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कन्फर्म रिजर्वेशन में अपने जगहपर दूसरे को भेजना।

“सुखीरामजी, घर पर हो क्या? बड़ी मुसीबत आन पड़ी है।” रमेशजी फोनपर थे।

” लाला, मुसीबत आती तभी याद आ रही न? ऐसे भी याद कर लिया करो, हम तो रिटायर्ड लोग है। घर पर ही रहते है। कभी भी आ जाओ, चाहे तो अभी मिल लो।” सुखीरामजी ने जवाब दिया।

रमेशजी का किराने का होलसेल व्यापार था। दो बेटे, चार बेटीयाँ, नाती पोते सब थे। एक बेटा उनके साथ व्यापार में था, दूसरा मुम्बई में जॉब करता था। बच्चे बाहर पढ़ने अलग अलग शहरोंमें और बेटियाँ अपने ससुराल। सबका जाना आना लगा रहता। छोटे बड़े, यहाँतक की उनके सभी रिश्तेदार, मित्र उन्हें लालाजी ही बोलते थे।

“बताइए, कौनसी मुसीबत आन पड़ी, लालाजी।”
रमेशजी, सुखीरामजी के घर पहुंच गए थे।

” अरे सुखीरामजी, बेटे और बहू का, रिजर्वेशन 2 महिनेसे बना रखा है। कन्फर्म है, और अब बेटे का जाना नहीं हो रहा है। बहु के साथ नातिन जाने को तैयार है। लेक़ीन रिजर्वेशन उपलब्ध नही है। तत्काल लेंगे तो बहु का कहीं तो नातिन का कही रिज़र्वेशन आएगा। आपको यही पूछने आया हूँ, क्या दोनोंके टिकट कैंसिल करके फ्रेश तत्काल कर लूँ? क्या इतनी भीड़ के चलते मिल पाऐंगे कन्फर्म? कोई कह रहा था, *चेंज ऑफ नेम* करा लो, यह क्या और कैसे कराना है?

हाँ। बिल्कुल सही है लालाजी, चेंज ऑफ नेम करा सकते है। देखते है, इसके नियम में अपना टिकट बैठता है या नही।

यह सुविधा केवल कन्फर्म टिकटोंमे ही उपलब्ध हैं।

केवल फैमिली मेंबर्स के दरम्यान ही टिकट ट्रान्सफर हो सकता हैं।

गाड़ी छूटने के निर्धारित समयसे 24 घंटे पहले CRS चीफ रिज़र्वेशन सुपरिटेंडेंट को, रिजर्वेशन ऑफिस में, लिखित रूपसे अर्जी करनी होगी।

अर्जी में, नही जा पाने का उचित कारण, टिकट का PNR नम्बर, जानेवाले नए यात्री का नाम, उम्र, लिंग, नही जाने वाले के साथ का रिश्ता यह लिखना होगा।

उपरोक्त अर्जी के साथ, टिकट की कॉपी, जानेवाले यात्री और नहीं जानेवाले यात्री, दोनोंके फोटो पहचान पत्र की ओरिजिनल और फोटोकॉपी, दोनोंमें खून का रिश्ता होने का सबूत देनेवाले कागजात की कॉपी, इसमें राशनकार्ड या बैक पासबुक जिसमे दोनोंके नाम हो, आ सकते है।

यह सब कागजात, दो सेट में ले के, CRS से अप्रूव्ह होने के बाद, वह आप को उनके फॉरमेट में एक पत्र देगा, जिसमे सभी विवरण लिखा होगा और उसके दस्तख़त, ऑफिस का ठप्पा लगा रहेगा। यह पत्र आपको रिजर्वेशन काउंटर पर देना होगा, वहाँ का बाबू आपको टिकट में जो चेंजेस करने है, जैसे नाम, उम्र, लिंग और सभी जरूरी कार्य कम्प्यूटर में करके आपकी कॉपी पर लिख कर दे देगा।

यह दस्तखत और ठप्पे वाली कॉपी अब आपका टिकट बन जाएगी।

ध्यान रहे, यह सुविधा, टिकट में केवल एक बार ही इस्तेमाल करते आएगी और इसके लिए रेल प्रशासन कोई भी शुल्क नही लेता है।

यह तो हुवा वैयक्तिक यात्री के लिए, लेकिन मैरिज पार्टी के लिए भी यह सुविधा उपलब्ध है और उसमें ब्लड रिलेशन होने की आवश्यकता नही, यदि जरूरत हो तो, ग्रुप के 10% तक नाम के लिए यह सुविधा इस्तेमाल की जा सकती है।

अब लालाजी, देख लीजिए आपका टिकट, इन नियमों में बैठता है की नहीं, ठीक है? आपकी मुसीबत का हल निकल गया।

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दूरंतो बनेगी हमसफ़र

एक दुरंतो गाड़ी, हमसफ़र में तब्दील हो रही है।

उत्तर मध्य रेलवे की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, 12275/76 प्रयागराज (इलाहाबाद) नई दिल्ली दुरंतो एक्सप्रेस, 13 सितंबर 2019 से हमसफ़र एक्सप्रेस में तब्दील की जा रही है।

ऐसी तब्दीली क्यों हो रही है? इसके लिए पहले हम कुछ जानकारी आपके साथ सांझा कर लेते है। 12275/76 दुरंतो एक्सप्रेस का उद्धाटन फरवरी 2010 में हुवा था, तबसे लेकर आजतक यह गाड़ी अपने मार्ग की सबसे लोकप्रिय गाड़ी है।

AC1, AC2, AC3 और 9 स्लिपर डिब्बे ऐसा टोटल कम्पोजिशन इस दुरंतो गाड़ी का है और यही वजह है जो इसे लोकप्रिय बनाती है। आम आदमी भी, स्लिपर क्लास की वजह से इस दुरंतो में अपनी यात्रा कर पा रहा था।

अभी दूरंतो हफ्ते में 3 दिन चल रही है जो बढ़कर 4 दिन भी होने वाली है। याने एक हमसफ़र प्रयागराज से आनंदविहार के बीच 22437/38 हफ्ते में 3 दिन चल ही रही है और इसके 4 दिन याने कुल मिलाके इस रूट पर रोजाना हमसफ़र चलने लग जाएगी।

जब यह दुरंतो, हमसफ़र में बदल जाएगी तो इसमें सिवाए 3AC के कोई भी दूसरा क्लास नहीं होगा और यह गाड़ी आम लोगोंके दायरेसे निकल जाएगी, प्रिमियम क्लास की ट्रेन बन जाएगी।

जहाँ तक हमे लगता है, आने वाले दिनोंमें सभी गरीब रथ, स्लिपर क्लास वाली दुरंतो ट्रेनें धीरे धीरे हमसफ़र ट्रेनोंमें तब्दील होते जाएगी। प्रिमियम सेवा लेना है तो किराया भी प्रिमियम रेट से चुकाना होगा।

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अपना रेल टूर आसान कीजिए, सर्क्युलर जर्नी टिकट लेकर।

राजिन्दर को अलग अलग जगह घूमने जाने का बहोत शौक था। बच्चों की एक्ज़ाम होते ही, कोई न कोई प्लान बन जाता था। टिकट बनाना, होटल की बुकिंग करना सब आजकल इंटरनेट पर हो जाता है। इस बार उसकी इच्छा थी, किसी एक जगह न जाते हुए, 8 -10 जगह का लंबा टूर बनाना, और इसी लिए वो रेलवे के जानकार, सुखीरामजी के पास आया था।

“सुखी पाजी, क्या वो पहले ब्रेक जर्नी करते करते यात्रा करने वाली रेलवे की टिकट अब भी बनती है?”

हाँ काके, उसे सरकुलर जर्नी टिकट कहते है, बीचमे GST की वजह से बन्द कर दी गई थी, जो 1 सितंबर 2018 से फिर से, सभी क्लास के लिए शुरू हो गई है। लेकिन अब सभी श्रेणी के टिकटोंको पूरे किराए पर 5% GST लगेगी।

“पाजी, मुझे यह CJT याने सर्क्युलर जर्नी टिकट का फण्डा पूरा समझाइये न।”

देखो, पहले इस CJT के फायदे बताता हूँ, जिस किसीको अलग अलग स्टेशनोंपर यात्रा करनी है, उसके लिए तो CJT बेस्ट ऑप्शन है। एकही बार मे पूरा स्टार्ट टू एन्ड याने आने जाने का पूरा टिकट बना लो। हर पॉइंट से पॉइंट का टिकट लेने का झंझटों से मुक्ति पाओ। इसका किराया निकलने का तरीका इस तरह होता है, पूरी टोटल यात्रा का दो हिस्सा करके, एक हिस्से को जो किराया होगा उसके डबल किराया चार्ज होता है। उदाहरण के तौर पे, आपकी कुल यात्रा 5000km की है तो 2500km जाने की यात्रा और 2500km आने की यात्रा, ऐसा किराया चार्ज होगा। याने किराए में टेलिस्कोपिक रेट का फायदा भी मिल जाता है। रेलवे में जितना लम्बी दूरी का टिकट उतना पर किलोमीटर रेट कम होते जाता है, उसे टेलिस्कोपिक रेट कहते है।

यह टिकट कमसे कम 1,500 km से लेकर ज्यादा से ज्यादा 10,000 km तक का बनता है। टोटल यात्रा में ज्यादा से ज्यादा 8 ब्रेक जर्नी याने रुकने के स्टेशन मिल पाएंगे। गाड़ी बदलने के लिए यदि किसी जंक्शन स्टेशनपर रुकना पड़ा, जो 24 घंटे से कम समय हो तो उसे ब्रेक जर्नी नही माना जाएगा।

यह CJT में स्टार्टिंग स्टेशन और एन्ड स्टेशन एकही रहना जरूरी है।

टिकट बनाने के किए DCM विभागिय वाणिज्य अधिकारी या स्टेशन मैनेजर से सम्पर्क करना होगा, अपना यात्रा का सम्पूर्ण कार्यक्रम लिखित रूप में उनके पास सबमिट करने के बाद वे आपको एक फॉरमेट में टिकट डिटेल्स अप्रूव्ह कर के देंगे जिसे लेकर आपको रिजर्वेशन ऑफिस में जाकर टिकट बनवाना होगा।

टिकट की यात्रा अवधी तय करने के लिए, आपके टिकट के कुल अंतर को 125 km/day से 135km/day से गिना जाएगा, याने 5000km की टिकट के लिए कुल 38 से 40 दिन की यात्रा अवधि मिलेगी। याने इतनी अवधि में आपको अपनी यात्रा पूरी करनी है। जो भी ब्रेक आप यात्रा के दौरान लोगे उसमे दिनोंके बन्धन नहीं रहेंगे, याने कोई स्टेशनपर आप 4 दिन, कोई स्टेशनपर 2 दिन अपने प्रोग्राम के हिसाबसे रुक सकते हो।

इसमें एक विशेषता और है, यदि आपका टिकट 1000km से ज्यादा अंतर का है और आपके साथ वरिष्ठ नागरिक है तो उन्हें वरिष्ठ नागरिकों को मिलनेवाली रियायत भी मिलेगी।

क्यों राजिंदर पापे, है की नहीं बल्ले बल्ले। तो आगेसे कोई टूर, तीर्थयात्रा करना है तो CJT ले लेना।

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वाह री सुपरफास्ट !

भारतीय रेल में कई तरह की यात्री गाड़ियाँ चलाई जाती है। जिसमे शुरुसे तीन प्रकार थे मेल, एक्सप्रेस और सवारी गाड़ियाँ।

वैसे तो तेज गाड़ियोंका चलन राजधानी एक्सप्रेससे, 1969 से शुरू हुवा। सबसे पहली राजधानी एक्सप्रेस हावड़ा नई दिल्ली के बीच 3 मार्च 1969 को चलाई गई। राजधानी एक्सप्रेस चलाने की मुख्य संहिता किसी राज्य की राजधानी से देश की राजधानी तक, कमसे कम समय मे पहुंचना यह थी। लेकिन सुपरफास्ट का टैग लेकर चलने वाली सबसे पहली गाड़ी थी मुंबई हावड़ा गीतांजलि एक्सप्रेस जो नवम्बर 1977 में शुरू की गई। सुपरफास्ट होने का मानक था, गाड़ी की अपनी पूर्ण यात्रा का एवरेज स्पीड, गति 55 km प्रति घंटा या उससे ज्यादा का रहना चाहिए।

1988 में भोपाल नई दिल्ली शताब्दी शुरू की गई, जिसने राजधानी एक्सप्रेस का देश की सबसे तेज गाड़ी होने का रिकार्ड तोड़ा। अभी तेज गाड़ियोंकी श्रेणी में कई नाम जुड़ गए है। देश की सबसे तेज गाड़ीयों में सबसे पहले आती है, वन्दे भारत एक्सप्रेस, उसके बाद गतिमान एक्सप्रेस, और फिर आती है, दुरंतो एक्सप्रेस। इन के बाद सुपरफास्ट में ही लेकिन अलग श्रेणी की एक्सप्रेस गाड़ियाँ है, जनशताब्दी, संपर्क क्रांति, अंत्योदय, गरीब रथ एक्सप्रेस। लेकिन हमारा आज का विषय है सुपरफास्ट टैग वाली, हर छोटे बड़े स्टेशनोंपर ठहरने वाली गाड़ियाँ।

एक मानक, सिर्फ वही एक, एवरेज स्पीड 55 km प्रति घंटा लगाने से कई साधारण गाड़ियाँ सुपरफास्ट एक्सप्रेस की श्रेणी में आ गई है। 1977 से याने आजसे 42 साल पहले जो मानक सुपरफास्ट श्रेणी के लिए तय किया गया था, आज के गतिमान और वन्दे भारत एक्सप्रेस के जमाने मे भी वही चला आ रहा है। आज की जो तथाकथित सुपरफास्ट गाड़ियाँ है वो किसी मायने में सुपरफास्ट नही लगती, भलेही उनका एवरेज स्पीड 55 km/h हो। हर 25 km पर स्टॉप लेने वाली 12139/12140 सेवाग्राम एक्सप्रेस को कोई सुपरफास्ट कैसे कह सकता है? यह तो एक उदाहरण है, ऐसी कई गाड़ियाँ है, जिनमे सुपरफास्ट गाड़ी होने के कोई लक्षण नज़र नही आते, गिनवाए तो कई पेजेस कम पड़ जाएंगे।

आखिर क्या मिथक है, ऐसी गाड़ियोंको सुपरफास्ट टैग लगाने का? क्या रेल प्रशासन, आम लोगोंसे सुपरफास्ट चार्ज, जो द्वितीय श्रेणी के ₹15/- से लेकर फर्स्ट एसी के ₹75/- तक वसूल कर के अपना घाटा, पाट रही है?

कोई गाड़ी अपने यात्रा में कमसे कम 100 km तक ना रुके तो समझता है, यहां हर 25 km पर रुकने वाली सुपरफास्ट? जब छोटी, कम अंतर वाली यात्रा करने या के रोजाना जाना आना करने वाले यात्रिओंको यह सुपरफास्ट का अतिरिक्त प्रभार चुकाना याने सचमुच अतिरिक्त भार ही लगता है।

आज रेल प्रशासन को जरूरी है, की वे अपने सुपरफास्ट के नए मानक तयार करें। जो लम्बी दूरी तक चलने वाली, कम स्टोपेजेस लेनेवाली गाड़ियोंको ही सुपरफ़ास्ट का दर्जा दे। सुपरफास्ट गाड़ियोंकी एवरेज गति में भी सुधार होने की जरूरत है। नहीं तो ट्रेक की, लोको की, नए LHB डिब्बोकी क्षमता 160km/h और गाड़ी की एवरेज स्पीड देखों तो आती है 55 km/h आज की सवारी गाड़ियाँ भी 110 km/h की दौड़ लगा लेती है।

रेल प्रशासन, भले ही एवरेज इन्कम में बढ़ोतरी का उद्देश्य रखती हो या लूज और मार्जिन टाइमिंग्स देकर गाड़ियोंके समय पालन की शाबासी लेना चाहती हो, लेकिन आज 42 वर्षोंके बाद, कहीं न कहीं, सही मायने में सुपरफास्ट गाड़ियोंकी व्याख्या तय करने का वक्त आ गया है।