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मध्य और पश्चिम रेलवे की गणपति स्पेशलपर कोंकण के यात्रिओंकी बेहद ठंडी प्रतिक्रिया

मध्य रेलवे और पश्चिम रेलवे ने जिस उत्साह से कोंकण रेलवे पर 172 और 12 स्पेशल गाड़ियाँ दिनांक 15 से 5 सितंबर तक चलाई है, उसके बिल्कुल विपरीत प्रतिक्रियाए कोंकण की ओर जानेवाले यात्रिओंमें है।

कल दिनांक 15 को मुम्बई से सावंतवाड़ी के लिए 2 स्पेशल्स और लोकमान्य तिलक टर्मिनस से कुडाळ और रत्नागिरी के लिए एक एक स्पेशल गाड़ी छोड़ी गई। कहा जा रहा है, सभी चारों गाड़ीयोंकी हालत यह थी, की किसी भी गाड़ी में 50 से अधिक यात्री नही थे। गाड़ियाँ खाली खाली ही, यात्रिओंके बगैर रवाना हुई।

ऐसा क्यों हुवा, जब हजारोंकी संख्या में कोंकण वासी गणेशोत्सव के लिए मुम्बई की ओरसे अपने गाँव मे उत्सव, पूजा के लिए जाते है? इसका प्रमुख कारण है, देरी। इन स्पेशल्स की घोषणा करने में कई गयी डावाँडोल निर्णय की वजह। रेलवे कई दिनोंसे राज्य शासन के सम्पर्क में थी। पत्राचार भी किए गए, लेकिन सामनेसे कोई प्रतिक्रियाही नही। चूँकि कोंकण क्षेत्र में यात्रिओंकी आवाजाही पर देखरेख रखनेवाली यंत्रणा की कोई व्यववस्था नही थी। अतः कार्यक्रम परवान चढ़ ही नही पा रहा था। एक तरफ महाराष्ट्र शासन ने महाराष्ट्रवासियों को राज्य अंतर्गत रेल यात्रा करने पर रेल प्रशासन को कह टिकट बुकिंग सिस्टम द्वारा ही बन्दी करवा रखी थी और यह सारी गाड़ियाँ राज्य अंतर्गत ही चलनी थी।

कोंकण की ओर यात्रा करनेवाले यात्रिओंमें यह भावना प्रबल थी, जब पूरे राज्य मे किसी को राज्य अंतर्गत रेल यात्रा नही करने दी जा रही तो कोंकण रेल भी शायद ही खुले। दूसरा परनेम टनल बन्द होने से कोंकण रेल मार्गसे चलनेवाली सीधी गाड़ियाँ भी 20/22 तारीख तक पुणे, मिरज, मडगांव मार्ग से घुमा दी गई थी।

जब सीधी गाड़ियाँ बन्द है, राज्य शासन विशेष गाड़ियोंको लेकर कोई फैसला नही कर पा रही है तो सहज है की यात्री जिसको अपने गांव जाना है, बेचारा कब तक इंतजार करें? आगे गांव पोहोंचकर 14 दिन क्वारनटाईंन भी किए जाने की अवस्था को झेलना था अतः बहुतांश कोंकनवासियों ने सड़क मार्ग से अपनी अपनी गाड़ियोंकी व्यवस्था की ओर गांव की ओर निकल लिए।

इधर जब रेलवे को राज्य शासन की ओरसे हरी झंडी मिली तब तक तो ” चिड़िया चुग गयी खेत” वाली स्थितियाँ हो गयी थी। अंततः मुम्बई की ओरसे कोंकण की दिशामे चलने वाली तमाम स्पेशल गाड़ियाँ खाली ही दौड़ लगा रही है। बचे हुए दिनोंकी गाड़ियोंके बुकिंग्ज में भी कुछ जोर दिखाई नही दे रहा है।

लचर नीतियोंके चलते ट्रेनोंका हाल बेहाल हो रहा है और रेलवे को बढ़ते घाटे में और थोड़ा अधिक घाटा उठाने के लिए मजबूर होना है।

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