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बस, रेल गाड़ी चलती रहे।

गाड़ियाँ भर भर के कैसे चलती है और भारतीय लोगोंमें टॉलरेन्स, सहनशीलता की चरमसीमा देखना हो तो मुम्बई से उत्तरप्रदेश के बीच चलने वाली किसी भी गाड़ी को देख लीजिए। बारहों महीने, किसी भी ट्रेन में पैर धरने तक की जगह नही होती है। क्या जनरल और क्या स्लिपर सारे के सारे डिब्बे एक समान यात्रिओंसे भरे रहते है।

एक धारणा है, स्लिपर डिब्बेमे केवल आरक्षित यात्री ही बैठते है। नही जी ऐसा बिल्कुल नही है। इन नार्थ बाउंड गाड़ियोंमे आप को स्लिपर डब्बोंमे रिजर्वेशनधारी यात्रिओंके अलावा भी कई प्रकार के यात्री मिलेंगे। जिसका रिजर्वेशन कन्फर्म है वह दिन की यात्रा में अपने अपने नम्बर पर बैठे मिलेंगे, सीजन पास धारी, रोजाना अपडाउन करनेवाले यात्री अप्पर बर्थ और साइड अप्पर बर्थ पर जमे मिलेंगे, जो TTE आने पर उन्हें अपना पास दिखाने के बजाए सलाम दुवा कर अपनी समय काटने के फिराक में रहते है, सर्विस पास वाले अपनी फर्स्ट क्लासकी ट्रैवल अथॉरिटी होने के बावजूद स्लिपर में केवल अपनी पास पर दस्तखत न हो और उसकी वैलिडिटी चलती रहे इसलिए घुसे रहते है। इसके साथ ही उसी गाडीका PRS वेटिंग लिस्ट टिकट वाले यात्री, 100-200 km चलनेवाले सेकन्ड क्लास के यात्री भी इसी आरक्षित डिब्बे में जबरन यात्रा कर रहे होते है।

यह तो हो गए अधिकृत यात्री या यूँ कहिए सेमी अधिकृत यात्री जिनके पास कहने के लिए कुछ तो कागज़ है जो उंन्हे रेलवे में प्रीमैसेस, एरिया में वैलिड करता है, लेकिन खोमचेवाले, चाय और स्टेशनरी बेचने वाले, भीख मांगने वाले, झाड़ू लगाने वाले, जबरन पैसे की उगाही करनेवाले तृतीयपंथी जो पूरी गाड़ीमे ऐसी धाक जमाकर चलते है, जैसे वे ही केवल इन गाड़ियोंमे सफर करने के हकदार है और बाकी यात्री उनके सहयोग और कृपासे चल रहे है। इतनी खचाखच भीड़ से भरे डिब्बों में यह अनाधिकृत विक्रेता इस सफाईसे अपना माल बेचते घूमते है की उनसे टिकट चेकिंग के स्टाफ़ ने भी प्रेरणा लेनी चाहिए जो भीड़ को देखते डिब्बे के पास ही नही पोहोंचते।

अब आप सोचते होंगे, आखिर ऐसा क्यों है, कोई कुछ बोलता क्यों नही, क्या अधिकृत यात्री भी इसपर आपत्ति नही जताते? उसकी वजह है, कई बार तो 6 जनोंके कम्बाइन आरक्षित टिकट में एखाद या दो, तीन यात्री कन्फर्म रहते है और बाकी वेटिंग लिस्ट तो वह भला क्यों करेंगे एक्स्ट्रा यात्रिओंकी कम्प्लेंट? इसी तरह सीजन पास धारी भी बड़े ग्रुप में यात्रा करते है और अपनी धाक जमाते है। अनाधिकृत विक्रेता स्थानिक निवासी रहते है, दूर गांव से चलते यात्री बेचारे उनसे कहां तक उलझेंगे?

कुछ यात्री होते है, जो अपना अधिकार, हक जताते है, स्लिपर में 72-80 अधिकृत यात्रिओंमेंसे कोई एखाद होता है जो ट्विटर पर शिकायत करता है, कार्रवाई भी होती है, उस डिब्बे की भीड़ को पड़ोस के डिब्बे में या आखरी वाले डिब्बे में खदेड़ दिया जाता है या फिर दण्डित किया जाता है, लेकिन शायद ही कभी आपने देखा होगा की सैकड़ो अनाधिकृत यात्रिओंको गाडीसे उतार दिया हो। कोई एक स्लिपर का डिब्बा ही थोड़े होता है गाड़ीमे? जिस डिब्बे से शिकायत आयी है उसमें से बाजू वाले डिब्बे में भीड़ शिफ्ट हो जाती है, अपडाउन वाले थोड़े इधर उधर हो जाते है और गाड़ी चलते रहती है, क्योंकी सबको किसी भी तरहसे अपने अपने गंतव्य पर पोहोंचने की चाहत रहती है।

क्या करें! केवल मज़बूरी और मजबूरी यही मात्र फैक्टर है जो इस पूरी रेल यात्रा में आपको दिखाई देता है।

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दो दशकों बाद पुराने खिलाड़ी उतरे है मैदान में।

नीलगिरी माउंटन रेलवे ने 20 वर्षोंके लंबे अंतराल के बाद आज अपने स्टीम पॉवर को पटरी पर उतारा। मेट्टूपलायम – उदग्मण्डलं छोटी लाइनपर कुन्नूर से ऊटी के लिए यह सफर था।

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क्या रेलवे का आर्थिक ढांचा ख़तरे में है?

वन्देभारत, गतिमान जैसी सेमी हाईस्पीड गाड़ियाँ चलने लगी, कई सारी गाड़ियोंके डिब्बे अत्याधुनिक LHB कोचेस में तब्दील कर लिए गए, पूरे भारत मे रेलवे स्टेशनोंका रूप ऐसे बदल रहा है की ऐसे लगेगा, कहीं आप विदेशोंमें तो नही घूम रहे? किसी ने नही सोचा होगा की छोटे छोटे शहरोंके स्टेशनोंपर भी रैम्प होंगे, लिफ्ट और एस्कलेटर लगेंगे। शारारिकरूपसे अक्षम यात्रिओंके लिए बैटरी चलित गाड़ियाँ चलेगी जो यात्रिओंको रेलवे के आहातेसे ठेठ रेलगाडी के डिब्बेतक पोहोंचा देगी। वातानुकूलित प्रतीक्षालय बनाए जा रहे है। एयरपोर्ट जैसे लॉन्ज, यात्रिकक्ष बनाए जा रहे है।

यह सब तो बहोत जोरदार है, अकल्पनीय है। लेकिन कैग के रिपोर्टस का क्या? रेलवे को सौ रुपैय्या कमाने, साढ़े अठ्ठयन्वे रुपये लागत लग रही है। अब यह बात सभी जानते है की यह नैशनल कैरियर है और पैसा कमाना ही सिर्फ इसका उद्देश्य नही है, देश के नागरिकोंकी सेवा करना कर्तव्य है, कई सबर्बन सेवाएं, सवारी गाड़ियाँ, द्वितीय श्रेणी की टिकटें रेलवे को घाटा लगवा रही है। कर्मचारियोंके वेतनोंपर, पेंशनोंपर अर्जित धन का बड़ा हिस्सा खर्च हो रहा है।

हर चीज अपनी जगहपर सही है। कर्मचारी को सांतवें वेतन आयोग की तहत बम्पर वेतन मिल रहा है। पेंशनर्स की पेंशनें बढ़ी है। रेलवे के बुनियादी सुविधाओंमें जबरदस्त काम चल रहा है। फिर तकलीफ कहाँ है? तकलीफ़ है सब्सिडाइज्ड किरायोंमे। आज भी हर टिकट पर रेलवे लिखती है, आपके किराए का 43 % हिस्सा वहन किया जा रहा है। क्या है यह सब? सबर्बन गाड़ियोंके किराए, सवारी गाड़ियोंके किराए, द्वितीय श्रेणींके मेल एक्सप्रेस के किराए, मंथली सीजन टिकट के किराए यह इतने रियायती क्यों है? आज 25 km की मंथली सीजन पास मात्र 185 रुपए में आती है, याने लगभग 6 रुपया प्रतिदिन और दो फेरे, एक बार जाना और एक बार का आना। केवल 3 रुपए एक फेरे के। जो 185 रुपए में 25 km रोज अपडाउन करता है वह यात्री भी स्टेशनपर अपनी गाड़ी पार्क करनेके 450 रुपये महिनेके देता है। याने उसको खुदको महसूस होता है वह कितने कम पैसे में अपनी रोज की यात्रा कर रहा है। सवारी गाड़ी का किराया 25km के लिए 10 रुपया, 100 km के 25 रुपया, मेल एक्सप्रेस 25km के 30 रुपया, 100 km के लिए 45 रुपया। इन किरायोंकी तुलना आप स्टेट ट्रांसपोर्ट या लोकल ट्रांसपोर्ट से करोगे तो, भाइयों यहांपर 50 पैसेसे भी कम रेट है और जैसे जैसे अंतर बढ़ता है वैसे वैसे यह प्रति किलोमीटर का रेट और घटते चलता है।

दूसरी तकलीफ है, रेलवे के खाली पड़ी लैण्ड, जमीनोंकी। इसका भरपूर कमर्शियल उपयोग किया जा सकता है। न सिर्फ जमीन बल्कि रेलवे विश्रामालयों, प्रतीक्षालयों, फूड स्टॉलोंका भी वाणिज्यिक रूपांतरण शीघ्रतासे होने की जरूरत है। आज भी कई वर्षोंसे रेलवे के बुकस्टालोंका मल्टी फंक्शनल स्टॉलोंमें रूपांतरण लटका पड़ा है। माना की IRCTC और RLDA इसमें काम कर रही है लेकिन इसमें भी तेजी लाने की जरूरत है। आज BSNL का उदाहरण सामने है, बड़े बड़े दफ्तर, बड़ी सरकारी जमीनें, ढेरों कर्मचारिओंकी के चलते यह कम्पनी अपने आप की हाथी जैसी आवाढव्यता से बेहाल हो चुकी है।

आगे सुनने में आ रहा है, रेलवे अपने किरायोंमे 1 फरवरी से 5 पैसे से लेकर 40 पैसे तक की किरायोंमे वृद्धि करने जा रही है, जिसमे मिनिमम किरायोंका क्या रेट रहेगा इसका विवरण नही है, रेलवे कर्मचारिओंकी सेवा सुविधा पास का डिजिटलाइजेशन होने जा रहा है, ताकी केवल एक पास का एक ही बार उपयोग हो। यह तो ठीक है लेकिन जेबोंमे यूनियन का कार्ड फँसाकर, अपने आप को जबरन रेल कर्मचारी साबित करते कई बन्दे मुफ़्त में रेलोंमें यहाँ वहाँ घूमते है। जहाँ 20 वेंडरोंकी पास होती है वहाँ प्लेटफॉर्मोंपर 50-60 बन्दे धंदा करते मिल जाएंगे। इस तरह रेलवे के राजस्व में छेद करने वाले कई प्रकार दिखाई देते है।

यह तो सिर्फ कमर्शियल विभाग है, इसके अलावा रेलवे में कई विभाग है जो अपने विभागोंमें रेलवे के राजस्व का शोषण कर अपना जीवन सीधा कर रहे है। इन सब पर नकैल कसने, लगाम लगाने की सख्त जरूरत है। गौरतलब यह है की यज्ञपि सिर्फ मुनाफ़ा कमाने के खातिर नही लेकिन अस्तित्व सदा रखने के लिए तो सजग रहना, सुधारणाए करना बेहद जरूरी है।