रेलवे के टिकट कैंसल कराने में कितना शुल्क कटेगा, रिफण्ड किस तरह लिया जाएगा यह एक नजर में देखने के लिए इस फॉरमेट के डाऊनलोड कर के रख ले, बहोत उपयोगी है।

रेलवे के टिकट कैंसल कराने में कितना शुल्क कटेगा, रिफण्ड किस तरह लिया जाएगा यह एक नजर में देखने के लिए इस फॉरमेट के डाऊनलोड कर के रख ले, बहोत उपयोगी है।

‘4200 श्रमिक स्पेशल गाड़ियोंमे करीबन 1 करोड़ श्रमिकोंने यात्रा कर अपने गाँव लौटे।’ ‘रेलवे कर्मचारी भी कोरोना योद्धा’ तो कोई वृत्तपत्र, “श्रमिक ट्रेन राह से भटकी”, “श्रमिकोंको रेल गाड़ी में खाना, पीने का पानी नही मिल रहा है” स्पेशल गाड़ियोंके यात्री बेहाल’ इस तरह के लेख बड़े बड़े न्यूजपेपर की हेडलाइन्स बने थे। सोशल मीडिया पर भी लोग फ़ोटो जोड़ जोड़ कर अपने मन मुताबिक गुण दोष मढ़े जा रहे थे। जिसको जैसे समझ आ रहा था वह किसी एक बाजू को पकड़ सही गलत का फैसला करते जा रहा था।
इन बातों, ख़बरोंको बहोत ज्यादा वक्त नही बिता है। हाल ही में एक लेख पढ़ने में आया और हमे लगा की रेल प्रशासन की भी टेक्निकल स्थिति लोगोंके नजर में आना जरूरी है। ऐसी परिस्थितियों में हम किसी घटना का समर्थन या किसी संस्था या व्यक्तिविशेष पर दोषारोपण नही कर सकते, केवल परिस्थिति का अवलोकन कर सकते है।
हमारे विचार से किसी भी वाकयात या घटना पर उसके समर्थन में या विरोध में बोलना बहोत आसान होता है। जब घटना सामने घटित होते रहती है या होने की स्थिति आन पड़ी है तब उससे छुटकारा / निज़ात पाना या उस पर सर्वोत्तम इलाज़ ढूंढना उतना ही मुश्किल होता है।
रेल प्रशासनपर श्रमिकोंकी यातायात करना यह अकस्मात आन पड़ी जिम्मेदारी थी। लॉक डाउन में संक्रमण रोकने के लिए रेल के पहिए थमे, यह भारतीय रेल के लिए ऐतिहासिक घटना ही थी। महायुद्ध काल मे भी रेल का परिचालन बन्द नही किया गया था। सारी यात्री गाड़ियाँ तुरन्त बन्द की गई। लेकिन मालगाड़ियां, पार्सल विशेष गाड़ियाँ तो चलाई जा रही थी। हजारों, लाखों कर्मचारियों को घर रुकने को बोला गया। छोटी बड़ी बीमारी वाले और 50 वर्ष या उससे ज्यादा उम्र के कर्मचारियोंको ड्यूटी पर आने की सख्त मनाही की गई। केवल 10 से 25 % कर्मचारियोंके भरोसे रेल चलाई जा रही थी। ऐसी स्थितियोंमे श्रमिकोंके बढ़ते हुजुम के लिए गाड़ियोंको पटरी पर उतरना उतना ही पेचीदा प्रश्न था जितना संक्रमण काल मे कर्मचारियोंकी फूल स्ट्रेंथ लगाकर ड्यूटी करवाना।
जब श्रमिक गाड़ियाँ शुरू कराई गई तब की स्थितियाँ देखे तो केवल 25% या उससे भी कम और उसमे भी स्किल्ड अनुभवी लोगोंके बिना इतनी गाड़ियोंको नियंत्रित करना कोई मुँह का खेल नही था। माना की रेलवे इससे कई गुना गाड़ियाँ चलाती है, लेकिन कर्मियोंके दल एक चौथाई रह जाए तब क्या हश्र होगा यह सामने है।
अब बात करते है, उस वक्त की जब गाड़ियाँ अपने नियोजित मार्गोंकी जगह अलग मार्गोंसे चलानी पड़ी। जितनी भी विशेष गाड़ियाँ, श्रमिक स्पेशल गाड़ियाँ बड़े मेट्रो सिटीज से निकल उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखण्ड, ओडिशा की ओर जा रही थी। याने सारी गाड़ियोंका दबाव किसी एक ही दिशा की ओर था। प्लेटफॉर्म्स और सेक्शन ब्लॉक होने लगे। रेल ट्रैफिक कोई रोड़वेज की तरह नही होता कि रोड़ पर कुछ अवरोध आ जाए तो बाजू के खेतोंसे मार्ग निकाल लिया जाता है। सेक्शनपर गाड़ियोंका जाम लगता चला गया और कन्जेशन टालने के लिए गाड़ियोंको डाईवर्ट किया गया। जब गाड़ी डाईवर्ट होती है तो उसे खाली मार्ग , सेक्शन ब्लॉक की तलाश रहती है न की उसे यह विचार किया जाता है, की गाड़ी को कौनसे राज्य से ले जाना है और कौनसे से नही। जो भी रूट वेकण्ट हो, जिस ब्लॉक में गाड़ी को आगे बढ़ने का मौका मिल रहा था उसे आगे बढाया गया और पीछे के रुकी हुई गाड़ियोंको प्लेटफॉर्म पर लाया जा रहा था।
रेल प्रशासन ने श्रमिकोंको न सिर्फ उनके गाँवोंतक पहुचाने की जिम्मेदारी ली थी बल्कि उनके खानपान, उनकी सुरक्षा की व्यवस्था भी भली भाँति सम्भाली थी। इस तरह का संचालन लगभग सारे रेल कर्मचारियोंके लिए बिल्कुल नया था। उसमें सीमित कर्मचारियों के साथ ऐसी अनपेक्षित अकस्मात आयी परिस्थितियोंसे निपटना और परिस्थितियों से बिल्कुल अपरिचित, महामारी से सुरक्षा के तरिकोंका ज्यादातर मालूमात नही, ऐसे कर्मचारियों की हाजिरी में रेल प्रशासन ने यह जिम्मेदारी का शिवधनुष न सिर्फ पेला बल्कि अच्छी तरह निभा भी लिया।
कुछ अव्यवस्थाएं जरूर हुई, गाड़ियाँ असमय, अस्थानों से घूमते हुए अपने गन्तव्यों तक पहुंची। लेकिन अपने टारगेट, अपने गोल, अपनी रेस उसने पूरी की। यही रेलवे की अचीवमेंट है, कामयाबी है और जिसके लिए रेल प्रशासन, उसके सारे कर्मचारी अभिनंदन और गौरव के पात्र है।
टाइमटेबल कमिटी की वर्ष 2019-20 की रिपोर्ट के अनुसार जुलाई टाइमटेबल में मध्य रेलवे की गाड़ियोंमें होंगे कुछ इस तरह के बदलाव।
1 : 17318 लोकमान्य तिलक टर्मिनस हुब्बाल्ली एक्सप्रेस के टर्मिनल और स्पीड में बदलाव।
2: 51027/28 और 51033/34 मुम्बई से पंढरपुर और शिर्डी के बीच चलनेवाली सवारी गाड़ी एक्सप्रेस बनाई जाएगी। जो हफ्ते में तीन और दो दिन चलेगी।
3 : 51029/30 मुम्बई बीजापुर सवारी गाड़ी डेली एक्सप्रेस में तब्दील की जा सकती है।
4: 16331 / 32 मुम्बई तिरुवनंतपुरम मुम्बई, 16339 /40 मुम्बई नागरकोइल मुम्बई और 16351 /52 मुम्बई नागरकोइल मुम्बई इन तीनों एक्सप्रेस गाड़ियोंको स्पीड अप, टर्मिनल चेंज और सुनियोजन किया जायेगा।
5: पुणे भागलपुर पुणे के बीच एक नई साप्ताहिक गाड़ी शुरू करने की योजना थी मगर 12149 /50 पुणे दानापुर पुणे गाडी को ही भागलपुर तक एक्सटेंशन किए जाने से नई गाड़ी को स्थगित किया गया है।
6 : 18519 /20 लोकमान्य तिलक टर्मिनस विशाखापत्तनम एक्सप्रेस को रायगड़ा तक एक्सटेंड किए जाने की योजना है।
7 : फिरोजपुर हुजुरसाहिब नान्देड के बीच नई गाड़ी विचाराधीन है।
8 : कालका शिर्डी द्विसाप्ताहिक गाड़ी के फेरे बढ़ाने की सम्भावना है।
9: गोमतीनगर पुणे, गोमतीनगर यसवंतपुर, मंडुआडीह प्रतापनगर ( वडोदरा )और गोरखपुर पनवेल के बीच नई गाड़ियाँ चलाने का प्रस्ताव है।
और भी कई सारे प्रस्ताव है, गाड़ियोंके एक्सटेंशन भी है।
1: पुणे निजामुद्दीन वातानुकूलित नई गाड़ी
2 : सोलापुर नागपुर के बीच द्विसाप्ताहिक नई गाड़ी
3 : विशाखापत्तनम सूबेदारगंज (प्रयागराज) नई गाड़ी
4: प्रयागराज से तिरुचिरापल्ली और लोकमान्य तिलक टर्मिनस के लिए नई गाड़ियाँ
5 : जयपुर कलबुर्गी के बीच साप्ताहिक गाड़ी
6: उदयपुर चेन्नई के बीच साप्ताहिक गाड़ी
7 : सिकन्दराबाद से रक्सौल और गोरखपुर के लिए द्विसाप्ताहिक गाड़ियाँ
8: तिरुपति से नागरसोल के बीच नई गाड़ी
9 : सिकन्दराबाद गांधीधाम साप्ताहिक
10: हटिया हड़पसर (पुणे) के बीच सप्ताहिक
गाड़ियोंका प्रस्तावित एक्सटेंशन
1 : 12171/72 लोकमान्य तिलक टर्मिनस हरिद्वार वातानुकूलित एक्सप्रेस को न्यू हृषिकेश तक
2 : 12263 / 64 पुणे निजामुद्दीन को न्यू हृषिकेश तक
3 : 22919 /20 चेन्नई अहमदाबाद को भगत की कोठी तक
4 : 14623 /24 दिल्ली सराय रोहिल्ला छिन्दवाड़ा को नए मार्ग से इतवारी तक
5 : 22929 /30 वडोडरा भिलाड को डहाणू रोड़ तक
इस तरह प्रस्ताव है।
मित्रों, भारतीय रेलोंके बारे में जानने के लिए सभी भारतीय लोग बहोत उत्सुक रहते है, फिर नई गाड़ियाँ हो या नया टाइमटेबल। आइए आज कुछ नई जानकारी लेते है।
IRTTC याने इंडियन रेलवे टाइम टेबल कमिटी। यह कमिटी रेलवे के सभी झोन की जरूरतों और क्षमताओंके अनुसार टाइमटेबल में सुधारणाए करने के की सूचनाएं करती है। हर एक झोन के जनरल मैनेजर इस कमिटी में अपने अपने झोन का प्रतिनिधित्व करते है। इसके अलावा रेलवे बोर्ड के कुछ डायरेक्टर भी इस कमिटी के सदस्य होते है।
जब भी कोई नई गाड़ी की पेशकश कोई झोन करता है तो उसे उस गाड़ी का टाइमटेबल पटल पर रखना होता है, उस समयोंपर सम्बन्धित झोन अपनी अपनी जरूरत और समस्याओं की चर्चा करते है। यदि सम्बंधित झोन की कोई आपत्ति न हो तो वह गाड़ी, या एक्सटेंशन, या दिनोंके फेरे बढाने का प्रस्ताव मंजूर किया जाता है। ब्रिटिश परंपरा में रेलवे में मेन लाइन और ब्रांच लाइन ऐसे कन्सेप्ट हुवा करते थे। अक्सर मेन लाइनोंपर सीधी गाड़ियाँ चलाई जाती और ब्रांच लाइनोंकी गाड़ियाँ अपने सेक्शन तक सीमित रहती थी। हालाँकि तब लिमिटेशन्स भी बहोत थी। लाइनोंके अलग अलग गेज थे, विद्युतीकरण हर जगह नही था, लोको बदलने का बहोत बड़ा झंझट था। लेकिन किसी एक फिक्स पॉलिसी के तहत काम सुचारू तरीकेसे चल रहा था। अब ऐसा नही है, ब्रांच लाइनोंकी गाड़ियाँ अलग अलग मेन लाइन फिर ब्रांच लाइन, फिरसे मेन लाइनोंपर ऐसे चलाई जाती है। इसमें टाइमिंग्ज के स्लॉट्स की बड़ी दिक्कत होती है। अलग अलग खण्ड पर किसी स्लॉट को मैनेज कर के गाड़ी को निकालना यह बेहद जटिल कार्य है।
लॉक डाउन पीरियड में लगातार हफ़्तोंमें गाड़ियाँ बन्द मिली है और यह अपॉर्च्युनिटी या सुसंधी साधतें हुए टाइमटेबल कमिटी पूर्ण टाइमटेबल की पुनर्रचना करना चाह रही है। इसे झीरो बेस टाइमटेबल कहते है। रेलवे में करीबन 7300 रेलवे स्टेशन्स है, उसमे 500 ऐसे स्टेशन्स है जिनपर गाड़ियोंकी जरूरत और माँग हर वक्त लगी रहती है। कमिटी इसी बात को मद्देनजर रखे हुए है, और इसी को अपना बेस बनाकर टाइमटेबल की रचना करने जा रही है। आज तक किसी प्रिमियम गाड़ी को सीधे निकालने के लिए दूसरी कम महत्वपूर्ण गाड़ियोंको किसी स्टेशन की लूप लाइन में खड़ा कर दिया जाता था। अब कोशिश यह कि जा रही है, की गाड़ियोंको खड़ा कर के यात्रिओंका और रेलवे का समय और पैसा जाया न किया जाए।
रेलवे ने अपने इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कार्यक्रम पर भी काफी ध्यान दिया है। ऑटिमेटिक सिग्नल ब्लॉक्स, लाइनोंका विद्युतीकरण, डबलिंग, ट्रिपलिंग और कहींपर जरूरतनुसार 4,5,6 लाइनोंतक काम बढाया है। गाड़ियोंके डिब्बे, लोको अत्याधुनिक बनाए जा रहे है, जो अत्याधिक गति से चलाए जा सकते है। मेंटेनेंस का रखरखाव का समय भी आधुनिक तकनिकोंके जरिए कम किया जा रहा है।
आज हमारे पास टाइमटेबल कमिटी की चर्चा के कुछ मुद्दे आए है, जो हम आपके साथ साँझा कर रहे है। पहले कमिटी की मंजूरी जिन मुद्दोंको मिली है, वह देखते है। यह थोड़ा टेक्निकल है, गाड़ियोंके नाम की जगह नम्बर्स है, स्टेशनोंके कोड है। कुछ समझने दिक्कत आए तो आप हमसे सम्पर्क कर सकते है।


अब कमिटी के सामने रखी गयी माँगों को देखते है। यह अलग अलग झोन की नई गाड़ियोंकी दरकार है।


और यह है गाड़ियोंके एक्सटेंशन याने अपने गन्तव्य से अगले स्टेशन आगे बढ़ने की माँग।



आप का कभी डाइवर्ट हुई ट्रेन से यात्रा करने का पाला पड़ा है? मतलब आप रेल यात्रा में हो और गाड़ी अपने नियोजित मार्ग को छोड़ कर किसी अन्य मार्ग से आपको निर्धारित गन्तव्य पर पोहोचाए? भाइयों, कुछ समझ आया? बीतें दिनोंमें कुछ श्रमिक स्पेशल गाड़ियाँ अपनी राह से भटक गई ऐसी खबरें अखबारों में बहोत ट्रेंड कर रही थी। ट्रेन डाईवर्ट होती है यानी अक्चुली क्या होता है और उसमे के यात्री कैसे बेहाल होते है, चलो आज सच्ची हक़ीकत के साथ समझाते है।
हुवां यूँ की एक बार हम इलाहाबाद, जी अब प्रयागराज से 12166 वाराणसी लोकमान्य तिलक टर्मिनस रत्नागिरी एक्सप्रेस से आ रहे थे। अब इस गाड़ी को रत्नागिरी एक्सप्रेस क्यों नाम दिया गया है, यह हमें आज तक समझ नही आया। रत्नागिरी स्टेशन कोंकण रेलवे के पनवेल – मडगांव खण्ड पर आता है और इस गाड़ी का उस रत्नागिरी स्टेशन से कोई ताल्लुक नही पड़ता। खैर, फिरसे किस्से पर आते है, तो हम रात करीबन 11 बजे रत्नागिरी एक्सप्रेस से प्रयागराज से निकले और आरक्षण S -1 में था, यह स्लिपर डिब्बा विशेष बनावट का 2 पार्सल कम्पार्टमेंट और 24 बर्थ का स्लिपर कम्पार्टमेंट, गार्ड कम्पार्टमेंट ऐसा था और गाड़ी की संरचना में इंजिन से लग के याने इंजिन के तुरंत बाद की पहली पोजिशन में था। अब इस अवस्था मे तकलीफ यह थी की यह डिब्बा पूरी ट्रेन से अलग थलग हो गया था जैसे बाकी सभी डिब्बे वेस्टिब्यूल होने की वजह से एक दूसरे में आने जाने हेतु जुड़े रहते है।
गाड़ी समयपर चल रही थी, और करीबन सुबह 8:30 पर इटारसी स्टेशनपर पहुंची। इटारसी में डीजल लोंको निकल कर इलेक्ट्रिक लोंको लगाया गया, चूँकि आगे इटारसी – भुसावल होते हुए मुम्बई तक विद्युतीकरण से गाड़ियाँ चलती थी। लोंको बदलने की वजह से, जबलपुर की ओर आने, जाने वाली सभी गाड़ियों का इंजिन बदला जाता और गाड़ी बड़ी आरामसे 15 – 20 मिनट खड़ी रहती थी।
मैं भी बड़े आरामसे प्लेटफार्म पर खड़ा था, इटारसी से ट्रेन खुलने के बाद नेक्स्ट स्टापेज सीधा भुसावल ही था। बस 4 घंटे की यात्रा बाकी थी। अचानक मेरा ख्याल लोको पायलट के बक्से चढ़ाने पर गया। बक्से पर नागपुर लोको पायलट ऐसा लिखा था। गाड़ी भुसावल जा रही है और लोको पायलट नागपुर का? गाड़ी को भी प्लेटफार्म पर आकर करीब करीब 45 मिनट हो गए थे। मुझे कुछ गड़बड़ मालूम हुई। तभी वहाँसे लोको पायलट के लिए कंट्रोल विभागसे “कॉशन आर्डर ” का पर्चा भेजा जाता है वह लेकर जानेवाला बन्दा दिखा, मैंने उससे युंही पूछ लिया, ” भाई, गाड़ी कब निकलेगी”? उसने बोला, बस, पाँच मिनट साब। पानी, नाश्ता भर लीजिए, गाड़ी नागपुर होकर जाएगी, आगे खण्डवा सेक्शन मे डिरेलमेंट हुवा है और आपकी ट्रेन पहली है जो वाया नागपुर डाइवर्ट की जा रही है।
जो एक अंदेशा मुझे लग रहा था, वही होने जा रहा था। मैंने फटाफट प्लेटफार्म पर दौड़ लगाई। नाश्ते के स्टॉल पर काफी भीड़ थी, शायद अनाउंसमेंट हो चुका था की गाड़ी निर्धारित मार्ग के बजाय घूम कर जाएगी। मैने जल्दी से एक ब्रेड की पैकिट, जैम और नमकीन ली और अपने डिब्बे में आकर बैठ गया। मेरे सहयात्री जो एक जैन तीर्थयात्रियों का ग्रुप था, मैने उन्हें आने वाली परेशानियों से, गाड़ी नागपुर होकर जाने वाली बात से अवगत करा दिया और आग्रह किया की वे भी कुछ खानपान का बंदोबस्त कर ले। लेकिन शायद उनकी कुछ धार्मिक उलझने थी या वे बात को गम्भीरता से नही ले रहे थे, उन्होंने स्टेशन से खाना नही लिया, और गाड़ी अपने नियोजित मार्ग को छोड़ अलग मार्ग से निकल पड़ी।
अब यहाँपर हम आपको गाड़ी को तुरन्त दूसरे मार्गसे निकालने का गणित समझाते है। इटारसी – भुसावल यह मेन लाइन है, और इटारसी ऐसा जंक्शन है जिसमे चारों तरफ की गाड़ियाँ आती जाती है। नागपुर, भोपाल, भुसावल और जबलपुर तरफ से गाड़ियोंका तांता लगा रहता है। गिनेचूने प्लेटफॉर्म्स के चलते गाड़ियोंको ज्यादा देर तक प्लेटफार्म पर नही रोका जा सकता है, उस वजह से पीछे की और भी गाड़ियों के समय पर असर पड़ता है, वह भी देरीसे चलने लगती है। नई दिल्ली – चेन्नई ग्रैंट ट्रंक रुट की गाड़ियाँ जिसपर कोई अवरोध नही था वह भी पीटना चालू हो जाती। तो ट्रैफिक क्लियर रखना बेहद जरूरी हो जाता है। ऐसे में सेकन्ड रूट ही नेक्स्ट बेस्ट ऑप्शन रहता है। यही सॉल्यूशन हमारी गाड़ी के लिए अपनाया गया।
चूँकि गाड़ी अपने रूट से अलग, परावर्तित मार्ग पर थी जिस पर उसका कोई भी निर्धारित स्टॉपेज रहने का सवाल ही नही था। इसका मतलब गाड़ी सिर्फ टेक्निकल हॉल्ट के लिए सीधे नागपुर ही रुकना था। कमसे कम 4-5 घंटे गाड़ी नॉनस्टॉप चलने वाली थी। करीबन दोपहर के 12 बजे मेरे सहयात्रियोंमे कुछ कसमसाहट होने लगी। उनके पास सूखा नाश्ता पोहा, मुरमुरा था जिससे उनका पेट नही भर सकता था। उनमें से एक जन मेरे पास आ कर बैठा और इटारसी में खाना न लेने के लिए पछतावा करने लगा। मैं उनकी हालत समझ सकता था, उनकी मजबूरी थी। उन्हें बुरा न लगे इसीलिए मैंने उनसे कहा, यह ब्रेड का पैकेट मेरे पास एक्स्ट्रा ही है, अभी नागपुर 3 बजे तक आएगा वहीं आपको खाना मिल पाएगा। यह ब्रेड, जैम आप लीजिए, मेरा खाना इटारसी में हो गया था और नागपुर में थाली ले लेंगे। यकीन मानिए, खरीदने के लिए पैसे हो कर भी खाने का बंदोबस्त न हो सके इससे बड़ी परेशानी क्या हो सकती है?
करीबन दोपहर के ढाई तीन बजे नागपुर स्टेशन आया। गाड़ी के तमाम यात्री खाना बेचने वालोंपे टूट पड़े। लगभग हर यात्री खाने की चीज खरीदने की होड़ में था। मैंने नागपुर में डेयरी स्टॉल से दही और टोस्ट का पैकेट लिया। मेरे सहयात्रियों को यहाँपर खाने की थाली मिल गयी थी। डैवर्टेड गाड़ियोंके यात्रिओंके खानेपीने के बहोत हाल हो जाते है। दूसरी समस्या आगे गाड़ी रिशेड्यूल होने की रहती है। जैसे कई लोगोंको भुसावल उतर कर सूरत के लिए दूसरी गाड़ी पकड़नी थी जो उनकी मिस हो गयी। हमारी गाड़ी समयसे आठ घंटे लेट भुसावल को पहुंची। आगे जानेवालोंके रिजर्वेशन भी गए और गाड़ी भी।
ऐसी हालात में यात्री ने क्या करना चाहिए, तो हमारी सलाह है संयम बरते। आपात स्थितियोंके लिए आप किसी को जिम्मेदार नही मान सकते। आज के दिनोंमें सम्पर्क और सूचना के लिए बेहतर साधन उपलब्ध है। लगभग हर किसी के पास स्मार्टफोन है। यात्री परिस्थितियों को अच्छी तरह से समझ सकते है। गाड़ी कहाँ, किस मार्ग से चल रही है, कौनसे स्टेशन कब पोहोचेगी सब आसानी से समझ आ जाता है। ऑनलाईन खाने की व्यवस्था हो जाती है। यातायात के पर्यायी साधन या व्यवस्था की जा सकती है। यदि आपको कुछ दूसरा पर्याय उपलब्ध हो तो आप रेलवे से रिफण्ड भी ले कर अपनी यात्रा छोड़ सकते है। बस शान्ति और संयम रखकर सोच समझ कर फैसला करे। लेकिन यह बात भी उतनी निश्चित है, की रेल प्रशासन अपने यात्रिओंको चाहे कितने ही अलग मार्गोंसे क्यों न जाना पड़े, सम्भवतः गन्तव्य तक अवश्य ही छोड़ने का प्रयास करती है। अन्जानी जगह हो तो सबसे सुरक्षित पर्याय यही है, की आप अपनी गाड़ी में ही बैठे रहे। देरी से ही सही, अन्य मार्ग से ही सही गाड़ी में आप सुरक्षित है और अपने गन्तव्य स्टेशन तक जरूर पोहोंचेंगे।
