर्गोंको अन्य पुरस्कृत यात्रिओंको रेल किरायोंकी छूट के लिए अभी इंतजार करना होगा।

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महू – खण्डवा रेल आमान परिवर्तन का लाभ क्या सिर्फ खण्डवा क्षेत्र को ही मिलेगा?

खंडवा के नवनिर्वाचित सांसद ज्ञानेश्वर पाटील ने जैसे ही सांसद पद की शपथ ली सीधे रेल मंत्रालय का रुख किया। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से मुलाकात की और प्रदेश के जनता की अनवरत माँग मंत्रीजी के सामने रखी। खंडवा – इंदौर रेल गेज कन्वर्शन के बचे हिस्से महू – सनावद रेल मार्ग को प्राथमिकता से किए जाने और खंडवा से सनावद (ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग) के बीच मेमू यात्री ट्रेन जल्द से शुरू करने के बारे में पत्र दिया।

विशेष बात यह है, यह पूरा आमान परिवर्तन का प्रोजेक्ट रतलाम – अकोला ऐसा है। प्रोजेक्ट में रतलाम से इन्दौर होते हुए महू तक आमान परिवर्तन हो चुका है और बड़े गेज की गाड़ियाँ भी सुचारू रूप से चलने लँग गयी है। इसी प्रकार सनावद से मथेला स्टेशन जो की भुसावल – इटारसी मुख्य रेल मार्ग का खण्डवा से इटारसी की ओर, खण्डवा से पहला स्टेशन है। खण्डवा से अकोला में आकोट से अकोला का भी गेज कन्वर्शन हो चुका है। तकलीफ़ यह है, इस पूरे प्रोजेक्ट के लिए क्षेत्र के राजनीतिक मिलकर जोर नही लगा रहे। जिनके क्षेत्र में गेज कन्वर्शन हो चुका वह अपने क्षेत्र में रेल के इतर विषयों पर बात करते है। यह ठीक ‘बॉल पासिंग गेम’ की तरह हो गया है। जिसके पाले में गेंद अटकी वही परेशानी झेलेगा। जिन क्षेत्रोंके रेल मार्ग का कार्य हो चुका है उन्हें इस प्रोजेक्ट के पूर्णत्व की ज्यादा चिन्ता नही है।

यह प्रोजेक्ट पूरा होता है तो न सिर्फ मालवा, निमाड़ क्षेत्र को इसका लाभ होगा अपितु यह मार्ग पुराने मीटर गेज के स्वर्णयुग में लौट आएगा। यह मीटर गेज लाइन राजस्थान के जयपुर से दक्षिण भारत के काचेगुड़ा को जोड़नेवाला प्रमुख मार्ग हुवा करता था। आज इस मार्ग के लंबित प्रकरण के चलते कई गाड़ियाँ 200 से 300 किलोमीटर, इधर उधर से घूम कर जा रही है। क्षेत्र की जनता आज भी रुके हुए विकास को कोसती है। उन्हें आज के, उनके अपने प्रतिनिधियोंके बजाय स्वातंत्र्य पूर्व अंग्रेजोंकी तत्परता अधिक भाती है।

इस रेल आमान परिवर्तन कार्य का लाभ राजस्थान के जयपुर, अजमेर, चित्तौड़, मध्यप्रदेश के मालवा, निमाड़, महाराष्ट्र के विदर्भ, खान्देश, मराठवाड़ा, तेलंगाना के हैदराबाद क्षेत्र के तमाम आबादी को होने वाला है। चूँकि दक्षिण से उत्तर में रेलगाड़ियाँ इधर उधर से गाड़ियाँ से ही सही चल रही है तो इस मार्ग पर जनप्रतिनिधियों ने ज्यादातर ध्यान देना, आग्रह करना कम कर दिया है।

जिस क्षेत्र में आजसे 10-15 वर्ष पूर्व यात्रिओंसे खचाखच भरी गाड़ियाँ चलती थी, अकोला – खण्डवा – महू वह आदिवासी बहुल क्षेत्र आज रेल गाड़ियोंके आवाज तक को तरस गया है। एक तरफ ऊंचे ऊंचे क़ुतुब मीनार से पुल का निर्माण किया जा रहा है,16 – 16 किलोमीटर की सुरंग बा कर रेल पहाड़ों से चलाने का कमाल किया जा रहा है, समुंदर पर से रेल निकल रही है तो नर्मदा जी से क्यों कर दिक्कतें दिखाई दे रही है?

प्रदेश की पीड़ित जनता अब हताशा की सीमा भी पार कर गयी है। प्रोजेक्ट के बारे में माँग करते करते उनके गले से स्वर ही गायब हो गए है। विकास जो भी है, पास पड़ोस में ही जन्मता है और वहीं पल बढ़ रहा है। हर जनप्रतिनिधि नई डेडलाइन देकर फिर नया सपना संजोए आगे बढ़ जाता है। जनता सूरजमुखी के फूल की तरह नए से उल्हासित होती है, दिन ढला फिर बुझ जाती है, फिर बुझ जाती है।