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श्रमिक गाड़ियोंके टिकट का कोई मोल नही।

तो क्या वे टिकट अनमोल है? जी हाँ! उन श्रमिकोंके लिए तो बिल्कुल अनमोल है, जो अपने घरोंको जाने के लिए बैचेन थे।

रही बात टिकटोंके दाम की तो कुल किराएका 85% मूल्य रेल प्रशासन चुका रहा है और 15% राज्य सरकार। अब आप सोच रहे होंगे जब 85% रेलवे चुका रही है तो राज्य सरकारोंसे 15% भी क्यों वसूल रही है, मुफ्त में ही ले जा लेती श्रमिक भाइयोंको?

इसकी वजह यह है, जब हजारों श्रमिक अपने अपने गांव जाने के लिए बेचैन है और एक बार मे सीट्स रहेंगे 1000-1200 तो उनका उत्तरदायित्व लेकर, सही जरूरतमंद व्यक्ति ही गाड़ी में पहुंचे और नियंत्रित स्वरूप में पहुंचे। दूसरा यह की हर व्यक्ति जो यात्रा करेगा वह दोनों सिरेपर याने जहाँसे गाड़ीमे चढ़ेगा और जहाँतक जाना है उस स्टेशन पर उतरेगा, उसके स्वास्थ्य की जिम्मेदारी राज्य शासन को उठानी थी। जब अकाउंटिंग किया जाता है तो हर उस काम एक लयबद्धता और अनुशासन आ जाता है।

गाड़ियाँ कहीं भी रुकनेवाली नही थी, याने यात्रिओंके लिए कोई कमर्शियल स्टॉपेज नही था। चूँकि गाडीभी स्पेशल ही थी। गाड़ीमे रेल प्रशासन की ओरसे यात्रिओंको खाना, पीने के लिए पानी की व्यवस्था उनके जगहोंपर की गई थी ताकी सोशल डिस्टेनसिंग सलामत रहे, मेंटेन रहे।

इसके आगे तो गाड़ियोंमे यात्रा करने वाले श्रमिक बन्धु ही बोल सकते है, की उनका सफर किस तरह सुगमता से हुवा होगा।

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