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कैसे मिलते है नए स्टापेजेस, नई गाड़ियाँ, गाड़ियोंका मार्ग विस्तार या फेरोंमें वृद्धि

समयसारणी का अभ्यास करनेवालोंमें यह सहज समझ आ जाएगा कि जबसे रेल प्रशासन ने एक विशिष्ट पैटर्न छोड़कर गाड़ियाँ दौड़ाना शुरू किया है, सारा नियोजन चूक गया है। खासकर छोटे, मंझले जंक्शन के यात्रिओंके बीच तो बहुत नाराजगी है।

जिस तरह ब्रान्च लाइन के स्टेशनोंको महत्व देकर वहाँसे लम्बी दूरी की गाड़ियाँ शुरू की गई है, जंक्शन्स का कोई औचित्य ही नही रहा।

जब बुनियादी सुविधाएं बहुतायत में हो तो कोई बात भी नही, लेकिन उनके अभाव में भी गाड़ियोंकी खींचतान ब्रांच लाइनोंपर की जाती है तो व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है, इतर स्टेशनोंकी गाड़ियोंकी मांग होने लगती है।

हमारा देश आबादी के दृष्टिकोण से काफी बड़ा है। ऐसा हो ही नही सकता कि कोई गाड़ी खाली चले मगर हिंगोली, वाशिम जैसे छोटे जिले मुम्बई के लिए रोजाना की एक्सप्रेस गाड़ी की मांग करें तो अजीब लगता है।

फिर वही ब्रांच लाईन से मुख्य मार्ग के गाड़ी की मांग। बजाय इसके ब्रांच लाइन के स्टेशन से मुख्य लाइन तक कनेक्टिंग मेमू, इंटरसिटी की व्यवस्था होनी चाहिए।

दूसरा, जितने सलाहकार समितियोंमे विद्वान ज्ञानी लोग समय समय पर नियुक्त होते है, इनका यह फर्ज है, की वे अपने क्षेत्र के यात्रिओंके लिए समुचित गाड़ियोंकी मांग करें न की अनावश्यक लम्बी दूरी की गाड़ियोंके पीछे लगे।

यह बिल्कुल सीधी बात है, आम आदमी वर्षोंमें एखाद बार 1000 किलोमीटर से ज्यादा लम्बी दूरी की यात्रा के लिए बाहर निकलता है। उसके लिए उसी के स्टेशन से लम्बी दूरी की गाड़ी निकले यह जरूरी नही, वह किसी पास के जंक्शन से अपनी यात्रा कर सकता है या किसी बड़े स्टेशन से तेज गति वाली गाड़ी चुन सकता है। यह ठीक उसी तरह है, जैसे हर यात्री अपने गांव में हवाई अड्डा बनवाने की मांग करें। प्रत्येक व्यवस्था में अभ्यास, यात्रिओंकी संख्या उनका रुझान महत्व का होता है।

किसी स्टेशन से रोजाना कई लम्बी दूरी की गाड़ियाँ चलती है, इसका यह मतलब कतई नही निकलना चाहिए की वहाँपर उस गाड़ी का ठहराव निश्चित ही हो। रेल के विभागीय कार्यालय के पास हरेक स्टेशन की टिकट बिक्री का डेटा रहता है। कौनसे स्टेशन के लिए यात्रिओंकी ज्यादा मांग है, कौनसे स्टेशन से यात्री ज्यादा आ रहे है, कौनसे क्लास की टिकटें ज्यादा बुक की जा रही है। इन सब का विश्लेषण किया जाता है और उसके अनुसार क्षेत्रीय कार्यालय को गाड़ियोंकी मांग, स्टापेजेस की मांग भेजी जाती है। सलाहकार समिति के जानकार सदस्य की सूचना भी इन मांगों में मायने रखती है।

कोई सदस्य बिना वजह किसी गाड़ी का विस्तार, फेरे बढाने, स्टापेजेस या नयी गाड़ी की मांग रखता है तो उसकी मांग को विभागीय कार्यालय के डेटा से मिलाया जाता है और उसी से, उक्त मांग या सूचना का वैटेज साथ ही उस सदस्य का अभ्यास भी पता चल जाता है।

खैर, यह काफी अंतर्गत बाते आपके सामने आ गयी है, मगर आजकल अभ्यास के साथ साथ राजनीतिक दबाव भी काम पर लगाया जाता है और बहुत सी अनावश्यक मांगे उसी से पूरी भी हो जाती है। और फिर वहीं बात बहुल आबादी के क्षेत्र में कोई भी गाड़ी चाहे कहीं से शुरू की जाए, खाली तो नही चलती, 2-4 महीनोंमें ही भर भर के चलने लगती है।

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