मित्रों, कल परसों की बात है। हमने आपके साथ पश्चिम रेल का एक परिपत्रक साँझा किया था। बड़ी खुशखबर थी, 59013/14 सूरत भुसावल सूरत सवारी गाड़ी के 19005/06 एक्सप्रेस रूप में पुनर्स्थापित होने की, मगर आज परे के मुम्बई मण्डल व्यवस्थापक DRM की ओर से उस गाड़ी की अनिश्चित काल स्थगित करने की सूचना ट्विटर पर जारी हो गयी।
मुम्बई मण्डल पश्चिम रेलवे की ओर से जारी ट्वीट
और यह उस गाड़ी के बुकिंग की ताज़ा स्थिति….
दो दिन पहले जारी हुवा था पश्चिम रेलवे की ओर से परिपत्रक
दरअसल गड़बड़ी कहाँ हुई, यह हम समझाने का प्रयास करते है। यह निम्नलिखित गाड़ी के सम्बंध में जारी किया गया मध्य रेल का परिपत्रक देखिए, स्थिति समझने जे लिए आपको रैक शेयरिंग वाला कैटेगरी का हिस्सा देखना होगा। दरअसल मध्य रेल ने जो पत्रक जारी किया उसमे 19005/06 का रैक शेयरिंग 11127/28 भुसावल कटनी भुसावल एक्सप्रेस से किया गया है। रैक शेयरिंग का चार्ट भी देखते है।
यह है, रैक शेयरिंग चार्ट। इसमे स्पष्ट किया गया है। 08 तारीख को रात 23:10 को 19005 सूरत से निकल 09 को सुबह 7:55 पर भुसावल पहुचेंगी। 09 को ही सुबह 11:10 को भुसावल से 11127 बन कर निकलेगी अगले दिन याने दिनांक 10 को कटनी पहुचेंगी। दिनांक 10 को रात 23:50 को 11128 कटनी से चलेगी और अगले दिन दिनांक 11 को शाम 18:35 को भुसावल पहुचेंगी। भुसावल से वही रैक 19006 भुसावल सूरत एक्सप्रेस बनकर शाम 19:35 को सूरत के लिए रवाना होगा और दिनांक 12 को प्रातः 5:15 को सूरत पहुंचेगा। इस तरह 1 रैक का फेरा होगा और यह गाड़ी प्रतिदिन चलाने कुल 4 रैक लगेंगे।
अब निम्नलिखित पश्चिम रेलवे का परिपत्रक देख लिजिए। उन्होंने 11127/28 से रैक लिंक की बात ही नही की है।
और तो और सबसे बड़ी गड़बड़ 19005/06 एवं 11127/28 इन दोनों गाड़ियोंके डिब्बा संरचना के फर्क की है। 19005/06 में 8 स्लीपर, 7 जनरल द्वितीय श्रेणी और 2 एसएलआर कुल 17 डिब्बे और 11127/28 भुसावल कटनी भुसावल एक्सप्रेस में 3 स्लीपर, 5 द्वितीय श्रेणी सिटिंग, 2 वातानुकूलित थ्री टियर और 2 एसएलआर कुल 12 कोच यह डिब्बा संरचना है। मध्य रेल अपने परिपत्रक में लिखता है, प रे से विनंती है, (डिब्बों की) कमी को पूरा करे। 😢
अब पश्चिम रेल के मुम्बई मण्डल ने 19005/06 इस गाड़ी को ही अनिश्चित काल के लिए रद्द कर दिया जो 08 जून से चलना शुरु करनेवाली थी।
इस बाबूगिरी के खेल में बेचारे रेल यात्री फिर एक बार हार गए है।
भारतीय रेल ने अचानक घोषणा क्या कर दी मेरे दोस्त का मेरी तरफ देखने का नजरिया ही बदल गया। दरअसल अब तक होता यूँ था की मेरे परिवार मे आईआरसीटीसी वेबसाइट की 3 जनों की पंजीकृत आईडी थी और उसके पास अदद एक, बन्दे को महीने मे 4-6 चक्कर गाँव के लगाने पड जाते थे और जब उसकी आईडी का 6 टिकटोंका निर्धारित कोटा समाप्त हो जाता था तो मै ही उसका खिवैया और मै ही उसका तारणहार। “भाई, मेरी एक टिकट बना दे न यार” और बड़े प्यार पुचकार के साथ पेश आना और कृतार्थ वाले भाव रखना, बड़ा मस्त माहौल था। और अब आईआरसीटीसी का कोटा डबल हो रहा है तो बन्दा क्या उसका नेटवर्क भी नॉट रिचेबल हो गया।
दरअसल होता यूँ है, इस्मार्ट वाला मोबाइल तो ‘घर घर मोदी’ की तरह हर हाथ मे ही पहुँच गया है। लेकिन आईआरसीटीसी वाले इतने आसानी से किसी को ‘टच’ थोड़े ही करने देते है? वह क्या गूगल के प्ले स्टोर से ऐप इंस्टाल करने जितना भर थोड़े ही है की ऐप इंस्टाल करे और धड़ाधड़ ‘स्नेक’ वाली गेम घूमने लग जाती है? आईआरसीटीसी के पंजीकरण करने मे बहुतोंके छक्के छूट जाते है। या तो फोन नंबर अटक जाता है या ईमेल आई डी फंस जाती है। ‘कैपचा’ नामक जानी दुश्मन का जिस किसीने भी अविष्कार किया है वह शायद आचार्य शुक्राचार्यजी के गणगोत्र का बेहद करीबी होगा। कैपचा समझने के लिए हमारे ताऊ मैगनीफाइंग ग्लास संभालते है और इस तरह शुक्राचार्य जी आँख फोड़ वेबसाइट के मुख्य मार्ग पर पहुंचा जाता है। पंजीकरण के बैरिकेड से कूदफाँद कर आगे बढ़ भी गए तो बुकिंग के समय फिर कैपचा का भुलभुलैय्या पार करना ही है। आम तौर पर सिर्फ जगह खाली है यह देखना है तो आईआरसीटीसी की वेबसाइट मखखन की तरह चलती है मगर टिकट निकालने की बारी आई तो बड़े नखरे! सिक्योर कनेक्शन ढूँढने या पासवर्ड री चेक नामक अड़ंगे निर्माण हो जाते है। इस ‘सेकंद’ की कीमत तुम क्या जानो बाबू? वाली हालत रहती है। सामने टिकट उपलब्ध दिखती है, बाबू नाम, उम्र, जेंडर बताता है, टिकट की कीमत भी अदा कर देता है मगर ..। मगर फुस्स!! खेल खत्म पैसा हजम अर्थात जगह फुल्ल और पैसा जमा। बैंक खाता खाली वह भी कम्स्कम 4 दिन के लिए।
भाई के पास रोकड़ा तो है लेकिन ई-पेमेंट करने के लिए बैंक खाता ठण्ठनगोपाल। ई-पेमेंट नही तो ई-टिकट भी नही। फिर जाओ पी आर एस पर रेलवे टिकट खिड़की पर या एजेंट के पास। आज तक की आईआरसीटीसी की यह दुश्वारी है और अब जब टिकट बुक करने का कोटा दुगना हुवा है तो पैसा अटकने के चान्स 4 गुने हो गए है और टिकट मिलने के आसार आधे।
हमारे गुरु गणेशजी महाराज कहते है, फोन टेक्नोलॉजी जल्द ही 4 G से बढ़कर 5 G हो रही है टिकट फटाफट बनेंगे मगर रेल ई-टिकटों की माईबाप रेल्वे के सर्वर को कब सुधारेंगी, क्या वह 5 G के साथ दौड़ने वाले होंगे? क्योंकी 4G में भी उनकी चाल बैल से घोड़े की न हो पायी और हम अपेक्षाएं सुपरफास्ट की लगाए है। क्या होगा यह तो आने वाले वक्त मे पता चलेगा, मगर आज की बात निश्चित है, आईआरसीटीसी का कोटा डबल होने से मेरा दोस्त ई-टिकट निकालने की कुश्ती अब खुद लड़ने की सोच रहा है। उसे मेरी बैसाखी आई मीन मेरे आई डी की जरूरत नहीं। भलाई भी खत्म और खुशामत भी गई।
भारतीय रेल की ई-टिकट बुकिंग कम्पनी, IRCTC के वेबसाइट और ऐप पर जो टिकट बुकिंग पर किसी एक यूजर आई डी पर 6 टिकट प्रति माह की मर्यादा थी उसमें ढील देने का निर्णय रेल प्रशासन ने लिया है। यह टिकट बुकिंग की मर्यादा अब 6 की जगह 12 टिकटें प्रति माह होगी। साथ ही यदि यूजर आई डी आधार लिंक्ड हो और ई टिकट में उसी आई डी के आधार सत्यापित यात्री की हो तो ऐसी स्थिति में टिकटोंकी मर्यादा को 12 प्रति माह से बढाकर 24 टिकट प्रति माह कीया जा रहा है।
रेल समयसारणी आखरी बार वर्ष 2019 में छपी थी। आमतौर पर रेल और यात्री का सम्बन्ध इसी समयसारणी से जुड़ता है। यात्री अपनी रेल यात्रा का नियोजन समयसारणी देखकर करता है और फिर उसके आगे टिकट खरीदने या आरक्षण करने की तजवीज़ शुरु होती है।
वर्ष 2019 मे रेल प्रशासन ने अपने वर्षोँपुरानी समयसारणी का रिस्ट्रक्चराइजेशन अर्थात पुनर्गठन करने हेतु देश के सर्वोत्तम अभियांत्रिकी शैक्षणिक संस्थान आईआईटी मुम्बई की मदत ली और इस ZBTT शून्याधारित समयसारणी का अविष्कार हुवा। अब आईआईटी के महानुभावों ने रेल प्रशासन को ZBTT के जो प्रस्ताव दिए है, उसको धरातल पर लाने में बड़ी कसमसाहट हो रही है। एक तरफ उसके फायदे नजर आ रहे है तो दूसरी तरफ बड़ी संख्यामे पीड़ित यात्री। यात्रिओंकी पीड़ा तो समझ आ रही है की अचानक उनके स्टेशनोंपर बरसों रुकनेवाली गाड़ियाँ अब नही रुक रही है। वर्षोंसे चल रही सवारी/एक्सप्रेस गाड़ियाँ रेल विभाग ने चलाना ही बन्द कर दिया है। यात्री बेचारा पूछे तो पूछे किसे, और उससे बड़ी समस्या यह है की उसके प्रश्न का उत्तर दे कौन? आम यात्री की पहुंच स्थानिक रेल कर्मी तक ही होती है, उन को कुछ भी पता नही। स्थानिक अधिकारियों, उच्च पदस्थ मण्डल और क्षेत्रीय अधिकारी तक ऐसे प्रश्नोंपर निरुत्तर है। क्योंकी इस ZBTT के कार्यान्वयन में सबसे बड़ी बाधा रेलवे का पुराना बुनियादी ढांचा और पुराना चल स्टॉक है और जब तक इस क्षेत्र में प्रगति नही होगी तब तक ZBTT का पूर्ण कार्यान्वित होना लगभग नामुमकिन है।
इस ZBTT के प्रस्तावोंने सैंकड़ों गाड़ियाँ रद्द या सवारी से बदलकर एक्सप्रेस में उन्नत करा दी है। सवारी गाड़ियाँ एक्सप्रेस बन जाने से उनके हजारों स्टोपेजेस रद्द कर दिए। विशेष बात तो यह है, की ZBTT जैसे ‘समग्र भारतीय रेल के समयसारणी का पुनर्गठन’ इतने बड़े व्यापक और लाखों, करोड़ों यात्रिओंके ऊपर असर करनेवाले कार्यक्रम के कार्यान्वयन पर कोई परिपत्रक प्रसार माध्यम को नही दिया गया है।ना ही इसके नफा, नुकसान की कोई जाहिर तौर पर चर्चा उपलब्ध है। कुछ परिपत्रक सोशल मीडिया में लीक हुए और रेल संगठन, रेल प्रेमियोंकी उसपर चर्चा, वादविवाद। ZBTT के नाम पर आम यात्रिओंके हाथ मे केवल यही मसौदा उपलब्ध है। ऐसी अवस्था मे परेशान यात्री के समझ मे ZBTT के फायदे गले नही उतरते और वह झट अपनी पुरानी व्यवस्था की मांग करता है। ZBTT में पुरानी ICF कोच वाली सवारी और मेल/एक्सप्रेस गाड़ियोंके बदले तीव्रतम गति वाली मेमू गाड़ियाँ चलाने का प्रस्ताव है, मगर इतनी मेमू गाड़ियोंके रैक रेल प्रशासन के पास उपलब्ध नही है। यह सर्वप्रथम समस्या है। पुराने कोच में गाड़ियाँ चलवा दें तो जब उन डिब्बों पर ‘चलने योग्य नही’ ऐसा ठप्पा लग चुका है तो उसे चलाने की जोख़िम कैसे ली जा सकती है? भला उसको खींचने के लिए लोको, इंजिन भी अब कम होते जा रहे क्योंकी रेल विभाग उच्चतम क्षमता के लोको के निर्माण में व्यस्त हो गयी है।
सोशल मीडिया में ऐसे लगभग सभी क्षेत्रीय रेल के ZBTT प्रस्ताव अस्पष्ट और असम्बद्ध तरीकेसे उपलब्ध है।
देश मे पहले लोको निर्माण के केवल 1, 2 कारखाने थे। वहीं उसका रखरखाव भी करते थे। डिब्बे बनाने के केवल एक ICF इंटीग्रल कोच फ़ेक्टरी पेरंबूर चेन्नई में थी। बाद में कपूरथला में शुरू हुई। अब रायबरेली, लातूर में भी डिब्बा कारखाने ज़ोरोंपर काम पर लगे हुए है। गाड़ियोंको लोको मुक्त करने और तेज गति वाली गाड़ियोंकी मांग हेतु ट्रेन-18 का अविष्कार हुवा जिसे आज हम वन्देभारत के नाम से जानते है। इस वन्देभारत का ही मिनी रूप मेमू गाड़ियाँ है। फर्क है तो कुछ साजसज्ज़ा और वातानुकूलित न होने का है। खैर अब वातानुकूलित मेमू भी देश मे चलने लग गयी है। कुल मिलाकर सारे प्रश्न एक दूसरे की गुत्थियों में उलझे पड़े है जिसके उत्तर को खासा वक्त लगनेवाला है।
इन सारी प्रशासनिक परेशानियों और समस्याओं से आम यात्री को कुछ लेनादेना नही है। उसे केवल यह समझ आता है की उसकी चलती गाड़ी रेलवे ने बन्द करा दी या स्टोपेजेस उड़ा दिया। जब उसे अपनी समस्याओं पर उत्तर नही मिलता तो वह अपना रुख जनप्रतिनिधि की ओर करता है और यह जनप्रतिनिधि रेल प्रशासन को बाध्य कर देते है की वह पुराने स्टोपेजेस प्रायोगिक तत्व पर ही सही मगर तुरन्त शुरू करा दे। हक़ीक़त बताएं तो आश्चर्य नही होना चाहिए की ZBTT के प्रस्तावित कई पड़ाव पुनर्स्थापित किये जा चुके है और कई स्टोपेजेस और भी शुरु होने में है।
सारे शून्याधारित समयसारणी के प्रस्तावों को लागू करने में इतनी दिक्कते है तो उसे अस्थायी रूप में स्थगित रखते हुए कुछ बन्द गाड़ियोंको चलाना और मांग किये जानेवाले स्टोपेजेस को पुनर्बहाल करना यह भी रेल प्रशासन के लिए बहोत टेढी खीर है। इतने बड़े रेल परिचालन में, आवश्यक संसाधनों की अनुपस्थिति में ZBTT को कार्यान्वित करना जितना मुश्किल है उससे कई ज्यादा उसे अब उसे “रोल बैक” करना (जो कतई नही होगा) या स्थगित भी रखना बेहद असम्भव है। इसीलिए हम इस स्थिति को रेल प्रशासन के गले में अटकी हड्डी का उदाहरण देते है।
भारतीय रेल एक ऐसा विभाग है, जिसमे सदा मांगपत्र लगे ही रहते है। हम आरक्षण, आसन व्यवस्था की बात नही कर रहे है वह तो एक पूरा लम्बा विषय बन सकता है, अपितु गाड़ियाँ, स्टोपेजेस की मांग इत्यादि विषय हमारे विचार में है।
आज से कुछ वर्षोँ पूर्व तक, यूँ कहिए की सोशल मीडिया सक्रिय, अतिसक्रिय नही था तब तक यह मांगे केवल स्टोपेजेस या नई गाड़ियोंकी ही होती थी। अब यात्री संगठन और रेल इन्थुएसिस्ट ( यह नई जमात है, इन्थुएसिस्ट का अर्थ है उत्साही) ही मांग करते है और इस कदर करते है की जैसे उनके जन्ममरण का प्रश्न हो, यह मांग पूरी नही होगी तो कोई आसमान ही टूट पड़ेगा, शायद हजारों लोगोंकी रोजीरोटी छीन जाएगी, रोजगार डूब जाएंगे और क्या क्या! 😊
यह अतिउत्साही (?) यात्री आजकल न सिर्फ नई गाड़ियोंकी मांग रखते है बल्कि साथमे उनकी समयसारणी, रैक लिंक इत्यादि भी बनाने मे तत्पर रहते है। फलाने गाड़ी को LHB कर दीजिए, फलाने गाड़ी का रैक शेयरिंग बदल दीजिये, अमुक स्टेशनपर रखरखाव के हेतु शेड बनवा दीजिये। हाँ, आजकल वह “पीट लाइन” की बड़ी मांग की जाती है और बहुतों माँगवादीयोंको 😊☺️ पिटलाइन का अर्थ ही पता नही रहता। बस यह सुना हुवा रहता है, की स्टेशनपर पिटलाइन नही रहने से उसे टर्मिनेटिंग स्टेशन नही बनाया जा सकता है या सीधे शब्दोँ में वहाँसे कोई गाड़ी शुरु नही की जा सकती है।
दरअसल किसी भी रेलवेस्टेशन पर रेल इन्फ्रा के नाम पर कमसे कम दो रेलवे लाइन, स्टेशन बिल्डिंग, प्लेटफॉर्म्स यह मूलभूत सुविधा रहती है। जंक्शन स्टेशन पर इनकी संख्या आवश्यकता के अनुसार बढ़ती है और ट्रेन टर्मिनेटिंग स्टेशनोंपर स्टैबलिंग लाइन, पीट लाइन, स्टैबलिंग यार्ड, मेंटेनेंस शेड इत्यादि सुविधाए बढाई जाती है। यह एक एक इन्फ्रास्ट्रक्चर अर्थात बुनियादी सुविधाओंके न केवल जमीनी जगह बल्कि प्रशिक्षित कर्मी, निधियों के आबंटन की भी आवश्यकता रहती है। स्टैबलिंग लाइन याने जिस गाड़ी का परिचालन पूरा हुवा उसे टर्मिनेटिंग स्टेशन पर पीट लाइन पर रखरखाव के लिए ले जाने हेतु खड़ा किया जाता है। यहाँसे गाड़ी रखरखाव हेतु पीट लाइन जाएगी। स्टैबलिंग यार्ड याने गाड़ी का अस्थायी पार्किंग स्थल। पीट लाइन याने वह जगह जहाँ पर गाडीका सघन रखरखाव किया जाता है। पीट याने गढ्डा, पीट लाइन याने पटरी के बीच एक गढ्डे की व्यवस्था जिसमे लाइट्स भी लगे हो और मेंटेनन्स करनेवाले प्रशिक्षित कर्मचारी उसमे उतर कर गाड़ी की किसी भी समय (राउंड द क्लॉक) सघन जांच कर सके। पीट लाइन के आजूबाजू में पूरी गाड़ी में चढ़ने/उतरने के लिए प्लेटफॉर्म सदृश्य रैम्प बने होते है। लाईट्स की सुविधा होती है।
रेल प्रशासन इन लोगोंकी इस तरह की मांगोंको देखकर चकित रह जाता है। चूंकि पीट लाइन, मेंटेनेंस शेड इत्यादि बुनियादी सुविधाओं का निर्माण सीधी मांग करने जितना सहज नही है। बुनियादी व्यवस्थाके प्रस्ताव उच्चतम अधिकारी किया करते है और निर्णय मंत्रालयाधीन होते है। लेकिन हमें नई गाड़ी चाहिए, गाड़ी नही मिलने की वजह पीट लाइन की अनुपलब्धता है तो पीट लाइन चाहिए और रखरखाव यह वजह है तो मेंटेनेंस शेड बनवा दीजिये। हनुमानजी की पूँछ की तरह एक दूसरे से जुड़ी मांगो की सूची बढ़ती चली जाती है।
आप जानकर चकित रह जाओगे की किसी भी बुनियादी व्यवस्थाके निर्माण के लिए 16 तरह की बेसिक अप्रूवल स्टेजेस है और उनको पार करने के बाद किसी स्टेशनको यह सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है।
मित्रों, यह एक सूची मेरे टेलीग्राम ग्रुप मित्र श्री अभिषेक गोपाल द्वारा प्राप्त हुई है जो सम्भावित सूची है। आशा करता हूँ, आप इसे आखिर तक पढ़ें और अन्त तक होश में ही रहे। ☺️
1) परियोजना शुरू होने से पहले उसकी संकल्पना का अनुमोदन 2) डीपीआर ( डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) की मंजूरी 3) निधि स्वीकृति ( प्रत्येक वित्तीय वर्ष में होता है और ऐसा आनेवाले प्रत्येक वर्ष में भी करना पड़ता है।) 4) सभी हितधारकों द्वारा ड्राइंग/डिजाइन का अनुमोदन 5) पर्यावरण मंजूरी 6) स्थानीय निकाय की मंजूरी (राज्यों के आधार पर कई हैं) 7) वायु और जल अधिनियम की मंजूरी
इसके बाद शुरू होती है निविदा प्रक्रिया
8) निविदा अनुमोदन 9) निविदा स्वीकृति 10) प्रारंभ अनुमोदन 11) विनिर्देशों की स्वीकृति 12) नमूने अनुमोदन 13) विचलन / भिन्नता अनुमोदन (कार्य करते करते कुछ बदलाव करने पड़े तो)
प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद भी…
14) निर्माण के बाद स्थानीय निकाय की मंजूरी का एक और दौर 15) सौंपना (जो विडंबना है, की लाख मंजूरी/अनुमोदन प्रक्रियाओंसे गुजरने के बाद फिर से किसी से अनुमोदन की आवश्यकता है !!) 16) यदि इन सब से बचने के बाद लागत बढ़ जाती है (जो हमेशा होती है) तो वृद्धि अनुमोदन।
अब आप बता सकते है, की जिन बुनियादी ढांचों की मांगो को बोलने में हमे जरा सा भी वक्त नही लगता, उसे अप्रूव्ह कराने में कितने पापड़ बेलने होते है!
वहीं बात स्टोपेजेस या गाड़ी का विस्तार या नई गाड़ी शुरु करने की पद्धति में भी होता है। प्रत्येक गाड़ी, मालगाड़ी, शंटिंग, रखरखाव इसका एकदम नपातुला कम्प्यूटरीकृत प्रोग्राम सेट किया हुवा रहता है। उठ के यात्री सन्गठन अपनी मांग रख देता है, फलाने स्टेशन पर गाड़ी रुकवा दीजिए और ट्रेन्स शेड्यूल प्रोग्रामिंग में सारी व्यवस्था फिरसे जोड़ना पड़ता है।
कोई कहता है, हमारा नेता ऊपर जाता है और काम कर लाता है। दरअसल यह सारा दबाव का नतीजा है वरन ट्रेन्स शेड्यूल सॉफ्टवेयर में इसकी गुंजाईश बहोत बहोत कम रहती है। किसी भी नई गाड़ियोंके लिए सॉफ्टवेयर उसके अतिरिक्त इन्फ्रास्ट्रक्चर की मांग करता है। इन्फ्रास्ट्रक्चर अर्थात रेल लाइन बढाना, प्लेटफार्म बढाना और वही आपकी ‘पीट लाइन्स’ बढाना इत्यादि मांग रहती है। जब भी नई गाड़ी या स्टोपेजेस की मांग उठी तो रेल अधिकारी इसी सॉफ्टवेयर में झाँक कर उत्तर दे देते है, भाई आपके यहाँ पीट लाइन नही है अतः आपकी मांग पूरी नही हो सकती।
यहॉं हम बिना किसी राजनीति युग का समर्थन करते हुए सहजता से कह सकते है की वर्ष 2014 के बाद रेल इन्फ्रास्ट्रक्चर में बहुत आश्चर्यजनक तेजी से, एक विशेष धोरण के साथ बदलाव लाया गया है। हम स्टेशनोंकी साफसफाई देखते है, स्टेशनोंपर बदले इन्फ्रास्ट्रक्चर में रैम्प, लिफ्ट्स, एस्कलेटर देख सकते है। एक वक्त था की बड़े जंक्शन पर रैम्प की मांग पर पूर्तता हेतु रेल अधिकारी अपनी विवशता बताते थे और आज छोटे छोटे जंक्शन स्टेशनोंपर भी दो-दो FOB पुल, रैम्पस, लिफ्ट, बैटरी चलित कार आदि सुविधाओंका प्रावधान उपलब्ध कराया जा रहा है।
मित्रों, हमारा इतना बड़ा देश और उतनी ही बड़ी जनसंख्या। ऐसे में नई गाड़ियोंकी, स्टोपेजेस की मांग रहना बहुत स्वाभाविक है मगर वही मांग इन्फ्रास्ट्रक्चर की हो तो उसके लिए रेल इंजीनियर्स की अलग फौज रेल विभाग के पास होती है। रेल परिवहन की भी अपनी मर्यादा है। जल या वायु मार्ग के लिए मार्ग निर्माण का प्रश्न ही नही तो सड़क परिवहन के लिए निर्मित सड़क पर सभी तरह के वाहन चल सकते है, लेकिन रेल परिवहन में मार्ग, वाहन सब विशिष्ट, उसके चालक, रखरखाव प्रत्येक मद विशिष्ट ही है। रेल के अलावा किसी भी अन्य वाहन के लिए रेल इन्फ्रास्ट्रक्चर का कोई उपयोग नही। बनने के बाद भी वाहन उपलब्ध कराना, प्रशिक्षित कर्मियोंकी लाइन खड़ी करनी पड़ती है और यही बात सड़क इन्फ्रास्ट्रक्चर को रेल इन्फ्रास्ट्रक्चर के ऊपर रखती है की जिसके निर्माण के साथ ही लोग अपने वाहन दौड़ाना शुरु कर देते है। खैर, आज बस इतना ही!
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