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हम भारतीय रेल के यात्री, बड़े ही ‘एडजस्टेबल नेचर’ के है!

रेल गाड़ियोंमें फिलहाल यात्रिओंकी बड़ी भीड़ चल रही है। दिवाली रश और क्या? सारे बच्चे जो पढ़ने के लिए, अपने नौकरियों के चलते गावोंसे बड़े शहरोंका रुख कर चुके थे, दिपावली के लिए अपने घरों, गावों, छोटे शहरोंकी ओर 4-6 दिन की छुट्टी निकाल कर लौट रहे है।

लगभग सभी ऐसे यात्रिओंकी छुट्टियों की प्लानिंग धनतेरस से लेकर भाईदूज तक की होती है। यह पांच दिन और इससे पहले के और बाद के 2, 4 दिन आपको किसी रेलगाड़ी में पैर धरने को भी जगह नही मिलने वाली है। भाई, आरक्षित शयनयान स्लीपर और जनरल सेकण्ड क्लास की परिस्थितियों में भीड़ का कोई अंतर नही रह जाता और यहॉं तक की आरक्षित वातानुकूल कोचेस 3 टियर, 2 टियर तक को यात्री नही बख्शते।

अब आप पूछोगे पूर्णतः आरक्षित कोच में यात्रिओंकी अत्याधिक भीड़ कैसे हो सकती है, जब की जितनी आसन संख्या है उतने ही यात्री इन आरक्षित कोच में यात्रा कर सकते है? मित्रों, यह गणित रेल की RAC पॉलिसी से बिगड़ना चालू होता है। प्रत्येक कोच फिर वह वातानुकूलित हो या गैर वातानुकूलित साइड लोअर बर्थ पर एक की जगह दो यात्रिओंको रेल विभाग सिटिंग अलॉटमेंट दे देता है। यानी पुराने ICF कोच में आठ तो नए LHB कोच में नौ यात्री ऐसे ही अतिरिक्त यात्रा करते है। पूर्ण रेल यात्रा में शयिका के दाम देकर भी वह यात्री बैठे बैठे यात्रा कर लेता है और आख़िरतक उसे कन्फर्मेशन नही मिल पाता। यहांसे इतर कन्फ़र्म यात्रिओंकी “एडजस्टमेंट” की कथा शुरू हो जाती है।

गाड़ी के शुरुआती स्टेशनसे ही प्रतिक्षासूची के PRS टिकट धारक जो अपना चार्टिंग के बाद भी प्रतिक्षासूची रह गया ऐसा टिकट रद्द नही करते, आरक्षित कोच में कन्फ़र्म यात्रिओंकी ऊपरी बर्थ या थोड़ी बहुत खाली जगह पर डेरा जमा लेते है। इन्हें न तो कोई टिकट चेकिंग स्टाफ़ छेड़ता है, ना ही सुरक्षा कर्मी। खास बात तो यह है, कन्फ़र्म आरक्षित यात्री भी इनकी जबरन यात्रा और कोई आक्षेप नही लेते और ना ही किसी कार्रवाई का आग्रह करते है।

इसके बाद दूसरे तरह के यात्रिओंका प्रकार है, द्वितीय श्रेणियोंकी अनारक्षित टिकट लेकर आरक्षित कोचों में घुस जाना। यह लोग बड़े शान से प्लेटफार्म पर खड़े टिकट चेकिंग स्टाफ के पास जाकर बाक़ायदा “हम साधारण टिकट लेकर आरक्षित कोच में यात्रा करेंगे, हमारी पेनाल्टी जो भी बने ले लीजिए” कह कर आरक्षित कोच में यात्रा करने की अधिकृत परमिट लेकर जम जाते है। यह यात्री वातानुकूलित कोचों में भी अपनी शिरकत कर लेते है।

इसके आगे का वर्जन है, बिल्कुल ही बिना टिकट सवारी करने वाले यात्री। यह लोग बड़े दिलेर किस्म के होते है। यह साधारणतयः द्वितीय श्रेणी या ज्यादा हिम्मतवाले स्लीपर क्लास में यात्रा करते है। हर तरह के बहानेबाजी कर चेकिंग स्टाफ से छुपतेछुपाते अपनी यात्रा करने के मक़सद को पूरा करते है। और सबसे बेदरकार यात्रिओंके प्रकार में कुछ यात्री ऐसे भी होते है, जो सीधे आरक्षित कोच में जाते है, चेकिंग स्टाफ़ से “मिलते” है, और अपनी यात्रा शान से पूरी करते है चाहे जितने पैसे लग जाये।

इन सारे यात्रिओंके प्रकारोंमें सबसे ज्यादा मरण महीनों पहले आरक्षण किये कन्फ़र्म यात्रिओंका होता है। खचाखच भरे कोच में उसे न अपना लगेज रखने की सहूलियत मिलती है न ही बाथरूम, टॉयलेट के इस्तेमाल की। ठूंसकर भरे गए जानवरों के पिंजड़े के लाचार मवेशियों सी हालत रहती है यात्रिओंकी। और इसके बावजूद तमाम रेल यात्रा में ना ही “ओवर क्राउडिंग” की कोई शिकायत की जाती है और ना ही रेल प्रशासन को किसी आरक्षित रेल यात्री के लिए कोई जद्दोजहद करने का प्रयास करना पड़ता है। यह हम भारतीयों की ख़ूबी समझिए या मजबूरी समझिए। यहॉं सब “एडजस्ट” हो जाते है।

एक विशेष बात पर हम आपसे गौर करवायेंगे, मुम्बई, पुणे के चेकिंग स्टाफ़ के बारे में उत्तरी भारत के क्षेत्रीय रेल्वेज ने रेल बोर्ड में शिकायत की थी। यह शिकायत इस प्रकार की थी, यहॉं का चेकिंग स्टाफ़ प्लेटफॉर्म्स पर ही द्वितीय श्रेणी के यात्रिओंको पेनाल्टी बनाकर आरक्षित कोचेस में यात्रा करने का “परमिट” बनाकर देता है। बजाय इसके की उनपर कानूनी कार्रवाई करें और जब आरक्षित यात्री 10-12 घण्टो की यात्रा करने के बाद भी कोच की भीड़ छँटते नजर नही आती तब शिकायत करते है और उन शिकायतों का निपटान करने की जिम्मेदारी अन्य क्षेत्रीय रेल्वेज पर आ जाती है। खैर, अब यह पद्धति, रेल विभाग के तगड़ी कमाई का ज़रिया बन गयी है और क्षेत्रीय रेलवे इसके आँकड़े अपने ‘लोगो’ के साथ अखबारों और सोशल मीडिया पर प्रकाशित कर अपनी पीठ थपथपाती है।

क्या आजतक आपने किसी यात्री को, यात्री कोच में भीड़ करने के ज़ुर्म में कानूनी कार्रवाई की जाने की खबर पढ़ी है? हाँ, जुर्माने की रकम के आँकड़े प्रति वर्ष बढ़ते फूलते फलते नजर आ सकते है।

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