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भारतीय रेलवे प्रगति की ओर अग्रेसर

आप को यह बातें जानकर हैरानी होगी और भारतीय रेलवे पर गर्व भी होगा की रेल प्रशासन न सिर्फ यात्री सुविधा बल्कि पर्यावरण के प्रति भी अपना उत्तरदायीत्व बखूबी निभा रहा है।

भारतीय रेलवे 2030 तक “हरित रेलवे” बनने के मिशन मोड पर (शून्य कार्बन उत्सर्जन)

रेल मंत्रालय ने 2030 तक भारतीय रेलवे को पूरी तरह हरित ऊर्जा से संचालित करने का लक्ष्‍य निर्धारित करने के साथ, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में कई बड़ी पहल की है। रेलवे विद्युतीकरण, लोकोमोटिव और ट्रेनों की ऊर्जा दक्षता में सुधार के साथ स्थाई उपकरणों और प्रतिष्ठानों/स्टेशनों के लिए हरित प्रमाणन हासिल करने, डिब्बों में जैव शौचालय बनाए जाने तथा अपनी ऊर्जा जरुरतों के लिए नवीकरणीय स्रोतों पर निर्भरता तथा शून्य कार्बन उत्सर्जन को प्राप्त करना इस रणनीति का हिस्‍सा है।

दिसंबर 2023 तक सभी ब्रॉड गेज मार्गों का होगा विद्युतीकरण

भारतीय रेलवे ने 40,000 से अधिक (रूट किलोमीटर) (व्‍यस्‍त मार्गों में से 63%) का विद्युतीकरण पूरा कर लिया है, जिसमें 2014-20 के दौरान 18,605 किलोमीटर मार्ग का विद्युतीकरण कार्य किया गया है। इससे पहले, 2009-14 की अवधि के दौरान केवल 3,835 किमी मार्ग का विद्युतीकरण पूरा हुआ था। भारतीय रेलवे ने वर्ष 2020-21 के लिए 7000 किलोमीटर मार्ग के विद्युतीकरण का लक्ष्य तय किया है। व्‍यस्‍त नेटवर्क के सभी मार्गों के दिसंबर 2023 तक विद्युतीकरण करने की योजना बनाई गई है। भारतीय रेलवे आखिरी मील संपर्क और परस्‍पर न जुड़ पाए मार्गों के विद्युतीकरण पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। इसे ध्यान में रखते हुए कोविड अवधि के दौरान 365 किमी प्रमुख मार्गो का काम पूरा किया गया।

कोविड के समय में 365 किमी प्रमुख संपर्क रेल मार्ग का कार्य पूरा किया गया

कोविड की अवधि में मुंबई-हावड़ा के कटनी-सतना खंड (99 आरकेएम) को इलाहाबाद के माध्यम से हावड़ा के लिए वैकल्पिक मार्ग प्रदान किया गया है। इसी तरह इंदौर-गुना-बीना मार्ग पर पचोर-मक्सी (88 आरकेएम) खंड पर मक्‍सी-भोपाल-बीना के लिए एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान किया गया है। हावड़ा/सियालदह-एसवीडी कटरा पर पटना मार्ग के माध्यम से, भागलपुर-शिवनारायणपुर (45 आरकेएम) अनुभाग चालू किया गया है। करियाकल बंदरगाह को तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कोयले, उर्वरक और इस्पात संयंत्रों से जोड़ने वाले मार्ग पर, तिरुवरूर-कराइकल बंदरगाह (46 आरकेएम) खंड को इरोड, कोयम्बटूर और पालघाट के लिए बंदरगाह से जोड़ने की संपर्क लाइन बनाई गई है।

900 स्टेशनों सहित विभिन्न इमारतों की छतों पर 100 मेगावाट क्षमता वाले सौर पैनल लगाए गए हैं; 400 मेगावाट निष्पादन के विभिन्न चरणों में हैं।

भारतीय रेलवे ने सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए भी कई पहल की है। यह रूफ टॉप सोलर पैनल (डेवलपर मॉडल) के माध्यम से 500 मेगा वाट (एमडब्‍ल्‍यू्) ऊर्जा क्षमता का दोहन करने के लिए काम कर रहा है। अब तक, 900 स्टेशनों सहित विभिन्न इमारतों की छतों पर 100 मेगा वाट क्षमता वाले सौर संयंत्र लगाए गए हैं। 400 मेगावाट की संयुक्त क्षमता वाले सौर संयंत्र निष्पादन के विभिन्न चरणों में हैं। इनमें से 245 मेगावाट क्षमता वाले सौर संयंत्रों के लिए निविदाएं जारी कर दी गई हैं। दिसंबर 2022 तक इन संयंत्रों को पूरा करने का लक्ष्य तय किया गया है।

भारतीय रेलवे के पास 20 गीगावॉट क्षमता वाले सौर संयंत्र स्थापित करने के लिए 51,000 हेक्टेयर भूमि है।      

इसके अलावा, भारतीय रेलवे अपनी जमीन पर भी सौर संयंत्र लगाने की कोशिश में है।  भारतीय भारतीय रेलवे के पास 20 गीगावॉट क्षमता वाले सौर संयंत्र स्थापित करने के लिए 51,000 हेक्टेयर भूमि है। इन संयंत्रों से उत्पन्न होने वाली बिजली की केंद्र/राज्यों के ग्रिडों या सीधे 25 केवी एसी कर्षण प्रणाली को आपूर्ति की जाएगी । रेलवे एनर्जी मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड भारतीय रेलवे की एक संयुक्त उपक्रम कंपनी है जिसमें रेलवे की (49%) और राइट्स लिमिटेड की (51%) हिस्‍सेदारी है। इस कंपनी को रेलवे की जमीन पर लगाए जाने वाले सौर संयंत्रो का काम देखने की जिम्‍मेदारी दी गई है।

भेल के सहयोग से बीना में 1.7 मेगावाट क्षमता वाला संयत्र स्‍थापित किया जा चुका है।    

भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) के सहयोग से बीना (मध्य प्रदेश) में 1.7 मेगावाट की ऐसी एक परियोजना पहले ही स्थापित की जा चुकी है और वर्तमान में व्यापक परीक्षण की प्रक्रिया में है। यह दुनिया में अपनी तरह की पहली सौर परियोजना है। इसका उध्धटन हाल ही में माननीय प्रधानमंत्री जी ने किया।

पवन ऊर्जा क्षेत्र में, 103 मेगावाट क्षमता वाले बिजली संयंत्र पहले ही चालू हो चुके हैं; अगले 2 वर्षों में तमिलनाडु, गुजरात, राजस्थान और कर्नाटक में 200 मेगावाट क्षमता वाले पवन ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की योजना है।    

शुरुआती स्‍तर पर भूमि आधारित सौर परियोजनाओं के लिए, भारतीय रेलवे ने तीन चरणों में 3 गीगा वाट क्षमता वाली सौर परियोजना शुरू की है। पहले चरण में ओपन एक्सेस राज्यों के लिए रेलवे भूखंडों में 1.6 गीगा वाट क्षमता के लिए 29 अप्रैल 2020 को डेवलपर मॉडल के तहत निविदा जारी की गई है। द्वितीय चरण में, रेलवे प्लॉटों में 400 मेगावाट क्षमता को आरईएमसीएल  के स्वामित्व मॉडल के तहत बिना खुली पहुंच वाले राज्यों के लिए विकसित किया जाएगा। इसके लिए 16 जून 2020 को निविदा जारी की गई है। तीसरे चरण में रेलवे की भूमि पर डेवलपर मॉडल के तहत पटरियों के साथ-साथ खुली पहुंच वाले राज्यों के लिए ट्रैक स्थापित किए जाएंगे, जिसके लिए 1 जुलाई 2020 को निविदा जारी की गई है।

पवन ऊर्जा क्षेत्र में, 103 मेगावाट पवन आधारित बिजली संयंत्रों को पहले ही चालू कर दिया गया है। इनमें 26 मेगावाट क्षमता वाली परियोजना राजस्थान के जैसलमेर में, 21 मेगावाट क्षमता वाली परियोजना तमिलनाडु में और 56.4 मेगावाट क्षमता वाली परियोजना महाराष्ट्र के सांगली में है। भारतीय रेलवे ने तमिलनाडु, गुजरात, राजस्थान और कर्नाटक में अगले 2 वर्षों में 200 मेगावाट क्षमता वाले पवन ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की भी योजना बनाई है।

भवनों और स्‍टेशनों पर प्रकाश की व्‍यवस्‍था के लिए 100 प्रतिशत एलईडी बल्‍बों का उपयोग करन की व्‍यवस्‍था 

जलवायु परिवर्तन में अपनी भूमिका का एहसास करते हुए भारतीय रेलवे ने इमारतों और स्टेशनों में एलईडी बल्‍बों के जरिए 100 फीसदी प्रकाश करने जैसी हरित पहल शुरू की है। भारतीय रेलवे ने सीआईआईआई से अपनी 7 प्रोडक्शन यूनिट्स, 39 वर्कशॉप, 6 डीजल शेड और 1 स्टोर्स डिपो के लिए हरित प्रमाण पत्र भी हासिल कर लिया है। 14 रेलवे स्टेशनों और 21 अन्य भवनों/परिसरों को भी हरित ऊर्जा वाले भवनों के रूप में प्रमाणित किया गया है। इसके अलावा 215 स्टेशनों को पर्यावरण प्रबंधन प्रणाली (ईएमएस)/आईएसओ 14001 के साथ प्रमाणित किया गया है।

कुल 505 जोड़ी ट्रेनों में हेड ऑन जेनरेशन तकनीक का इस्‍तेमाल किया गया है जिससे प्रतिवर्ष लगभग 450 करोड़ रूपए के 70 मिलियन लीटर डीजल की बचत हो रही है।     

कुल 505 जोड़ी ट्रेनों में हेड ऑन जेनरेशन तकनीक का इस्‍तेमाल किया गया है। इससे प्रति वर्ष लगभग 70 मिलियन लीटर डीजल/ 450 करोड़ रुपये की बचत की संभावना है। रेलवे ने इसके अलावा अपनी सभी 8 उत्पादन इकाइयों और 12 कार्यशालाओं में ऊर्जा दक्षता हासिल करने के लिए सीआईआई के साथ करार के तहत पूरा किया है जिसके परिणामस्वरूप ऊर्जा दक्षता में 15 प्रतिशत सुधार हुआ है।

रेलगाडि़यों के कुल 69,000 यात्री डिब्‍बों में 2,44,000 जैव-शौचालय बनाए गए हैं।    

हरित पहल के तहत भारतीय रेलवे ने अपनी रेलगाडि़यों के कुल 69,000 डिब्‍बों में 2,44,000 से अधिक जैव-शौचालय लगाए हैं।

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भारतीय रेलवे ने पहली बार सामान से भरी विशेष पार्सल रेलगाड़ी को बांग्लादेश भेजा

रेड्डीपलेम (गुंटूर) से सूखी मिर्च को बेनापोल (बांग्लादेश) भेजा गया

भारतीय रेलवे ने पहली बार देश की सीमा से परे बांग्लादेश के बेनापोल के लिए आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के रेड्डीपलेम से सूखी मिर्च की एक विशेष मालगाड़ी से ढुलाई की।

आंध्र प्रदेश के गुंटूर और इसके आस-पास के इलाके मिर्च की खेती के लिए प्रसिद्ध हैं। अपने स्वाद और ब्रांड में विशिष्टता के लिए इस कृषि उपज की गुणवत्ता को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता है। इससे पहले, गुंटूर तथा आसपास के क्षेत्र के किसान और व्यापारी कम मात्रा में सूखी मिर्च सड़क मार्ग से बांग्लादेश ले जाते रहे हैं और इस पर लागत लगभग 7000 रुपये प्रति टन आती है। लॉकडाउन अवधि के दौरान, वे सड़क मार्ग से इस आवश्यक वस्तु को नहीं ले जा सके। तब रेलवे कर्मचारियों और अधिकारियों ने मिर्च ले जाने वालों से सम्पर्क किया और रेल से माल ले जाने की सुविधाओं के बारे में विस्तार से समझाया। तदनुसार, वे मालगाड़ियों के माध्यम से थोक में सूखी मिर्च को ले गए। लेकिन, मालगाड़ी से सामान भेजने के लिए किसानों और व्यापारियों को अधिक मात्रा यानी प्रत्येक खेप में कम से कम 1500 टन से अधिक माल का इंतज़ाम करना आवश्यक होगा।  

इस समस्या को कम करने के लिए और रेल उपयोगकर्ताओं को कम मात्रा यानी प्रत्येक खेप में अधिकतम 500 टन तक का माल भेजने की सुविधा देने के लिए दक्षिण मध्य रेलवे के गुंटूर डिवीजन ने पहल की और विशेष पार्सल एक्सप्रेस को बांग्लादेश के लिए रवाना किया। इससे गुंटूर के किसानों और व्यापारियों को विशेष पार्सल एक्सप्रेस के माध्यम से थोड़ी मात्रा में सूखी मिर्च का परिवहन करके देश की सीमा से बाहर अपने कृषि उत्पाद का विपणन करने में मदद मिली है।

तदनुसार, 16 पार्सल वैन से युक्त एक विशेष पार्सल एक्सप्रेस मालगाड़ी बांग्लादेश के बेनापोल गई। प्रत्येक पार्सल वैन को सूखी मिर्च की 466 बोरियों से भरा गया था, जिसका वजन लगभग 19.9 टन था और इस प्रकार विशेष पार्सल एक्सप्रेस मालगाड़ी द्वारा कुल 384 टन वजन का सामान ले जाया गया। विशेष पार्सल एक्सप्रेस द्वारा माल ले जाने की लागत प्रति टन 4,608 रुपये आई जो सड़क परिवहन के 7,000 रुपये प्रति टन की तुलना में बहुत सस्ती और किफायती है।

यह गौर करने वाली बात है कि भारतीय रेलवे ने कोविड अवधि के दौरान पार्सल ट्रेन यातायात को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं।

छोटे पार्सल आकारों में चिकित्सा आपूर्ति, चिकित्सा उपकरण, भोजन इत्यादि जैसी आवश्यक वस्तुओं का परिवहन बहुत ही महत्वपूर्ण है जो व्यवसाय के साथ-साथ उपभोग के लिए भी आवश्यक है। इस महत्वपूर्ण आवश्यकता की पूर्ति के लिए भारतीय रेल ने ई-कॉमर्स संस्थाओं और राज्य सरकारों सहित अन्य ग्राहकों द्वारा त्वरित परिवहन के लिए रेलवे पार्सल वैन उपलब्ध कराए हैं। रेलवे आवश्यक वस्तुओं की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए चुनिंदा मार्गों पर तय समय पर चलने वाली विशेष पार्सल गाड़ियां चला रहा है।

भारतीय रेलवे ने 22 मार्च 2020 से 11 जुलाई 2020 तक कुल 4434 पार्सल गाड़ियां चलाई जिनमें 4304 गाड़ियां समयबद्ध तरीके से चलने वाली हैं।

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‘पुट द स्माईल बैक’

रेलवे हम भारतियोंकी “नॅशनल ट्रांसपोर्टर” है। हमारे देश मे यातायात के लिए रेल को अद्यतन क्रम दिया जाता है। सड़क परिवहन से तेज, किफायती और आरामदायक। देश के कोने कोने तक अपनी पहुंच बनाए रखनेवाला हमारा सच्चा राष्ट्रीय परिवहन।

जब भी कोई आपदा, संकट खड़ा हो, युद्ध जन्य स्थितियाँ हो तो रेलवे अपने दल बल के साथ एक योद्धा की तरह जुट जाती है। इस संक्रमण के लॉक डाउन काल मे रेलवे हजारों टन माल की सप्लाई अलग अलग जगहोंपर की। हमारे श्रमिक भाइयोंको उनके गांव, घर पोहोंचने जैसे ही जरूरत हो गाड़ियाँ छोड़ते चले गए। श्रमिकोंको न सर्फ रेल में यात्रा करने की सुविधा थी बल्कि उनके खानपान का उचित प्रबन्धन भी रेल प्रशासन ने बखूबिसे निभाया। इतनी सारी व्यवस्थामे श्रमिकोंके बालगोपालोंको कैसे भुला जा सकता था?

दक्षिण पश्चिम रेलवे के बेंगालुरु डिवीजन से श्रमिक ट्रेनों में यात्रा करने वाले सैकड़ों बच्चों के चेहरोंपर मुस्कान खिलती रहनी चाहिए इसलिए उन्हें इस इलाके के प्रसिद्ध चनापट्टन खिलौने दे रहा है। ये खिलौने अशोक कुमार वर्मा, बेंगलुरू डिवीजन @drmsbc https://t.co/klw4b1WirA के मंडल प्रबंधक अशोक कुमार वर्मा द्वारा शुरू की गई “पुट द स्माइल बैक” पहल के तहत वितरित किए गए थे।

कुछ खिलौनोंकी तस्वीरें amazon.in के सौजन्य से
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इन्दौर खजुराहो एक्सप्रेस का प्रयागराज – डॉ. आम्बेडकर नगर महू ऐसे विस्तार किया जाएगा।

रेल जनसंपर्क कार्यालय, इंदौर द्वारा प्राप्त प्रेस विज्ञप्ति में खजुराहो-इंदौर एक्सप्रेस का खजुराहों से आगे प्रयागराज एवं इन्दौर से आगे डॉ. अम्बेडकर नगर तक विस्तार किया जा रहा है।

पश्चिम रेलवे रतलाम मंडल के इंदौर से खजुराहो के मध्य चलने वाली गाड़ी संख्या 19664/19663 खजुराहो-इंदौर-खजुराहो एक्सप्रेस का एक ओर प्रयागराज एवं दूसरी ओर डॉ अम्बेडकर नगर तक विस्तार किया गया है तथा यह ट्रेन सप्ताह में चार दिन नए नम्बर 14116/14115 प्रयागराज-डॉ अम्बेडकर नगर-प्रयागराज एक्सप्रेस के रूप में चलेगी।

इसकी जानकारी देते हुए मंडल रेल प्रवक्ता ने बताया कि उत्तर मध्य रेलवे द्वारा यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए गाड़ी संख्या 19664/19663 खजुराहो-इंदौर-खजुराहो एक्सप्रेस एक ओर प्रयागराज तथा दूसरी ओर डॉ अम्बेडकर नगर तक विस्तार दिया गया है। अब यह नई गाड़ी संख्या 14116/14115 प्रयागराज-डॉ अम्बेडकर नगर-प्रयागराज एक्सप्रेस के नाम से सप्ताह में चार दिन चलेगी।

वर्तमान में सभी नियमित गाड़ियों का परिचालन बंद है तथा जैसे ही नियमित रूप से गाड़ियों का परिचालन आरंभ होगा इस ट्रेन के फेरे शुरू हो जाएंगे। इसके आरंभ होने से यात्रियों को इंदौर एवं उज्जैन से प्रयागराज जाने के लिए एक नई गाड़ी मिल जाएगी।

गाड़ी संख्या 14116 प्रयागराज-डॉ अम्बेडकर नगर एक्सप्रेस प्रति मंगलवार, शुक्रवार, शनिवार एवं रविवार को 15.20 बजे प्रयागराज से चलकर रतलाम मंडल के उज्जैन (07.20/07.30), फतेहाबाद(08.08/08.10), इंदौर(08.50/09.00) होते हुए गाड़ी चलने के दूसरे दिन09.45 बजे डॉ अम्बेडकर नगर पहुँचेगी। इसी प्रकार गाड़ी संख्या 14115 डॉ अम्बेडकर नगर प्रयागराज एक्सप्रेस प्रति सोमवार, बुधवार, शनिवार एवं रविवार को डॉ अम्बेडकर नगर से 11.15 बजे चलकर इंदौर(11.50/12.00), फतेहाबाद(12.50/12.52) उज्जैन(13.25/13.35) होते हुए दूसरे दिन 06.00 बजे प्रयागराज पहुँचेगी।

इस ट्रेन का दोनो दिशाओं में इंदौर, फतेहाबाद, उज्जैन, संत हिरदाराम नगर, सांची, विदिशा, बीना, ललितपुर जं, टिकमगढ़, खरगापुर, छतरपुर, खजुराहो, महोबा जं., बाँदा, चित्रकूटधाम कर्वी, मानिकपुर जं., शंकरगढ़ एवं नैनी स्टेशनों पर ठहराव दिया गया है।

इस ट्रेन में एक सेकेंड एसी, चार थर्ड एसी, सात स्लीपर एवं चार सामान्य श्रेणी के कोच रहेंगे।

समय का विस्तारपूर्वक परीपत्रक :-

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ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग होनी चाहिए या नही इस पर डिबेट।

अब तक हमारे सभी पाठक, ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग क्या होती है यह अच्छी तरह समझ गए होंगे। रेल प्रशासन इसे आने वाले नए टाइमटेबल से लागू करने जा रही है। हमारे कुछ पाठकगण इस ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग के प्रति साशंकित है, किसी को यह खिलवाड़ लगता है तो कोई बहोत उत्साहीत है। हमने सोचा, झीरो बेस टाइमटेबलिंग होनी चाहिए या नही इस पर एक डिबेट ले कर दोनों मुद्दे सामने रखते है, फिर आप लोग जो निर्णय ले।

ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग का सीधा मतलब है कि पुरानी सारी ट्रेनें, उनके शेड्यूल को भुलाकर, वैनिश कर नए सिरे से एक एक गाड़ी का शेड्यूल बनाना और पूरे टाइमटेबल की रचना करना। ऐसे में रेल प्रशासन ने अपने तेज गति वाले टाइमटेबल में सबसे बड़ी बाधा निर्माण करने वाली पैसेंजर ट्रेनों को एक्सप्रेस में कन्वर्ट करने का एक आसान सा उपाय ढूंढ लिया। पैसेंजर को एक्सप्रेस में कन्वर्ट करना याने उसका स्पीड बढ़ना और स्पीड बढ़ने के लिए स्टापेजेस कम करना। अब आप बताइए क्या यह उन छोटे छोटे स्टेशनोंके यात्रिओंके साथ सीधी नाइन्साफ़ी, अन्याय नही है? और यदि स्टापेजेस बन्द किए बिना यह गाड़ियाँ उसी तरह चलती रही तो उनमें बैठे यात्रिओंके साथ एक्सप्रेस के किराए वसूल करना यह भी तो अन्याय ही है।

दूसरा पैसेंजर को कन्वर्ट करना समझ आया लेकिन उन सदाबहार एक्सप्रेस और लिंक एक्सप्रेस गाड़ियोंका क्या जीन्हें बन्द, शार्ट टर्मिनेट या डाईवर्ट किया जा रहा है? 19019/20 बांद्रा देहरादून एक्सप्रेस गाड़ी को मुख्य मार्ग से हटाकर रतलाम, चित्तोड़गढ़, कोटा होकर चलाने पर बात अड़ी है। यह गाड़ी रतलाम से कोटा के बीच 220-30 किलोमीटर के लिए करीबन 7 घंटे का वक्त लेती है और 19 स्टेशनोंपर रुकती है। बिल्कुल फुल्ली ऑक्युपाई रहती है यह ट्रेन। उसी प्रकार इंदौर – उज्जैन – जयपुर लिंक बन्द की जा रही है। इंदौर से जयपुर और वापसी के लिए यह लिंक एक्सप्रेस बेहद लोकप्रिय है। बड़े राजनेता इस गाड़ी के बन्द किए जाने पर नाराज है।

यह तो 18 क्षेत्रीय रेलवे में कुछेक क्षेत्र के मिनिट्स आने पर के हाल है, यदि बाकी क्षेत्रीय रेलवे के भी परीपत्रक इसी अंदाज में आएंगे तो इस ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग की शुरुवात कौनसे सिरे से करनी पड़ेगी इसका पता नही।

ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग के लिए इस तरह के विरोध के सुर गूँज रहे है तो दूसरी तरफ प्रशासन अपनी बात पर अड़ी है और अपने सारे भविष्य के प्लानिंग की बातें करती है जो इसी ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग से जुड़ी है।

ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग के फेवर के मुद्दे भी बताते है। जब लगभग 3 महीने से यात्री गाड़ियाँ न के बराबर चल रही है तो ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग के लिए इससे बेहतर वक्त कोई दूसरा हो ही नही सकता। आप भूल जाइए की 19019/20 या अनेकों लिंक एक्सप्रेस ऐसी कोई गाड़ियाँ चल रही थी। जब सिरे से टाइमटेबलिंग होंगी तो ढेरों तेज और आरामदायक, सुविधाजनक समयोंके साथ यह गाड़ियाँ अवतरित होंगी। आज गाड़ियाँ नही चल रही है तो यात्री किसी ओर स्टेशनोंसे गाड़ियोंकी सेवा ले ही रहे है न? छोटे स्टेशनोंके यात्री किसी आस पास के जंक्शन से गाड़ी पकड़ या छोड़ ही रहे है न? यदि लम्बी दूरी की गाड़ियाँ उदाहरण के लिए वहीं बांद्रा देहरादून एक्सप्रेस लीजिए 1698 किलोमीटर के इस लंबे स्पैन में 98 स्टापेजेस याने एवरेज हर 17-18 किलोमीटर पर स्टापेजेस। यह कोई एक्सप्रेस गाड़ी है? इंदौर जयपुर लिंक लीजिए इंदौर पैसेंजर के 5-6 डिब्बे, भोपाल जयपुर एक्सप्रेस में उज्जैन में जुड़ते है। याने उज्जैन में 30 से 40 मिनिट का स्टॉपेज, दो लाइनें शंटिंग के लिए ब्लॉक, दोनोंमेंसे कोई गाड़ी विलम्बित हों तो दूसरी के लिए इतन्जार याने और देरी। यह लिंक एक्सप्रेस की व्यथा है। ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग में यह सब हटा कर के नई पुनर्रचना में डायरेक्ट गाड़ियाँ मिलेगी। छोटे स्टेशनोंके लिए इंटरसिटी, मेमू, डेमू गाड़ियाँ मिलेगी।

200-300 किलोमीटर के लिए कोई गाड़ी 3.5, 4 घंटे लगा रही है तो कोई एक्सप्रेस पैसेंजर को लाज आ जाए ऐसे 7, 7.5 घंटे लगा रही है 15017 लोकमान्य तिलक टर्मिनस गोरखपुर काशी एक्सप्रेस भुसावल से 13.45 को निकल रात 21.05 को इटारसी पोहोंचती है। यह अंतर मात्र 307 किलोमीटर का है। क्या आपको नही लगता बरसोंसे इसी समय से चलने वाली गाड़ियोंमे सुधार की जरूरत है? ब्रिटीशोंके कालसे आ रही इस तरह के टाइमटेबलिंग की पुनर्रचना किया जाना एकदम उचित कदम है।

हमारा यह मानना है ज़ीरो बेस टाइमटेबलिंग अवश्य होना चाहिए। परिवर्तन यह प्रकृति का नियम है। गाड़ियाँ बन्द करना, मार्ग बदलना, पैसेंजर को एक्सप्रेस में तब्दील करना या शार्ट टर्मिनेट करना यह सब इन नए सिरे से टाइमटेबल बनाने के शुरवाती झटके है। रेल प्रशासन ने यात्रिओंको इत्मीनान, भरोसा दिलाना चाहिए कि बदलाव यात्रिओंके जरूरत के हिसाब से भी होते रहेंगे। जहाँ गाड़ियोंकी जरूरत होंगी वहाँ पर गाड़ियाँ निश्चित ही शुरू की जा सकती है। फिर वह एक्सप्रेस की जगह मेमू या शटल भी हो सकती है। रोजाना वाली लिंक एक्सप्रेस बन्द हो कर कोई साप्ताहिक या द्विसाप्ताहिक सीधी गाड़ी मिल रही है तो इसमें हैरान ना हो। यदि लिंक वाले स्टेशन का वेटेज ज्यादा होगा तो उनकी गाड़ी की फ्रीक्वेंसी याने फेरे बढ़ाए जा सकते है।