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यदि चलानी हो रेल, तो लॉक डाउन के बाद प्रशासन हो कठोर।

3 मई को लॉक डाउन – 2 की अवधि खत्म होने जा रही है। ऐसे मे सभी के मन मे यह जानने की उत्कंठा हो रही है, क्या लॉक डाउन आगे जारी रहेगा या इसमे अंशत: छूट का दायरा बढ़ेगा, सबसे बड़ा सवाल, रेल्वे की यात्री सेवाएं शुरू की जाएगी? और यदि हुई तो किस तरह, क्योंकी हर किसी को अब सोशल डिस्टेनसींग का अटूट महत्व समझ मे आ गया है।

कई सारी खबरें, लेख इस विषय पर बन रहे है और रोज नितनई बातें पढ़ने मे आ रही है। रेल्वे प्रशासन ने इस लॉक डाउन की अवधि मे करीबन 20,000 पुराने स्लिपर क्लास के कोचेस जो LHB डिब्बों के चलते रेलवे की साइडिंग पे पड़े थे, उनकी मिडल बर्थ निकालकर, उन्हे आइसोलेशन कोच के लिए तैयार किया है। याने रेग्युलर कैबिन में दो दो अपर, मिडल और लोअर ऐसे 6 बर्थ की जगह अपर और लोअर ऐसी 4 बर्थ की कैबिन बनी है। अब इन संक्रमण की हालातों मे रेल्वे के वातानुकूलित डिब्बे सेंट्रल एयर कंडीशनिंग होने की वजह से यात्रा के लिए उपयुक्त नहीं माने जा रहे। आगामी रेल यात्रा के लिए यही आइसोलेशन वाले कोचेस लगा कर गाडियाँ चलाने की सम्भावनाओं पर चर्चे चल रहे है।

अब फ़ैक्ट समझने की कोशिश करते है। यह पुराने स्लिपर कोच 72 बर्थ क्षमता के होते है। हर कैबिनसे 2 बर्थ हटा दिये जाते है तो हर डिब्बे की 9 कैबिन मे से कुल 18 बर्थ निकाल कर 54 बर्थस रह जायेंगे। हम यह समझकर चलते है, की सोशल डिस्टेनसिंग को आधार रखकर गाड़ियाँ केवल इन्ही स्लिपर डिब्बों के साथ चलायी जाएगी। यह तो हो गई आसन व्यवस्था अब गाड़ियोंकी स्थिति देखते है। दुरांतों, राजधानी, और इन्ही तरह की प्रीमियम गाडियाँ छोड़ दें तो रेल्वे की लगभग 60 से लेकर 70 % गाडियाँ हर 50 किलोमीटर चलने के बाद स्टेशनोंपर रुकती है। उपनगरीय याने लोकल गाडियाँ और सवारी गाड़ियोंकी तो फिलहाल हम बात ही नही कर रहे है।

कई सारे मेल एक्सप्रेस रुकने वाले स्टेशन्स ऐसे है जहाँपर अभी भी पूर्णतया: अनावश्यक प्रवेश के लिए प्रतिबंध नहीं है या यूँ कहिए कोई भी व्यक्ति स्टेशन एरिया मे, प्लेटफॉर्म्स पर बिना किसी बंधन के, रुकावट के आ जा सकता है। गाड़ियाँ अब तक भी स्टेशनों के बाहर सिग्नल के इन्तजार मे खड़ी हो जाती है। ऐसी स्थिति मे गाड़ीमे कोई भी अवांछनीय व्यक्ती प्रवेश कर सकती है या गाडीसे उतर सकती है। गाड़ी मे अभी भी प्रतीक्षासूची के आरक्षण बुकिंग पर कड़े नियम नहीं है। अभी तक PRS याने काउंटर से छपा प्रतीक्षासूची वाला टिकट, यात्री बिना रद्द किए गाड़ी मे यात्रा करते पाया जाता है। क्या सोशल डिस्टेनसिंग की इन स्थितियों मे हम आरक्षण के इन नियमोमे सुधार होता या कोई प्रशासनिक कारवाई होती देख सकते है?

यदि गाडियाँ चलाने का निर्णय लिया जाता है तो सबसे पहले रेल प्रशासन को अपने कुछ नियम और कायदे सुधारने होंगे और उनपर कड़ाई से अमल भी करना होगा। सारे स्टेशन्स या शुरुवात में मुख्य स्टेशन्स केवल परिचयपत्र और उचित अनुमतिपत्र के साथ ही प्रवेश के लिए प्रतिबंधित किए जाए। अनुमतिपत्र पर व्यक्ति स्टेशन के कौनसे एरिया में जाने के लिए पात्र है उसकी जानकारी लिखी जानी चाहिए। जैसे की स्टेशन का आहाता, आरक्षण कार्यालय, टिकटघर, प्लेटफॉर्म्स, गाड़ी का डिब्बा आदि। आगे सबसे महत्वपूर्ण गाड़ी मे आरक्षण किए जाने वाले प्रत्येक यात्री के पास यात्रा करने के उचित कारण हो और किसी भी राजपत्रित अधिकारी का साक्ष्यंकित अनुमतिपत्र हो तभी यात्री को आरक्षण और प्रवेश दिया जाए।

1: रेल प्रशासन को चाहिए की अपनी किसी भी रेग्युलर गाड़ी चलाने के बजाय विशेष गाड़ियों को चलाना होगा। ताकी उनका अलग से टाइम टेबल, अलगसे गाड़ी की संरचना, अलग सुरक्षात्मक दृष्टिकोण रखते हुए मेडिकल जाँच करने वाला स्टाफ और सैनिटेशन किया जा सके ऐसी समुचित व्यवस्था हो इन्ही स्टेशनों पर स्टोपेज दिए जा सके। ऐसी गाड़ियोंके किराए भी अलग दर से याने तत्काल / प्रिमियम तत्काल रेट्स से लिए जा सकते है और यात्री किरायोंमे दी जाने वाली रियायत भी अपनेआप रद्द हो जाएगी।

2: स्टेशन पर गाड़ी मे प्रवेश दिए जाने के लिए हवाई अड्डे पर के सारे मानक अपनाए जाए। गाड़ी मे यात्री चढ़ने के बाद डिब्बे के दरवाजे लॉक होने की सुविधाए हो या मैन्युअली लॉक किए जाए और स्टोपेज आने के उपरांत गाड़ी प्लेटफ़ॉर्म पर पहुंचे तब ही खोले जाए। इसमे भी पूरी गाड़ी यात्री प्रतिबंधित वेस्टिबुल हो याने सभी डिब्बे एक दूसरे से जुड़े हो लेकिन कर्मचारियों के लिए ही एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे में जाने की अनुमति हो, केवल एक ही डिब्बे याने गाड़ी के आखिरी डिब्बे से सारे यात्रीओंका का प्रवेश और एक ही, सबसे पहले डिब्बे से निकास हो।

3: गाड़ी के हर डिब्बे मे एक सुरक्षा कर्मी और एक टीटीई जिनके पास गाड़ी के गार्ड और लोको पायलट से सीधी संपर्क व्यवस्था हो। गाड़ी “अलार्म चेन पुलिंग सिस्टम” के बजाय केवल रेल्वे के नुमाइन्दे से निवेदन किए जाने पर ही रोकी जा सके ऐसा नियम बने।

4: गाड़ी में प्रवेश किए जाने वाले यात्री का सामान स्कैन किया गया है ऐसा प्रमाणपत्र आवश्यक किया जाना चाहिए। बिना प्रमाणपत्र के यात्री को गाड़ी में प्रवेश की अनुमति नही रहेगी।

इतने बन्धनोंके उपरान्त ही रेल गाड़ियाँ चलाए जाना ठीक रह सकता है।

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रेलवे की थ्रिलर स्टोरी

(यह सत्य घटना पर आधारित कहानी रेलदुनिया के ब्लॉग पर पूर्वप्रकाशित है। कहानी के पात्रोंके नाम बदले गए है। )

आज भारतीय रेलवे अपनी गती के नए नए कीर्तिमान बनाए जा रही है। सुपरफास्ट, राजधानी, शताब्दी, गतिमान और आज की वन्दे भारत एक्सप्रेस। अब कुछ ही महीनोंकी बात है, ट्रेन 20, जो की 200 km प्रतिघंटा दौड़ने वाली गाड़ी है, आनेवाली है।

क्या आप जानते है, इन सब कीर्तिमान के पीछे कितनी मेहनत, कितनी सजगता है? अफसर, इंजीनियर, टेक्नीशियन बहोत सारे कर्मचारी अपनी दिन रात एक करते है, लेकिन इन सभी की ड्यूटी के साथ साथ एक कर्मचारी और भी है। वो है, भारतीय रेल के इन नए नए कीर्तमान के शिखरोंकी नींव का पत्थर, रेलवे में काम करनेवाला चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, गैंगमैन,चाबी वाला।

आज की कहानी, इन्ही चाबी वालोंकी है। जिस तरह हर कोई ईमारत देखता है, उसकी मजबूती, बुलंदी देखता है, लेकिन नींव छुपी रह जाती है। उसी तरह यह चाबी वाला शायद ही कभी उजागर होता है।

हमारी कथा का नायक, मुश्ताक़, जिसकी उम्र कोई 37 साल की होगी। रेलवे में गैंगमैन में लग के 12 वर्ष हो गए थे। उसकी गैंग में 70 लोग थे। पटरी की देखभाल करना यह उनके गैंग की ड्यूटी थी। मुश्ताक़ का मुकर्दम बिरजू पांडे था, जो उससे 15 साल सीनियर था और PWI साहब थे लौटू पटेल। दरअसल एक गैंग का मेंबर ही सीनियर बनके मुकर्दम, और आगे जा के लोअर क्लास थ्री में PWI याने परमानैंट वे इंस्पेक्टर बनता है। काम सब का वही, रेलवे ट्रैक का मेंटेनेंस और रिपेयर करना।

मुश्ताक़ हमेशा रात की ट्रैक चेकिंग की ड्यूटी पसंद करता था। रात 10 बजेसे सुबह 6 बजे तक, कंधे पर 20 किलो का थैला, जिसमे पटरी का छोटा टुकड़ा, चाबियाँ, नट, बोल्ट, पाने और लंबे डंडे वाली हतौडी, एक टोर्च, दो सिग्नल वाली बत्तियाँ, दोनों हरी और लाल झंडियाँ, साथमे मोबाईल रेडियो याने वॉकीटोकी। इतना सारा झमेला सम्भालते रात के अँधेरोंमें, कड़कड़ाती ठंड हो या उफनती बरसात, बत्ती के या टोर्च के उजाले में, अकेले ट्रैक को जांचते 5 km जाना और उतना ही वापस आना, अपने मुकर्दम को ट्रैक का रिपोर्ट करना और फिर घर जाना, ऐसी थी ड्यूटी।

यह ऐसीही एक रात की बात है। दिसंबर की ठंड की अंधियारी वाली रात थी। मुश्ताक़ की ड्यूटी श्री क्षेत्र नागझिरी स्टेशन से शुरू होनी थी जो नदी का पुल पार करके पारस स्टेशन तक जाना था। PWI ऑफिस से अपना झोला उठाकर, बिरजू दादा को रामरमाई करके मुश्ताक़ निकला।

स्टेशन खत्म हुवा और आगे पुल शुरू होता है। हमेशा नागझिरी से पारस जाते वक्त, अप लाईन पर चेकिंग की जाती थी और आते वक्त डाउन लाइनपर याने गाड़ी सामने से आए ऐसी दिशा में पैदल चलना। मुश्ताक़ अप लाइन से पुल पार करते जा रहा था, डाउन ट्रैक से एक मालगाड़ी धड़धड़ाते पास हुई। मुश्ताक़ को पुल का थरथराने का आवाज़ थोड़ा अलग ही लगा, उसने सोचा, मालगाड़ी का रेक ज्यादा लम्बा या ओवरलोड होगा। बड़े अफसर पता नही देखते है या नही, वह बुदबुदाया।

थैला उठाकर पारस स्टेशन पहुंचा तो रात के 1 बज चुके थे। दोनोंही तरफ की गाड़ियाँ बराबर चल रही थी। उसने पारस के मास्टर से अपने डायरी में साइन करवाई और वापसी ड्यूटी के लिए निकल पड़ा। स्टेशन मास्टर ने उसे आवाज दी, “अरे मुश्ताक़, चाय तो पिता जा।” “ओ नही साबजी, जर्दा दबा लिया है।वैसे भी आज कुछ ठीक नही लग रहा। पता नही ये चौदस, अमावस मुझे भारी क्यो लगती है?” मुश्ताक़ ने बाहर मुँह निकाल, एक पीक मारी और पटरी पर बढ़ गया।

जाती आती गाड़ियोंको बत्ती दिखाए आगे बढ़ रहा था, बस नदी आ गई है, पुल पार किया की ड्यूटी पूरी। अब वह डाउन पटरी से आ रहा था। पिछेसे पारस से छूटी सेवाग्राम एक्सप्रेस साँय साँय करते उसे पास कर गई। उसके मंझे हुए कानोंमें एक खट खट की डरावनी आवाज़ आई। गाड़ी तो निकल चुकी थी। नागझिरी से पारस जाते हुए उसने अप साइड की पटरी चेक करी थी। उसका दिल बड़े जोर जोर से धड़कने लगा।

अपना डाउन ट्रैक छोड़कर वह फिरसे आवाज की तलाश में अप ट्रैक पर आया। देखता तो क्या? सन्न रह गया। धुजनी छूट गई, इतनी गहरी ठंठ में वह पसीने पसीने हो गया। पुल जहाँ ख़त्म हो रहा था, वहाँ की दोनों ही पटरी बिल्कुल छूट गई थी। ये तो सीधे सीधे पुल का गर्डर खिसकने की निशानी थी। वह सीधे पलटा, और पुल के दूसरे छोर की तरफ याने पारस स्टेशन की ओर दौड़ने लगा। जैसे ही पुल खत्म हुआ, उसके 50 मीटर आगे जाके उसने झोले से बत्ती निकली और उसमें लाल कांच चढाकर अपने हटौडे के डंडे पे टांग दी। दूसरा काम, फौरन वॉकीटोकी निकाल अपने मुकर्दम से बात शुरू की।

वॉकीटोकी याने मोबाईल रेडियो की व्यवस्था ऐसी रहती है की, 5 km के दायरे में सभी एक्टिव मोबाइल रेडियो एक दूसरे से सम्पर्क कर सकते है। मुश्ताक़ ने वॉकीटोकी को शुरू करते ही, उसकी रेंज में जितने भी मोबाईल रेडियो है, जो सब उसकी आवाज सुन रहे थे, और वो बदहवास सा चिल्ला रहा था। “ओ बिरजू दादा, पारस के मास्टर साब, नागझिरी के मास्टर साब, नदी के पुल पर, अप लाईन की दोनों पटरी चटख गई है, शायद पुल का गर्डर खिसक गया है। गाड़ियाँ रोक दीजिए। मैं ऑन ड्यूटी चाबी वाला मुश्ताक़ बोल रहा हूँ।

” अबे, क्या बक रहा है? ” वॉकीटोकी पर बिरजू चीखा, उधर पारस और नागझिरी के मास्टर की भी हालत खराब हो गई, अफ़रातफ़री मच गई। ईधर बिरजू पांडे जानता था, की मुश्ताक़ घबराहट में तो है, लेकिन ऊलजुलूल नहीं बकेगा, उसने फौरन अपने PWI लौटू पटेल को फोन लगाया, और मुश्ताक़ की बात बता दी।

बात की अहमियत जानते, लौटू पटेल, जो भुसावल में था, फौरन ही कंट्रोल ऑफिस पहुंचा। कंट्रोल ऑफिस ने तुरन्त इमरजेंसी सायरन बजवा दिए।

इधर मुकर्दम बिरजू ने भी अपना थैला उठाया और वह भी नदी की तरफ दौड़ पड़ा। नागझिरी और पारस स्टेशनोंपर इमरजेंसी लग चुकी थी। दोनोंही स्टेशन का PWI गैंग नदी की तरफ रवाना हुवा। भुसावल कंट्रोल पूरे हरकत में गया। सायरन सुनकर अफसरों के फोन शुरू हो गए। ब्रेक वैन को 15 मिनिट का वक्त दिया गया। इमरजेंसी गैंग अपने औजारों के साथ स्टेशनपर जमा होने लगी। नागपुर भुसावल ट्रैक का पूरा ट्रैफिक फौरन रोक दिया गया। जो जहाँ है उसे वहीं रोका जा रहा था।

बिरजू के साथ की गैंग, उधर पारस की गैंग पुल पर मुश्ताक़ के पास पहुंची। मुश्ताक़ अभी तक थरथरा रहा था। जब सब लोग पुल के छोर पर पहुंचे तो पटरी की हालत देखकर सन्न रह गए। दोनों पटरी टूटकर कमसे कम 4 इंच नीचे सरक गई थी। जब गर्डर की तरफ नज़र गई तो गर्डर एक छोर से लटक गया था। हालात देख सबकी रूह काँप गयी की अभी अभी सेवाग्राम एक्सप्रेस उसी पटरी से 100 की स्पीड से गई थी।

लगभग 70 मिनट में, भुसावल से ब्रेक डाउन गाड़ी नागझिरी पुल के जगह पहुंची और सभी जिम्मेदार अफसरों और टेक्नीशियन्स ने मोर्चा संभाला।

आगे उस पुल की मरम्मत का काम 2 महीने चला, लगभग 1 हफ्ते तक, उस सेक्शन की ट्रैफिक पूर्णतया बन्द थी, जिसे 1 हफ्ते बाद स्पीड रिसट्रिक्शन याने धीमे गति की पाबंदी के साथ शुरू की गई।हमारे अननोन, अज्ञात, बिना प्रसिद्धि मिलने वाले हीरो को, मुश्ताक़ को मुम्बई के जनरल मैनेजर से अवॉर्ड घोषित किया गया।

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….और दुनिया तब भी चल रही थी।

हमारे पास एक बेहद खूबसूरत वीडियो आया है। पहले आप यह वीडियो देख लीजिए, फिर बात करते है।

देखा लिया न? जी, हम बिल्कुल धोखे में जी रहे थे और सबसे बड़ा धोखा तो यह है, की हमारे बगैर फ़लाँ जगह कुछ नही हो पाएगा। हमारे परिवार का क्या होगा, दोस्तोंका क्या होगा, बिजनेस कैसे चल पाएगा, हमारे बगैर वहॉं पत्ता भी नही हिलता है।

दोस्तों, अब तो समझिए इस बात को, ” जान है तो जहान है ” आप है तो यह दुनिया आपकी है, आप कहीं हाजिर नही हो पाए तो आपकी कमी तो खल सकती है मगर दुनिया रुक जाएगी? ऐसा नही होगा। हम यह नही कहते की आप महत्वपूर्ण नही है, न। हमारा कहने का यह मतलब बिल्कुल नही है। आप हो, और महत्वपूर्ण भी हो लेकिन वह वक्त नही हो जो एक गैप बन जाए, अंतराल या रिक्ति बन जाए। काम, बिजनेस, दफ्तर, दुनिया चलती ही रहती है। हर चीज कोई भी गैप, रिक्ति पूरा करने की कोशिश करती है और कार्य को अपने अन्जाम तक पहुँचा देती है।

आप इन बातोंको आध्यात्मिक न ले तो बेहतर है। हम केवल लॉक डाउन की बात कर रहे है, जिसमे आप को कई चीजोंको, आदतोंको छोड़ना पड़ा रहा है। अपने मित्रोंसे मिलने जाना, रिश्तेदारोंके छोटे बड़े कार्य प्रसंग में हाजिर होना, पर्यटन करना, ऑफिस टूर करना अबतक यह सब अतिमहत्वपूर्ण कार्य लगते थे जो अब पर्यायवाची रखने होंगे।

जब तक इस संक्रमण की सही सही तोड़ नही मिल जाती तबतक हर तरह का जमावड़ा आम आदमी को खतरे से कम नही लगेगा। लोग रेलवे, बस, टॅक्सी यहाँतक रिक्शा में भी भीड़ में सफर करने से कतराएंगे।

आज तक सबके दिमाग़ में रेल गाड़ियाँ कब शुरू होंगी और कब हमारा घूमने का, रिश्तेदारोंके यहां जाने का प्रोग्राम फिक्स होगा, बिजनेस एक्सपैंशन के लिए कौनसे शहर का टूर करना है, माल खरीदने कहाँ जाना है ई. विचार चल रहे थे अब सोच में फर्क आते जा रहा है। गाड़ियाँ शुरू भी हो गयी तो किस तरह जा पाएंगे? क्या वातानुकूलित प्रथम श्रेणी का टिकट ले कर यात्रा करना ठीक रहेगा? या स्पेशल टैक्सी कर लेना ज्यादा उचित रहेगा। फॉरेन टूर्स का क्या होगा? लगता है डर?

जो लोग उम्रदराज़ है, बीमारियों से ग्रस्त है, जिनकी रोग प्रतिकार शक्ति कमजोर है ऐसे लोगोंमेंसे सीनियर सिटीजन्स की रेल किरायोंकी रियायत पहले ही अमर्याद काल तक रद्द की जा चुकी है। दिव्यांग और बीमार व्यक्तियोंकी रियायत शुरू है लेकिन हमारे देश जिसमे कई सारे लोगोंको मधुमेह, रक्तचाप की तकलीफें है, जिनकी रोग प्रतिकार शक्ति पहलेसेही कमजोर है ऐसे में क्या यह लोगोंका आगे भी रेल या कोई भी यात्रा करना उचित रहेगा?

भाईयों, हम आपको डरा नही रहे है, अपितु आनेवाले हालातोंकी कुछ तस्वीर सामने लाने का प्रयत्न कर रहे है। महत्वपूर्ण, बेहद जरूरी इन शब्दोंके मायने जल्द ही बदलने वाले है। दुनिया के लिए कुछ जरूरी नही है और न ही महत्वपूर्ण बस जो कुछ है वह है आप और आपकी समझदारी।

वीडियो के लिए हम अन्जान रचयिता के हार्दिक आभारी है, यह हमें फॉरवर्ड मेसेज के ज़रिए मिला है।

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रेल 23:57 को आएगी और 0:02 को जाएगी, आरक्षण के लिए कौनसे तारीख का समय का ले?

मित्रों, फिलहाल रेलवे की कोई खबर हमारे पास नही है, और व्यर्थ भ्रम फैलाने में कोई अर्थ नही। लेकिन कुछ मजेदार सवाल आते है और आर्टिकल बन जाता है।

हमारे मित्र है, उन्होंने एक अजीब सवाल पूछा, रोजाना चलनेवाली गाड़ी का आने का समय 23:57 है और जाने का समय 0:02 है तो बताए आरक्षण कौनसे दिन का करे?

है न उलझन? जिनकी घड़ियां 12 घंटोंकी होती है, उनके लिए यह उलझन खड़ी हो सकती है। चूँकि रेलवे में रात बारा बजेका समय दो तरिकोंसे बताया जाता है 24:00 और 0:00। अब आपको रेलवे की घड़ी समझाते है। उदाहरण के लिए हम एक गाड़ी जिसका हमे आरक्षण करना है। समझिए यह गाड़ी दिनांक 1 को मुम्बई से चली रात 8:00 बजे पुणे आई 23:57 को औऱ पुणे से रवाना होगी 0:02 पर, सोलापुर पहुंचेगी सुबह 5:00 बजे। अब हमें पुणे से सोलापुर के लिए आरक्षण लेना है तो गाड़ी भलेही 1 तारीख को आ रही है लेकिन छूटने का समय 0:02 का याने 2 तारीख का है यानी हमको 2 तारीख का आरक्षण लेना है और 1 तारीख को रात 23:00 को घरसे निकल स्टेशनपर पोहोंच जाना है तभी हम गाड़ी में बैठ पाएंगे। तो उत्तर हुवा गाड़ी छूटने के समय का ही तारीख पकड़ा जाएगा और आरक्षण 02 तारीख का लेना होगा। रेलवे हमेशा स्टेशनसे छूटने के समय रिकॉर्ड करती है वही फाइनल समय है।

यह केवल उदाहरण है, आम तौर पर रेलवे प्रशासन किसी गाड़ीमे ऐसी दुविधापूर्ण समयसारिणी नही बनाती की गाड़ी 1 तारीख को आए और दो तारीख को रवाना हो। या तो गाड़ी 23:55 को आकर 24.00 को रवाना हो जाएगी याने 1 तारीख में आकर उसी 1 तारीख को रवाना हो जाएगी। या फिर 0:00 को आकर 0:02 को रवाना होगी इसमें तारीख 2 को गाड़ी आकर दो को ही रवाना हो रही है।

यह चक्कर AM /PM का होता है, कई यात्री 2 तारीख की 3:00 बजे की गाड़ी में बैठने के लिए 2 तारीख को दोपहर 3:00 बजे याने रेलवे की 15:00 बजे स्टेशनपर पोहोंचते है। फिर भी आजकल कम्प्यूटराइज्ड टिकट पर गाड़ी के, आरक्षण जहाँसे है उस स्टेशनका रवाना होने का समय, तारीख और गन्तव्य स्टेशन का पहुंचने का समय, तारीख सब साफ अक्षरोंमें छपा होता है। मोबाइल पर SMS होता है, मोबाइल पर रेलवे के ऐप के जरिए भी टाइमटेबल मिल जाता है। जब छोटासा कार्ड टिकट होता था तब टाइमटेबल या स्टेशन पर ही गाड़ियोंके समय की जानकारी मिलती थी।

खैर, समय समय की बात है, नही यह समय की ही बात है। 😁