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बहोत कठिन है, डगर पनघट की…

मित्रों, आज 41 दिन हो गए हम और आप अपने आप को, अपनों को महामारी से बचाए रखने के लिए घरों मे सुरक्षित रुके है। एक बात अच्छे से समझ ले, यह किसीने आप को दी हुयी सजा नहीं है, आप कैद नहीं किए गए हो। यह तो आपके धैर्य और संयम की परीक्षा है और जिसमे हर हाल मे आपको अव्वल ही आना है। इस जीत मे सिर्फ हम ही नहीं बल्कि हमारा पूरा परिवार, हमारा मोहल्ला, हमारा गाँव, हमारा जिला, हमारा राज्य, और हमारा देश जी हाँ हमारा देश भी जीतेगा। तो चलिए आज से हम सब अपने अपने घरोंमे रुक कर खेलते है, और इस संकट की घड़ी मे सबको जिताते है।

अपने गाँव से रोजीरोटी के लिए आए प्रवासी मजदूर भाईयों की उनके इच्छानुसार अपने अपने गाँव लौटने की व्यवस्था की जा रही है और हजारों की संख्या मे यह लोग अपने गाँव की तरफ लौट रहे है। यह कैसा परिदृश्य है? क्या हम हमारे गाँव वाले भाइयों को यह विश्वास नहीं दिला पाए की हम और वह कोई अलग नहीं है? क्या जब वह बैचेन है, भूखे सोने के लिए मजबूर है तब हम उन्हे यह एहसास नहीं दिला पाए है की हमारी रोटी मे उनकी भी कौर शामिल है? देश के अर्थव्यवस्था की बात कर ले, इतने हम प्रगल्भ नहीं है लेकिन जब दो पैसे हमारी जेब मे पहुंचते है तो लाने वाले कई हाथ मे इन मजदूर श्रमिक भाइयों का भी योगदान होता है यह हम को कतई भूलना नहीं है। हमारी सभी व्यापारी, उद्यमी भाईयों से हाथ जोड़कर विनंती है, आप जिस गाड़ी को चलाने की बात करते हो, उस गाड़ी की जमीन यही लोग है। इनमे हमारा और हम मे इनका अटूट विश्वास ही इनको रोजी रोटी की उम्मीद बंधा कर गाँव लौटने से रोकेगा।

आज हम अपने अपने उद्योग व्यवसाए फिर से खोलने शुरू करने की बात कर रहे है, तो हमारे दुकान के बाहर खड़े उस श्रमिक को कैसे भला भूल सकते है? गली की नुक्कड़ पर चने बेचने वाला भाई, शहर के कोने कोने से वाकिफ़ हमारा टैक्सी, ऑटो वाला भैय्या, दिन भर मे कई यों बार चाय कॉफी पिलाने वाला दादा क्या इस लोगों के बगैर हमारी जिंदगी सहज हो पाएगी। क्यों सिरहन दौड़ गई बदन मे? मित्रों, बस चंद दिनोंकी बात है, आज हमे रोटी ही नहीं भरोसा भी बाँटना है। यह हमारे गाँव के भाई गाँव सदा के लिए न लौटे, गए भी हो तो अपने परिवार के साथ छुट्टियां बिताने गए है और गाँव के छोटे बड़े काम निबटाकर लौटने वाले है ऐसा एहसास उनमे जगाए रखे।

मित्रों, बड़प्पन ऐसे आसानी से नहीं मिलता। आप व्यापारी हो, उद्यमी हो, रोजगार उपलब्ध कराने वाले हो, लोग आपको सेठजी, मालिक कहते हो तो समझ लो, अपने बड़प्पन की इज्जत दांव पर लगी है। इस पर आंच न आने दो। “जान भी, जहान भी ” इसका मतलब समझो और अपनी जान और जहान का दायरा अपनी अपनी शक्ति और हैसियत के अनुसार बढ़ाओ। अपनी सरकार खुद बनो, अपनों की सहायता के लिए आगे बढ़ो।

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