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बांद्रा देहरादून बांद्रा का शून्याधारित (?) परिचालन, देहरादून के बदले हरिद्वार और बांद्रा के बीच होगा।

09019 बांद्रा हरिद्वार स्पेशल 10 जनवरीसे बांद्रा टर्मिनस से निकलेगी और 09020 हरिद्वार बांद्रा स्पेशल हरिद्वार से 11 जनवरीको शुरू होने जा रही है।

19019/20 देहरादून एक्सप्रेस का यह अमूलचूल परिवर्तन हमेशा इस गाड़ी का सफर करनेवाले यात्रिओंका शेड्यूल बिगाड़ने वाला होनेवाला है।

यह जो भी समयसारणी में फेरफार किया जा रहा है, इसे कई जानकार लोग शून्याधारित समयसारणी के परिवर्तन मानते है, हालाँकि रेल प्रशासन ने इसकी कभी भी पुष्टि नही की की समयसारणी के परिवर्तन ओंके झीरो बेस टाइमटेबल कार्यक्रम का हिस्सा है।

लेकिन जानकारों के हवाले से हम इसे झीरो बेस समयसारणी ही कह रहे है। बांद्रा देहरादून बांद्रा के परिचालन में जो शून्याधारित समयसारणी के अनुसार अमूलचूल परिवर्तन किया गया है, उसका थोड़ा तुलनात्मक अभ्यास यहाँ देते है।

19019 और 09019 में अंतर देखते है तो, 29 स्टापेजेस में कमी की गई है। 19019 देहरादून एक्सप्रेस के बांद्रा और देहरादून के बीच 92 स्टापेजेस थे जो 09019 हरिद्वार स्पेशल में घटकर 63 ही रह गए है। स्टापेजेस में 12 की कटौती हुई है। कुल रन में पहले साढ़े अड़तीस घंटे लगते थे जो नए समयसारणी में घटकर सवा बत्तीस रह गए है, सवा छह घंटे घटाए गए है और एवरेज स्पीड 42 से बढ़कर 50 किलोमीटर प्रति घण्टे बैठता है

वही रिटर्न जर्नी में 19020 के मुकाबले 09020 के 86 स्टापेजेस से घटकर 59 रह गए है और कुल रन में सवा सात घंटे की कटौती हुई है। एवरेज स्पीड 41 से बढ़कर 50 kmph हुई है।

19019 बांद्रा देहरादून एक्सप्रेस बांद्रा से 00:05 को निकलती थी और हरिद्वार को दूसरे दिन दोपहर के 14:35 को पोहोचती थी यह उसका 94 वा स्टॉपेज था। वही 09019 स्पेशल बांद्रा से 00:05 को ही निकल रही है और हरिद्वार को सुबह 8:20 को पोहोंचा रही है। वही वापसी में 19020 एक्सप्रेस हरिद्वार से दोपहर 12:30 को निकलती थी और बांद्रा को तीसरे दिन प्रातः 4:20 को पोहोचती थी जिसे 09020 स्पेशल में बदलकर हरिद्वार से दोपहर 13:30 को छोड़ा गया है और बांद्रा को अगले ही दिन, रात में 22:05 को बांद्रा पोहोचाया गया है।

यहाँपर 09019/20 की समयसारणी दे रहे है। PTT यह पब्लिक टाइमटेबल है।

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पश्चिम रेलवे की महत्वपूर्ण गाड़ियाँ, जिसके शून्याधारित समयसारणी का था सभी को इंतजार

पहली गाड़ी है 09019/20. यह गाड़ी पश्चिम रेलवे में देहरादून एक्सप्रेस नामसे लोकप्रिय थी और अप डाउन वालोंकी चहेती। इसका स्पीडअप ने कइयोंके गणित बिगड़ने वाले है। स्पेशल के रूप में यह गाड़ी बांद्रा टर्मिनस से हरिद्वार के बीच चलेगी।

दूसरी गाड़ी है 09031/32 यह गाड़ी अहमदाबाद से हरिद्वार के बीच हरिद्वार मेल के नाम से चलती थी जिसे अब योगनगरी न्यू हृषीकेश तक विस्तारित कर चलाया जाएगा। गाडीके समय बदले हुए है, जरा देख लीजिएगा

तीसरी गाड़ी है 09065/66 ओखा देहरादून ओखा उत्तरांचल साप्ताहिक एक्सप्रेस। पुरानी 19565/66 के पैटर्न पर ही चलाई जाएगी बस थोडेसे समय बदले गए है।

चौथी गाड़ी है 09029/30 बांद्रा अहमदाबाद बांद्रा लोकशक्ति। पुराना नम्बर 22927/28

उपरोक्त समयसारणी में WTT और PTT ऐसे दो समय तालिकाएं दी गयी है। WTT यह वर्किंग टाइमटेबल है जिसका आम यात्रिओंको कोई लेनादेना नही उनकी समयसारणी PTT वाली है जिसका मतलब पब्लिक टाइमटेबल यह है। अतः यात्रिओंसे निवेदन है PTT वाली समयसारणी का उपयोग करे।

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मध्य रेल की राजधानी अब ग्वालियर भी रुकेगी

मध्य रेलवे की एकमात्र और देश की सर्वप्रथम पुश पुल याने आगे और पीछे दोनों ओर लोको जुड़ी हुई रेल गाड़ी का एक स्टॉपेज और बढ़ाया गया है। यह गाड़ी दोनों दिशाओं में यात्रा करते वक्त ग्वालियर स्टेशन पर रुकेगी।

किसी भी गाड़ी का स्टॉपेज बढ़ता है तो वहाँ के यात्रिओंके लिए सुविधा का विस्तार ही होता है। ग्वालियर वासियोंके लिए दिल्ली की ओर गाड़ियोंकी भरमार है, लेकिन मुम्बई के लिए गाड़ियाँ काफी कम थी अतः अब वे राजधानी से भी मुम्बई की यात्रा कर पाएंगे।

रेल प्रशासन चाहता है की सप्ताह में 4 दिन चलनेवाली इस राजधानी की प्रतिदिन ऐसा विस्तार हो, इसमें यात्रिओंका ट्रैफिक बढ़े। इटारसी से दिल्ली के बीच ढेर राजधानी गाड़ियाँ चलती है मगर मुम्बई से इटारसी के बीच यह एकमात्र राजधानी एक्सप्रेस है।

भुसावल विभाग में इस राजधानी एक्सप्रेस को 2 स्टेशनोंपर स्टॉपेज है। जलगाँव और नासिक रोड। वैसे भुसावल से यह गाड़ी नॉन स्टॉप दनदनाते निकल जाती है। एक विभागीय मुख्यालय और तमाम अनुरक्षण सुविधा होने के बावजूद इस गाड़ी को भुसावल में स्टापेज नही है। यहाँतक की भुसावल का ही परिचालन वर्ग याने लोको पायलट और गार्ड जलगाँव जाकर अपनी ड्यूटी सम्भालता है। यह शायद रेल प्रशासन के परिचालन इतिहास में पहला ही निर्णय होगा जो स्टाफ चेंजिंग स्टेशन से गाड़ी नॉन स्टॉप जाती हो और अगले स्टेशनपर जाकर स्टाफ़ बदला जाता हो। खैर! ग्वालियर वासियोंको राजधानी के स्टापेज की हार्दिक बधाई।

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रेल गाड़ियोंमे सीज़न पास धारकोंकी एंट्री कब?

अनलॉक के 4-5 स्तर हो चुके है, 80-90 प्रतिशत रेल गाड़ियाँ भी चल पड़ी है। लम्बी दुरियोंके यात्रिओंकी रेल यात्रा करने की समस्या लगभग खत्म हो चुकी है। वह लोग अपना आरक्षण कर रेल में यात्रा कर लेते है। लेकिन कम दूरी की रेल यात्रा करनेवाले रेल यात्रिओंका क्या? उन की समस्याओं पर कोई ध्यान क्यों नही दे रहा है?

संक्रमण पूर्व काल मे हजारों संख्या में छोटे दूरी के यात्रिओंके लिए रेल यह एक मात्र किफायती विकल्प था। पासपड़ोस के शहरोंमें अपनी रोजीरोटी कमाने के लिए जानेवाले मजदूर वर्गसे लेकर छोटी मोटी नौकरी करने वाले कमर्चारी तक और स्कूल कॉलेज क्लासेस करनेवाले विद्यार्थियों से लेकर छोटा बड़ा व्यापार करनेवाले व्यवसायी तक रेलवे से रोजाना यात्रा किया करते थे। संक्रमणकाल में रेलवे क्या बन्द हुई इन लोगोंका तो रेल सेवा से नाता ही टूट गया। मई महिनेसे रेलवे सिलसिलेवार चल निकली है, लेकिन 8 माह बीतने को है मगर इन लोंगोंकी समस्या जस की तस है। दुकानें, व्यवसाय खुल गए है, उद्योग कारखाने चल पड़े है लेकिन छोटा व्यवसायी वस्तुतः सडकोंपर घूम रहा है। यज्ञपी स्कूल कॉलेजेस की पढ़ाई घरोंसे चल रही है मगर सारे क्लासेस तो ऑनलाइन नही है न? कहीं न कही विद्यार्थी भी परेशान है।

उद्योग संस्थानों, कारखानों के कर्मचारी, कुशल और अकुशल कारीगर रेल सेवा के अभाव में बेहद परेशान है। यह लोग संघटित न होने की वजह से इनकी समस्याओंकी चर्चा तक नही होती। पहले 200 से 500 रुपए प्रतिमाह की सीजन पास निकाल कर यह लोग पास के शहरोंमें अपने रोजगार पर जानाआना कर लेते थे। इस जाने आने को रोजमर्रा की भाषा मे अप डाउन कहा जाता है। यह अप डाउन का खर्च, इनकी कमाई के मात्र 5 प्रतिशत माहवार बैठता था जो की खर्च करना बहोत सहज था मगर यही अप डाउन रेल से हटाकर सड़क मार्ग से, बाइक या बस द्वारा किया जाता है तो बढ़कर 30 से 50 फीसदी चला जाता है। बताइए इसमें इन्सान कमाएगा क्या और खाएगा क्या?

कुछ यही बात छोटे व्यापारियों की भी है। पास के शहरोंसे माल सामान लाकर अपना व्यवसाय करनेवाले यह लोग अपना सारा मार्जिन यातायात में खर्च नही न कर सकते है? विद्यार्थियों को भी अब ऑनलाइन प्रशिक्षण और क्लासरूम के शिक्षा का फर्क समझ आने लगा है, प्रत्यक्ष शिक्षक से बातचीत की बात ही कुछ और है। इतनी सारी समस्याओंकी सूची है, यह सब केवल छोटी दूरी की रेल यात्रा बन्द होने की वजह से चल रही है।

जिस 25 किलोमीटर की सीजन पास के महीने का खर्च 195 रुपए है उसे एक दिशा की यात्रा के 30 रुपए और आरक्षण के 15, ऐसे कुल 45 रुपए जाने के और 45 रुपये आने याने एक दिन के 90 रुपए कौन खर्च कर सकता है भला? उसमे भी द्वितीय श्रेणी सिटिंग जो की सबसे किफायती वर्ग है, आरक्षण उपलब्ध ही नही रहता। स्लिपर के किराए और दुगुने है। रोज आरक्षण कर यात्रा करना इन अप डाउन करनेवालोंके लिए कदापि सम्भव नही है, सोचा ही नही जा सकता।

इसका हल कैसे हो :

किसी भी तरह पास के अन्तरोंमें चलनेवाली गाड़ियाँ शुरू की जानी चाहिए। द्वितीय श्रेणी तिकीटोंकी व्यवस्था बहाल हो। सीजन पास सेवा भी जल्द शुरू की जाए। यह एकदम सीधी माँग इन लोगोंके द्वारा की गई है। क्या यह सम्भव है? क्या प्रशासन को यह डर है की इससे रेल गाड़ियोंमे भीड़ बढ़ेगी और संक्रमण का खतरा ज्यादा होगा? तो इसके लिए उपाय किए जा सकते है। प्रायोगिक तौर पर मेमू, डेमू गाड़ियाँ केवल सीजन पासधारक के लिए ही शुरू की जा सकती है। नई व्यवस्थाओंके साथ, सीजन पास जारी करते वक्त रेल प्रशासन संक्रमण की जांच का प्रमाणपत्र अनिवार्य कर सकती है। वैसे भी सीजन पासधारक अपनी फोटो आइडेंटिटी के साथ यात्रा करता है, याने कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की भी परेशानी नही होगी। सीजन पास जारी करते वक्त या हर नवीनीकरण के वक्त यात्री से संक्रमण की कोई बाधा नही है ऐसा शपथपत्र लिया जा सकता है।

कुछ यात्री संगठन से चर्चा किए जाने पर यह पता चलता है की, अप डाउन करने वाले यात्री रेल यात्रा बन्द होने की स्थिति में बेहद परेशान है। वह चाहते है, किसी सूरत में सीजन पास व्यवस्था फिर से बहाल की जाए। उपरोक्त सुझाव उनके साथ कि गयी चर्चा की ही उत्पत्ति, नतीजा है। आशा है रेल अधिकारी, राज्य शासन इन यात्रिओंकी माँगोपर सहानुभूति पूर्वक विचार कर, रोज की परेशानी, समस्याओंसे इनको निजात दिला पायेंगे।

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सारे तीरथ बार बार, गंगासागर एक बार!

कुछ वर्षों पहले तक ऐसा कहा जाता था, की गंगासागर तीर्थ पर जीवन मे एक बार ही जाया जा सकता है। इसकी वजह इस तीर्थ की दुर्गमता थी। यह तीर्थ पश्चिम बंगाल के सुन्दरबन इलाके में पड़ता है। किसी जमाने मे बाघ, साँप, मगर ऐसे प्राणियों और जीवजन्तु से भरा यह भूभाग अब काफी सुगम हो गया है। पहले तीर्थयात्रिओंको सिर्फ इन जीवजन्तु से डर था बल्कि छूत की बीमारियाँ जैसे कॉलरा, टाइफाईड, मलेरिया आदि की चपेट में आने का खतरा था। कहते है, अब यह इलाका काफी सुधर गया है, लोकवस्ती, मोबाइल नेटवर्क भी काफी अच्छी हो गयी है।

गंगासागर जाने के लिए सीधी रेल सेवा तो नही है, लेकिन हावडा रेलवे स्टेशन इसके लिए उपयुक्त है। यहांसे आपको उपनगरीय गाड़ियाँ मिलती है, जिससे आप नामखाना या काकद्वीप जा सकते है। यहांसे आपको आपको फेरी बोट से मुरीगंगा नदी से होकर सागर द्वीप या गंगासागर पोंहचा जा सकता है।

गंगासागर तीर्थ में कपिल मुनि का मंदिर है और गंगा नदी का सागर संगम है। हावडा से नामखाना की उपनगरीय गाड़ियोंका टेबल यहाँपर दे रहे है।